Friday, 29 December 2017

धर्मांतरण
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कॉलेज में क्रिसमस से लेकर नए साल तक कि छुट्टी हो चुकी थी। ऐसे में पिकनिक की योजना बनाने के लिए रवि अपने मित्र अभय से मिलने गया। जब रवि अभय के घर पहुँचा तो देखा अभय अपने फोन में कुछ पढ़ते हुए जोर-जोर से हँस रहा था।
रवि ने पूछा- ऐसा क्या पढ़ लिया भाई जो इतना हँस रहा है?
अभय ने कहा- ये देख धर्मांतरण कर ईसाई बने लोगों पर क्या जबरदस्त चुटकुले बन रहे है। मेरी तो हँसी नहीं रुक रही भाई।
रवि ने कहा- भाई इस तरह चुटकुले बनाना और हँसना बहुत आसान है। कोई भी कर सकता है। लेकिन क्या हमने या ऐसे चुटकुले बनाने वाले लोगों में से किसी ने ये सोचा की इस धर्मांतरण की नौबत ही आखिर क्यों आयी?
अभय रवि की बात सुनकर चौंका और बोला- क्या मतलब?
रवि ने कहा- मतलब ये की हमने या हमारे पूर्वजों ने धर्मातंरण करने वाले लोगों को बेइज्जत करने की जगह कभी भी ये समझने औऱ जानने की कोशिश ही नहीं कि, की आखिर क्यों ये मिशनरी वाले इस धर्मांतरण की साजिश को सफलतापूर्वक अंजाम देकर अपनी संख्या बढ़ाने में सफल हो पाए।
अभय बोला- तू तो बड़ा ज्ञानी मालूम पड़ता है। तू ही बता ऐसा क्यों हुआ?
रवि ने कहा- क्योंकि हम हिंदुओं में एकता की कमी है।
राजपूतों का मज़ाक बनाये जाने पर किसी दूसरे वर्ग को दिक्कत नहीं होती, ब्राह्मणों का मज़ाक बने तो उससे किसी और को कोई ऐतराज नहीं कि ये उस समुदाय का मामला है हमें उससे क्या।
जातियों में बँटे हमारे समाज में नीची जातियों की क्या स्थिति है ये किसी से छुपा नहीं है। आज भेदभाव, छुआ-छूत वाली मानसिकता थोड़ी कम हुई है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं।
और इसी भेदभाव का फायदा उठाकर मिशनरियों ने अत्याचार से पीड़ित लोगों को इज्जत और समानता की ज़िन्दगी के सपने दिखाकर उन्हें धर्मातंरण करने के लिए सहमत कर लिया।
और जहां इन सपनों से बात नहीं बनी वहाँ इन मिशनरियों और कट्टरपंथी मुसलमानों ने जबरन बल प्रयोग का सहारा लिया और इसमें भी वो सफल सिर्फ इसलिए हो पाए क्योंकि हम हिंदुओं ने एकता नहीं दिखाई।
अलग-अलग राज्यों में बँटे इस भारतवर्ष के सभी राजा अगर एक हो जाते तो क्या कभी भी कोई बाहरी हमलावर हमारे आगे टिक पाता? हमारी संपत्ति से लेकर हमारी संस्कृति, हमारे लोगों का नुकसान कर पाता?
लेकिन यहाँ तो सदियों से यही मानसिकता चली आ रही है कि आग तो पड़ोसी के घर में लगी है हम क्यों अपने घर से निकलने की तकलीफ उठाये। हम भूल जाते है कि आग की ना कोई जाति है ना कोई धर्म। वो अगर फैली तो पड़ोस के बाद आपके घर को भी लील जाएगी अपने अंगारों में।
रवि की बातें सुनते हुए अभय हैरान था। अब वो भी गंभीर हो चुका था।
उसने रवि से कहा- बात तो सही है तुम्हारी भाई। तुम्हारे हिसाब से इस समस्या का हल क्या है?
रवि ने कहा- भाई महज सोशल मीडिया पर मजाक उड़ाकर और धर्म संबंधित आक्रमक लेख लिख देने से हमारे धर्म को घुन की तरह समाप्त करती ये बीमारी जड़ से नहीं मिटेगी। ये तब मिटेगी जब हम अतीत की भूल से सीख लेकर निजी जीवन में उसे सुधारेंगे। बजाय राजपूत-ब्राह्मण-दलित करने के एक होकर सम्पूर्ण हिन्दू समुदाय के हित को साथ लेकर आगे बढ़ेंगे।
अभय बोला- तू बिल्कुल सही कह रहा है। इस ऊंच-नीच, छूत-अछूत के भेदभाव को अगर हमने अब भी नहीं मिटाया तो सचमुच हमारा सनातन धर्म बहुत बड़े खतरे में होगा और हम बस सोशल मीडिया पर चिल्लाते रह जाएंगे।
इसलिए आज से, अभी से मैं और तू मिलकर प्रण करते है कि हम अपने निजी जीवन और आस-पास के लोगों में एकता की भावना जगायेंगे और उन लोगों से भी एकता की मशाल जलाने का आग्रह करेंगे ताकि धर्मातंरण का ये काला साया हमारी संस्कृति की चमक को नष्ट ना कर पाए।
अपने इस प्रण को निभाने और एक नया सवेरा लाने की दिशा में दोनों दोस्तों के अग्रसर होते कदमों को देख सनातन संस्कृति की घायल आत्मा को भी सुकून मिल रहा था।

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