Thursday, 20 April 2017

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"अरे ओ छुटकी जरा हियां तो आओ। तुम्हरे चच्चा आज नई धोती लायें हैं हमरे खातिर, जरा देख के बताओ तो कइसी है?"
पड़ोस वाली दुलारी चाची ने दरवाजे के बाहर से ही आवाज दी।
" चच्ची हम कल देखें तो? आज तबियत कुछ... "
कमला अपनी बात पूरी कर पाती इससे पहले उसका ढाई साल के बच्चे ने अचानक रोना शुरू कर दिया। अब तक दरवाजे के बाहर खड़ी दुलारी चाची मुन्नू के रोने की आवाज सुनकर तुरन्त भीतर आ गयीं। 
" का हुआ है ई का ?आज दिन मा भी एके रोवे की आवाजें आवत रहैं?" दुलारी चाची ने परेशान होकर पूंछा।
" कुछ ना चच्ची मौसमी बुखार है तुम तो जनती ही हौ कि बरसात मा कित्ती गन्दगी हुई जावत है बस्ती मा । हमरी तबियत भी ठीक ना है कुछ।" 
अब तक खाट पर लेटी कमला कुछ जोर लगा कर उठ कर बैठ गयी बच्चे को देखने के लिए।
"तुम रहै दो हम देखत हैं। चाची ने बच्चे को गोद में उठा लिया।
" अरे इका बदन तो तप रहा है बुखार में। दवाई लाई?" चाची ने मुन्नू को थपकी देते देते पूंछा।
" हाँ बस रात खुराक का वक़्त हुई गवा है।"
कमला ने अपने सिरहाने रखी तकिया उठाई और उसके नीचे से अखबार की पुड़िया निकालकर उसे खोला। पुड़िया में दो सफ़ेद रंग की गोलियां थी जिसे वो आधे गिलास पानी के साथ निगल गयी।
" मुन्नू का दवाई दी?" 
" दवाई नही काढ़ा दिया है चच्ची। भगवान की किरपा रही तो कल तक ठीक हुई जईहे।" कमला ने कहा।
इतना सुनते ही दुलारी चाची का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
" वारी तोरी कलजुगी मामता! महतारी अपने लरिकन के लये जान तक दै देत है अउर तुम खुद की दवाई लाई और इका काढ़ा दिए हो? "
दुलारी चाची का सारा गुस्सा बाहर फ़ूट पड़ा।
" हम एकी दवा ही लें गयें रहैं पहिले तो। जब हम डागडर के हियाँ पहुंचे तो चकरिया के गिर गए। बदन मा कतई ताकत ना रहै। फिर हम सोचें कि अगर हम मुनुआ की बजाय अपनी दवाई ले लिहैं तो कल तक ठीक हुई जैहैं। आखिरी बीस रूपया अगर हम मुनुआ की दवाई पर खरच देते तो हम कल काम पर ना जा पउते। काम पर ना जा पउते तो मुनुआ को खिलाते का? हम सुने हैं खाली पेट दवाई जहर हुई जात है। हम अपने मुनुआ को जहर कईसे दे देते?" बोलते बोलते कमला का गला रूंध गया।
चाची मुन्नू को अभी भी थपकी दे रहीं थीं उसका रोना थोड़ा कम हो गया था अब।

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