Friday, 23 June 2017

     पांच साल की मिन्नतों और दुनियाभर के इलाज के बाद जब विधान दीक्षित और सुशीला देवी के यहां पहली औलाद हुई तो पूरा गाँव उनके उत्सव में शरीक हुआ। पण्डित जी गाँव के रसूखदार आदमी थे। धन- धान्य की कोई कमी न थी। गाँव में ही 4 मकान और अच्छी खासी खेती-बाड़ी उनकी सम्पन्नता की कहानी कहती थी। लड़की होने पर भी भला कोई उत्सव करता है क्या? लोगों के मन में रह रहकर ये सवाल गूंज रहा था। सब बड़े लोगों के चोंचले हैं! सवाली मनों ने खुद ही जवाब तलाश लिया। नवजात को उस एक दिन में ही सैकड़ों दुआएँ मिल गईं। दुआओं ने असर भी दिखाया। पड़ोसियों ने तो दांतों तले ऊँगली दबा ली जब जन्म के आठवें महीने में ही आरती अपने पैरों पर खड़ी होकर चलने लगी। दूर के चार गांवों तक इतना चंचल, स्वस्थ और मोहक बच्चा किसी का नही था। अपनी पत्नी को खो देने के भय से दीक्षित जी ने दूसरी सन्तान का मोह ना किया। हालांकि पण्डिताइन को एक लड़का हो जाने की बड़ी लालसा थी पर मर्द की जिद के आगे भला औरत की की कभी चली है!
     आरती अपनी नाम के अनुरूप ही सात्विक और सरल बालिका थी। उसकी शिक्षा - दीक्षा का भार दीक्षित जी ने अपने कन्धों  पर ले लिया। समय का पंछी तेज गति से उड़ चला। चंचलता हया में और कविता पाठ गीता पाठ में परिवर्तित हो गए। बारह साल की आरती देखने में पन्द्रह की लगती थी। गौर वर्ण, तीखे नेत्र और शारीरिक संकेतों से स्पष्ट था कि कन्या अब किशोरी हो चुकी थी। गांव के मनचलों में आरती के चर्चे शुरू हो गए थे और इधर आरती का हृदय भी अब गुड्डो - गुड़ियों वाले खेल से भर चुका था। दरवाजे की ओट से अपनी माँ को श्रृंगार करते देखना उसे भाने लगा था।
     दीक्षित जी दिन काम- धंधे के सिलसिले में बाहर रहते थे और आज सुशीला भी हाट को गयी थीं। आरती को मन मांगी मुराद मिल गयी। माँ के साजो सामान का खुद पर प्रयोग करने से इससे बेहतर अवसर नही था। प्रयोग सफल होता इससे पहले ही उसमे खलल पड़ गया। मजबूरन आरती को दरवाजा खोलना पड़ा। आधी सजी आरती हास्यास्पद से अधिक सुंदर लग रही थी। दरवाजे पर अनुरोध था। 15 वर्षीय अनुरोध पड़ोस के गांव का निवासी था। उसके  पिता बृजेश्वर पांडे कपड़ों के व्यापारी थे। दीक्षित और पांडे की मित्रता हुए अरसा बीत गया था। 20 साल पहले जब पाण्डे परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था तो सबसे पहले दीक्षित परिवार ही मदद को आगे आया था। अनुरोध पहले आरती को देखकर हंसा फिर खुद को सम्भालते हुए बोला-
 ' विधान चाचा को ये कपड़े दे देना।'
आरती ने झट से उसके हाथ से कपड़े छीने और दरवाजा बन्द करके अंदर भाग गयी। दोनो पहले भी कई बार मिले थे पर आज की मुलाक़ात कुछ खास थी। आरती का वह रूप अनुरोध के सामने बार- बार प्रकट हो रहा था। आकर्षण का पौधा अंकुरित हो गया था। आरती भी अनुरोध को पसन्द करती थी क्योंकि वो उसे छिप -छिपकर इमली महुआ और दूसरी पसंदीदा चीजें लाकर देता था।
     चार वर्ष बीत गए। किशोरी आरती अब एक नवयौवना दिखती थी। अनुरोध भी बांका जवान हो गया था। आकर्षण का स्थान प्रेम ने और महुआ - इमली का स्थान श्रृंगार के सामान ने ले लिया। आग लगने पर निकलने वाला धुंआ और प्रेम प्रसंग छिपाना असम्भव होता है। पण्डित जी को इस विषय में पता चलते ही उनका क्रोध आरती पर फूट पड़ा। आरती भी कम हठी न थी। खाना -पीना त्याग दिया। इंसान अपनी संतान से ही हारता है। अनुरोध अच्छा लड़का है, पांडे जी तो देवता व्यक्ति हैं - ऐसा सोंचकर विधान जी ने उनसे रिश्ते की बात चला दी। पाण्डे को भी रिश्ते से समस्या नही थी। उनकी समझ में समझौता कुल की बदनामी से बेहतर था। आखिर वो दिन भी आ गया जब दोनो एक हो गए। आरती अपने नए भगवान के मंदिर की ओर प्रस्थान कर चली।
    कल तक अपने माँ के आँचल से चिपटी रहनी वाली सुकुमारी आज स्वयं का आँचल सम्भाल रही थी। अनुरोध ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया तो आरती नजर चुराकर भागी। अनुरोध भी पीछे पीछे दौड़ा। दोनों की दौड़ - भाग प्रणय पर जाकर समाप्त हुई। आरती 'पूर्ण' हो गयी। प्रेम ने व्यसन का रूप ले लिया। आरती ने खुद को एक कुशल गृहणी के रूप में स्थापित कर लिया। पंछी ने अपने पंख फैला लिए।
पांडे जी की राजयक्ष्मा सबसे भयावह रूप में पहुंच गयी।इस बार काल अपने इरादों में सफल रहा। अनुरोध अनाथ हो गया। व्यापार का सारा भार उसके कन्धों पर आ गया।एक दिन आरती को अचानक से पता चला कि अनुरोध को व्यापार के सिलसिले में अज्ञात समय के लिए गाँव छोड़ना पड़ेगा। जी तो चाहे कि पीछे से जाकर अनुरोध को पकड़ ले पर पति के पैरों की बड़ी नही बनना चाहती थी वो। अनुरोध से विरक्त आरती देहरी पर बैठ उसकी बाट जोह रही थी। कानों में तीव्र ध्वनि पड़ी - 'अलख निरंजन'
स्वर का स्वामी निकट ही था। आरती हड़बड़ाकर वापस होश में आई।
'किन विचारों में मग्न हो पुत्री। तुम्हे घर - द्वार का कुछ भी भान नही है।'
इतने समय बाद किसी के मुख से 'पुत्री' शब्द सुनकर आरती अपने अंदर उमड़ते सागर को रोक ना सकी। नेत्रों के सीपी से उत्पन्न हुआ अश्रु मोती कपोलों के रास्ते गुजर गया। उसे साधु में पिता के दर्शन हो रहे थे। भावनाओं ने शब्दों का रूप ले लिया और आरती ने अपनी सारी व्यथा साधु को कह सुनाई।
'पुत्री तू आसक्त हो चुकी है। मोह का सबसे विकट रूप है यह। इस रोग से स्वयं को दूर करने का प्रयत्न कर।'
साधु आरती की दयनीय अवस्था समझ गए थे।
' बाबा यह रोग तो लाइलाज सा लग रहा है। मेरी मृत्यु के बाद ही जायेगा। कोई दवा बता दीजिये जिससे पीड़ा तनिक कम हो जाए।'
आरती गिड़गिड़ा उठी।
'तेरी पीड़ा का नाश तो तेरा पति ही कर सकता है। तेरे मन में तेरे पति की जो भी छवि है उसे एक मूर्ति का रूप दे और उसकी पूजा कर उसे प्रेम कर। ईश्वर ने चाहा तो पीड़ा से मुक्ति मिलेगी।'
'अलख निरंजन'
आरती अचरज से भर उठी कि भला एक प्रतिरूप अनुरोध का स्थान कैसे ले सकता है ! परन्तु साधु के बताये उपाय के अलावा उसे कोई और रास्ता न दीख पड़ा।अगले दिन स्नानादि करने तुरन्त बाद आरती अपने इष्ट को साकार रूप देने में जुट गई। फुलवारी से अंजलि भर सूखी मिटटी ली लेकर उसे बारीक छान लिया। प्रत्येक कण को आपस में जोड़ने के लिए जल देव की सहायता ली गयी। भावनाओं से मूर्ति का श्रृंगार हुआ। मानो साक्षात अनुरोध हो। आरती ने अपना सारा प्रेम उस बेजान मूरत पर न्योछावर कर दिया।
      पंछी ने फिर से करवट ली, एक वर्ष और बीत गया। सन्ध्या का समय था। आरती अपने देव को प्रेम प्रसाद चढ़ाने में मग्न थी। उसी समय द्वार पर दस्तक हुई।  प्रेमालाप के मध्य एक अतिथि का यूँ दखल देना प्रियतमा को बिलकुल नागवार लगा। अधूरे मन ने द्वार खोला गया। आतिथेय की दृष्टि आगंतुक पर गयी। मूरत की सूरत सामने खड़ी थी। अनुरोध को अपने समक्ष पाकर आरती एक क्षण के लिए बेसुध हो गयी। किंकर्तव्यविमूढ़ होकर देखने से अधिक वह कुछ ना कर सकी। अनुरोध स्वयं भीतर आ गया और चारपाई पर बैठ गया। इतने लम्बे अंतराल के बाद घर वापसी पर जलपान की आशा बहुत बड़ी तो नही थी। आशा उस समय निराशा में बदल गयी जब आरती बिना एक शब्द कहे भीतर चली गई। अनुरोध एक बार फिर पीछे गया। परन्तु इस बार प्रणय का स्थान पर आश्चर्य था। आरती अपने इष्ट की वन्दना में पुनः व्यस्त हो चुकी थी। ये सब अनुरोध के लिए अकल्पनीय था। दो दिनों तक तो उसे आरती की इस अवस्था के विषय में कुछ समझ ही नही आया। धीरे- धीरे पड़ोसियों के माध्यम से उसे पता चला कि उसके पलायन के पश्चात आरती किन परिस्थितियों से गुजरी।
     अनुरोध ने आरती को सम्भालने का भरसक प्रयास किया। गाँव - शहर का कोई भी वैद्य, तांत्रिक पुजारी उसकी अवस्था में रत्ती भर सुधार न ला सका। किसी ने बताया कि प्रेम ही आरती का असली इलाज है पर आरती तो उसे अपने पास तक फटकने नही देती थी। इस संसार प्रेम से भी बढ़कर एक चीज होती है - आसक्ति। आरती कहीं गहरे उस भँवर में फंस गयी थी। उसके लिए उसका इष्ट ही सब कुछ था। अनुरोध के सारे यत्न विफल रहे। चहुंओर विफलता हाथ लगने के पश्चात अब अनुरोध के पास एक ही मार्ग शेष था।
      निद्रा ने नियत समय पर  ही आरती का दामन छोड़ा। सोमवार का दिन सुहागिनों के लिए विशेष महत्व रखता है। आज के दिन वो अपने इष्ट का भोग विशेष पकवानों से लगाने वाली थी। दैनिक क्रियाएँ नियत समय पर सम्पन्न हो गयीं। अब मिलन का मुहूर्त था। आरती सारे भोग लेकर अपने इष्ट के पास पहुंची। पर इष्ट आज शायद आरती के साथ क्रीड़ा के इच्छुक थे तभी वह अपने स्थान पर नजर नही आ रहे थे। आरती उन्हें वहां न पाकर विचलित हो उठी और दौड़ कर दूसरे कक्ष में प्रवेश कर गयी जहां अनुरोध कुछ व्यापारिक कार्यों में व्यस्त था।
' मेरे अनुरोध कहाँ हैं? आपने उन्हें देखा कहीं?'
अनुरोध के वापस आने के बाद आरती का उसके साथ यह प्रथम संवाद था ।
' तुम्हारा अनुरोध तुम्हारे सम्मुख है।'
' नही, वो अपने स्थान पर नही हैं।'
आरती और विचलित हो उठी।
' आरती वो मिट्टी की मूरत अनुरोध नही थी। वो मिट्टी का टुकड़ा हमारे मिलन में बाधक था इसलिये मैंने उसे गंगा मैया को अर्पित कर दिया। अब हमारे मध्य कोई बाधा शेष नही।'
 अनुरोध के मुख पर लम्बे समय के बाद सन्तोष के भाव थे। पर आरती उन शब्दों को सुनकर बदहवास सी हो उठी। उसके पैरों ने बिना मस्तिष्क से मंत्रणा किये बाहर की ओर दौड़ लगा दी। अनुरोध एक बार फिर से पीछे भागा पर इस बार आरती को पकड़ना असम्भव था। आरती 'अनुरोध - अनुरोध' चिल्ला रही थी और अनुरोध 'आरती- आरती'। कुछ मिनटों की दौड़ के बाद आरती गंगा टीले पर खड़ी थी। एक पल को ठिठक कर इष्ट का ध्यान किया फिर स्वयं को गंगा में अर्पित कर दिया।  12 वर्ष की वह बालिका पुनः अनुरोध के नेत्रों के सामने प्रकट हुई फिर ओझल हो गई। 'छपाक' की आवाज ने खुद को दोहराया। पंछी एक नये आशियाने की खोज में उड़ चला।

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