Friday, 29 December 2017

भेड़िये
--------
इंतजार करते करते पूरा हफ्ता बीत गया लेकिन हरिया का कुछ पता नहीं।बोल कर गया जल्दी लौट आऊंगा लेकिन अब तक नहीं ….
पैसे का इंतजाम करने गया और खुद ही खो गया, का करूँ? बउआ का बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा, दवा भी खत्म हो गई कैसे होगा सब ….
‘ठक ठक ठक’......दरवाजे पर दस्तक हुई ।
“कौन ?"
“दरवाजा खोलो तनिक।"
“आप ?” पल्लू सम्भालती शगुना मुंशी को सामने देख चौंक गई।
“अंदर आ जायें?”
“वो घर में नहीं है साहेब।"
“मालूम है हमको। खा नहीं जायेंगे तुमको। लड़का बीमार है और हरिया भाग गया इसीलिए खैर खबर लेने आ गए।"
“क्यों शर्मिंदा करते हैं साहेब।"
“पईसा है तेरे पास?”
“नहीं साहब, दवा भी खत्म।पास ना पईसा है ना गहना।"
“पैसा मै दे दूंगा ,लेकिन……”
“लेकिन क्या साहब?”
“तू मुझे खूश कर दे।"
“मै समझी नहीं साहब।"
"ज्यादा भोली न बन। जवान है,खूबसूरत है और का चाहिए ऐश करने के लिए।करीब आ।"
“हिम्मत कैसे हुई तेरी हरामखोर?गरीब हूँ,अकेले हूँ तो खा जायेगा?निकल यहां से कमीने।"
“क्या बकवास कर रही है?एक तो तेरे भले की बोल रहा हूँ ऊपर से नखरा कर रही है।मरद तो भाग गया तेरा ,कौन रखेगा तुझे? साली लडके का तो सोच।"
“लड़के की चिंता तू ना कर।भगवान ने हाथ पैर दिये हैं कमा लूंगी,पत्थर तोड लूंगी लेकिन,तेरे जैसे भेड़िये का निवाला नहीं बनूंगी। निकल यहां से।"
दिव्या राकेश शर्मा
देहरादून

Post a Comment: