Thursday, 19 January 2017

 प्रेम! एक ऐसा एहसास, जिसे शब्दों में बयाँ कर पाना मुमकिन नहीं। प्रेम करना सभी चाहते हैं, लेकिन विरले  ही होते हैं, जो इसे निभा पाते हैं। यह बेचैन करता है, इम्तिहान लेता है, मदहोश करता है । और इससे बढ़कर देता है एक सतत संघर्ष! क्या  आप भी प्रेम करना चाहेंगे, और  पूरी करना चाहेंगे प्रेम प्रतिज्ञा?

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प्रेम प्रतिज्ञा

पूर्वजन्म श्रृंखला - भाग 2

लेखक- ऋषभ कुर्मी


किसी अज्ञात स्थान पर -

प्रकृति के अनूठे चमत्कारों में से एक, इस दर्शनीय वन्य-क्षेत्र को पवित्र गंगा अपने अमृत से पोषित करती है।नदी के किनारे बेतरतीब पड़ीं  अनगढ़ शिलाएँ इसके सौन्दर्य को जीवंत करती हैं। नदी की कल-कल  का मधुर संगीत इस पूरे वन-क्षेत्र गुंजायमान है। ऐसे मन को पुलकित करने वाले स्थान पर
एक युवक एक युवती की गोद में लेटा हुआ है।

युवक-वादा करो ! तुम मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जाओगी।

युवती- क्या प्यासा पानी से दूर रह सकता है? क्या भंवरा पुष्प से पराग लेना छोड़ सकता है?
यह कभी संभव नहीं कि मेरा प्रेम बदल जाए।

युवक- मैं बहुत भाग्यशाली हूँ कि मुझे तुम्हारा साथ मिला! मैं अपना हर क्षण तुम्हारे नाम करना चाहता हूँ। मेरी कामना है, मेरे हर जन्म में तुम मुझे मिलो!

युवती- निसंदेह! हमारा साथ अनंत काल तक रहेगा!

युवक-तुम्हारी माता का इसमें क्या मत है?

युवती- माँ अभी भी चिंतित हैं।

युवक- ईश्वर ने चाहा, तो सब हमारे अनुकूल ही रहेगा।मैं हर चुनौती का सामना करूँगा!तुम जो मेरे साथ हो!

बीप! बीप! बीप!

सूरज की किरणों से विचलित हो ऋचा पर्दे लगा देती है।

ऋचा-(खुश होकर) कितना प्यारा सपना था! हकीकत में तो करता नहीं! कम से कम ख्वाबों में तो इकरार हुआ! लेकिन लड़की कौन थी? कभी देखा नहीं, फिर भी जाने क्यों अपनी सी लगती है।

ख़ैर! अब हक़ीक़त में वापस आजा ऋचा! सपनों में जीने वाले अक्सर टूट जाया करते हैं।
मगर एक अरसा हो गया ज़िन्दगी से मिले, अब वक़्त हो चला है फिर से मुलाकात का!

(प्यार से)आ रही हूँ मैं, ज़िन्दगी आ रही हूँ मैं!
सी यू सून ध्रुव!
 दी डेविल विल बी बैक!


स्थान- राजनगर का समुद्री तट।
समय- 5:30 AM
सुपर कमांडो ध्रुव एक डॉलफिन को कुछ समझा कर पलटता है। इसी बीच वह अपना ट्रांसमीटर निकाल कर कहीं संपर्क करने की कोशिश करता है, लेकिन सम्पर्क नहीं हो पाता। कुछ देर के निरर्थक प्रयासों के पश्चात वह कोशिश छोड़ देता है। तभी हवा में एक द्वार उत्पन्न होता है और ध्रुव उसमें प्रवेश कर जाता है। द्वार के उस पार होता है स्वर्णनगरी का स्वर्ण-निर्मित मुख्य अथिति कक्ष। इस कक्ष की बेहतरीन साज-सज्जा किसी का भी मन प्रफुल्लित कर दे। किन्तु धनंजय का चिंतित चेहरा कुछ और कहानी बयाँ करता है।

धनंजय- आओ ध्रुव!

ध्रुव- तुमको डॉलफिन से मैसेज मिल गया होगा। क्या यह संभव है?

धनंजय- स्वर्णनगरी के विकसित विज्ञान के लिए यह असंभव नहीं है। चलो तुमको जैविक कक्ष में परीक्षण करके दिखाता हूँ।

ध्रुव- हम्म! चलो।

इसके बाद ध्रुव और धनंजय एक ऐसे कक्ष में प्रवेश करते हैं जहाँ विभिन्न प्रकार के खतरनाक जानवर अपने प्राकृतिक परिवेश (जो की स्वर्णनगरी वासियों ने अपने चमत्कारी विज्ञान से तैयार किया है)में रह रहे थे।

धनंजय- ये वे जीव हैं, जिन्हें मिश्ति के आणविक धमाके ने प्रभावित किया था। उस धमाके की वजह से इन जीवों की शारीरिक संरचना में ढेरों विसंगतियां आ गयी थीं।

ध्रुव- हाँ। पूरी पनडुब्बी की ऊर्जा खींचने के लालच में वह खुद फट गया था। मुझे नहीं मालूम था उसकी वजह से इतना म्युटेशन हुआ होगा।जिस समुद्री जीव को मैंने हराया  था, वह तो इनके आगे बच्चा लग रहा है।

धनंजय- तुमने जो कोशिका और तकनीक हमें सौंपी थी, हमने उनको उन्नत कर दिया है। उनके सहयोग से एक विषहर बनाया है। देखो यह क्या करता है!

धनंजय इंजेक्शन से एंटीडोट एक  म्युटेंट मछली के शरीर में इंजेक्ट करता है। कुछ मिनट के बाद विशालकाय मछली अपने मूल स्वरूप में आ जाती है।

ध्रुव- कमाल हो गया धनंजय! मुझे यकीन नहीं हो रहा! यह कैसे संभव हो सकता है।

धनंजय- सारा कमाल उन मष्तिस्क कोशिकाओं का है। ऐसे प्रयास तो पहले भी बहुत हुए हैं लेकिन कोई इनको नियंत्रित नहीं कर सका। मगर इन कोशिकाओं के अंदर शक्तिशाली मस्तिष्क है, जिसने असंभव को संभव कर दिया।

ध्रुव- क्या मैं इस अविष्कार की कार्यप्रणाली जान सकता हूँ?

धनंजय- अवश्य मित्र!

कुछ देर तक धनंजय ध्रुव को समझाता है , और उसके बाद वे मुख्य प्रयोगशाला में जाते हैं जहाँ से ध्रुव कुछ एंटीडोट अपने पास रख लेता है।

ध्रुव- अब इन सेल्स की प्रतिक्रिया से बेहोश होने की समस्या तो नहीं होगी?

धनंजय- नहीं ध्रुव। अब ऐसी कोई समस्या नहीं है। अब उल्टा इससे मानसिक क्षमता में वृद्धि होगी। लेकिन अधिक मात्रा में लेने से यह समस्या फिर सर उठा सकती है।

ध्रुव- वैरी गुड! अब मैं वायरस से टकराने को पूरी तरह तैयार हूँ।

धनंजय- और कोई जरुरी सूचना?

ध्रुव- समुद्र तट पर मैंने कमांडो हेडक्वार्टर से सम्पर्क करने का काफी प्रयास किया लेकिन नहीं कर पाया।

धनंजय- तो इसमें क्या अजीब है। ट्रांसमीटर ख़राब हो गया होगा।

ध्रुव-ट्रांसमीटर ठीक है। ब्रह्मांड रक्षकों की फ्रीक्वेंसी कैच कर रहा है। ट्रांसमिशन में व्यवधान होता तो अनस्टेबल कनेक्शन होता। लेकिन होता तो सही। कोई मेरा कमांडो हेडक्वार्टर से संपर्क काटने की कोशिश कर रहा है।

धनंजय- हम्म! मैं सुन रहा हूँ। आगे बोलो।

ध्रुव- वायरस को जेल से रिहा हुए एक महीना नहीं हुआ और इतनी जल्दी उसने इतना खतरनाक वायरस  ईजाद कर लिया। ताकत जुटाने में उसे बहुत कम वक़्त लगा।मामला जितना दिख रहा है उससे कहीं ज्यादा है ।

धनंजय- तुम सही कहते हो ध्रुव! अब  योजना क्या है?

ध्रुव धनंजय को कुछ समझाता है। अपनी तैयारियां पूरी करने के बाद ध्रुव और धनंजय द्वार बना कर चले जाते हैं।

इसी समय किसी अज्ञात स्थान पर-
कुशाग्र- ध्रुव काफी देर से गायब है। मैं उसको संकेतक पर खोज नहीं पा रहा हूँ।

अजनबी- उसके आखिरी संकेत कहाँ से मिले थे?

कुशाग्र- राजनगर के समुद्री तट से, जब आपके आदेश से उसके संदेशवाहक का संपर्क काटा था।

अजनबी- मुझे अनुमान है,वह कहाँ गया होगा।

कुशाग्र- वह कौनसी जगह हो सकती है श्रेष्ठ?

अजनबी- पृथ्वी पर जब मैंने अपनी मानसिक तरंगों का जाल बिछाया था, तब समुद्र तल के पास एक क्षेत्र को  मेरी मानसिक तरंगे भेद नहीं पा रही थीं।

कुशाग्र- असंभव! आपकी मानसिक शक्ति का सामना कौन कर सकता है?

अजनबी-ध्रौव्य के अलावा एक ही योद्धा था, जो मेरा मुकाबला कर सकता था। लेकिन वह तो वीरगति को प्राप्त हो गया था। इस गुत्थी को सुलझाना अत्यंत आवश्यक है। शीघ्र ही उस स्थान पर गुप्त सूक्ष्मदर्शी  भेजो।

कुशाग्र- जैसी आज्ञा श्रेष्ठ!

कुछ समय के पश्चात माइक्रो कैमरा(सूक्ष्मदर्शी) पानी में उतर जाते हैं, और तेज गति से अपने गंतव्य की और बढ़ने लगते हैं।

कुशाग्र- जल्द ही वहाँ का रहस्य खुल जायेगा।

अजनबी- जाने क्यों मुझे कुछ अनिष्ट की आशंका हो रही है। वायरस के अड्डे पर मैं स्वयं जाऊंगा और  स्थिति पर नजर रखूँगा।

कुशाग्र- लेकिन इस तरह तो आपका भेद खुल सकता है श्रेष्ठ! आप नियम जानते ही हैं।

अजनबी- मुझे हालात को अपने पक्ष में झुकाना बखूबी आता है।

कुशाग्र-आपकी क्षमताओं पर संदेह करने वाला, निसंदेह मूर्ख ही होगा। मैं सावधानी वश ऐसा कह रहा हूँ। इस संग्राम में बने रहने के लिए आपका गुप्त रहना आवश्यक है।

अजनबी- सत्य है।मैं इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं! किन्तु,वहाँ मुझे प्रकट होने की  आवश्यकता नहीं है। फिर भी मैं सावधान रहूँगा।

तभी स्क्रीन से एक सिग्नल आता है।

कुशाग्र- सूक्ष्मदर्शी अपने नियत स्थान पर पहुँच चुके हैं श्रेष्ठ। क्या अद्भुत दृश्य है ! स्वर्ण निर्मित,एक पूरा नगर!

अजनबी-(धीमी आवाज में) इतना बड़ा विश्वासघात! इतने युगों तक मुझे अंधकार में रखा गया। इसका उत्तर उन्हें देना ही होगा।

स्थान-आर्यवटी, (स्वर्णसंगम)
समय- सतयुग का प्रारंभिक चरण।

स्वर्णसंगम। एक भव्य नगर जहाँ वास करते हैं अद्भुत क्षमताओं वाले मानव। यहाँ के सभी वासियों को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त है।
यूँ तो इस नगर में दर्शनीय एवं चित्ताकर्षक वस्तुएं बहुतायत में हैं, किंतु यहाँ का मुख्य आकर्षण है आर्यवटी। जिसका निर्माण ,यहाँ के पराक्रमी राजा आर्यक के विशेष  अनुरोध पर, स्वयं देव शिल्पी विश्वकर्मा ने किया है।
 प्राकृतिक शैली में निर्मित इस भव्य महल में आकर एक अलग प्रकार की शांति महसूस होती है। किंतु, आर्यन का अंतर्मन यहाँ आकर भी अशांत था। एक चेहरा बरबस ही उसकी आँखों के आगे आ जाता।कल का घटनाक्रम उसके मष्तिष्क में घूमने लगा।

स्वर्णसंगम के दुर्दांत जंगलों में आर्यन आखेट  हेतू अपने मित्रों संग भटक रहा था।प्रत्यंचा पर बाण चढ़ाये, शिकार की किसी भी गतिविधि के प्रति पूर्ण सजग , वह किसी चालाक शिकारी के भाँति प्रतीक्षारत था। तभी, कुछ दूर से उसने एक सरसराहट महसूस की, और पलक झपकते ही, ध्वनि की दिशा में,वायु को चीरता  बाण निकल चला।उसके अधरों पर विजयी मुस्कान आ गयी।मगर यह स्थिति क्षणिक थी।झुरमुटों के पीछे से निकलते एक हाथ ने वह बाण पकड़ लिया था।

स्वर्णसंगम का यह राजकुमार अल्पायु में ही विभिन्न युद्धकलाओं एवं विद्यायों में पारंगत है। अस्त्र-शस्त्र की सभी विधाओं का ज्ञाता आर्यन, अपने कौशल और पराक्रम के लिए विख्यात है। अब तक के जीवनकाल में कभी असफल न होने वाले आर्यन के लिए यह पहला अवसर था, जब किसी ने उसका मार्ग अवरुद्ध किया था। होंठो पर चंचल मुस्कान लिए, वह शीघ्र ही नव-आगंतुक के समीप जा पहुँचा।

तीर को हाथ में पकडे एक अल्पायु का बालक सीधे उसे घूर रहा था। वहीं जमीन पर एक मृग-शावक पड़ा था, जिसके पैर पर एक पट्टी बंधी थी।

आर्यन- तुम्हारा नाम क्या है मित्र ? इस भीषण वनक्षेत्र में तुम क्या कर रहे हो? क्या तुम मार्ग भटक गए हो?

बालक-मेरा नाम ध्रौव्य है, और मैं इसी वनक्षेत्र का वासी हूँ। यहाँ से कुछ योजन पर मेरी कुटी है।आप सब अपना परिचय देने का कष्ट करें।

आर्यन- मैं स्वर्णसंगम का राजकुमार, आर्यक पुत्र आर्यन हूँ। और यह सब मेरे मित्र हैं। हम सब यहाँ आखेट हेतु आये हैं। किन्तु, तुमने बीच में पड़कर मेरी सारी मेहनत बर्बाद कर दी।

ध्रौव्य- आप क्षत्रिय हैं।आपका धर्म, लोगों का पालन एवं रक्षा करना है, न कि निरीह पशुओं का वध करना।

आर्यन- आखेट करना हर क्षत्रिय का अधिकार है।

ध्रौव्य- और यह अधिकार किसने दिया? अपने अधिकार का निर्धारण स्वयं कर लिया?
निरीह पशुओं को मारकर कौनसी वीरता का प्रदर्शन करना चाहते हो?

आर्यन के मित्र समूह में से एक -

देवक- मूर्ख! तेरा इतना दुस्साहस! जानता भी है किस से बात कर रहा है!

ध्रौव्य-नहीं जानता! जानने की आवश्यकता ही नहीं है।

देवक-(तलवार निकाल कर) मुझसे युद्ध कर दुष्ट! तेरी जिह्वा को मुख से अलग कर दूँगा।

ध्रौव्य-दोधारी तलवार से सावधान रहना चाहिये! घाव हो सकता है! आपकी आयु अभी खेलने-कूदने की है।

आर्यन- मैं तुम्हारी निडरता से प्रभावित हूँ ध्रौव्य! किन्तु, निडरता और उद्दंडता में भेद करना शीघ्र ही सीख लो।यही तुम्हारे हित में होगा।
आशा करता हूँ, अगली बार मेरी राह में नहीं आओगे।

ध्रौव्य-जब हवा का रुख़ विपरीत हो, तो स्वयं मुड़ जाना चाहिए। उम्मीद है यह बात आपको समझ आ गयी होगी स्वर्ण-वीर।

आर्यन-मत भूलो कि,यह वनक्षेत्र मेरे पिता के राज्य में आता है।

ध्रौव्य- यह संपूर्ण वनक्षेत्र मेरा निवास-स्थल है , और मेरे गृहक्षेत्र में किसी प्रकार के रक्तपात की अनुमति नहीं !

आर्यन- मैं चेतावनी दे चुका हूँ।विदा ध्रौव्य!

इसके पश्चात वह अपने मित्रों संग स्वर्णसंगम लौट आया। लेकिन उसका कुछ हिस्सा शायद अभी भी वहीं था, ध्रौव्य के पास! उसकी निडरता, दयालुता और उसकी दृढ़-निश्चयी प्रकृति! जैसे ख़ुद आर्यन का अक्स उसके सामने खड़ा था। ध्रौव्य की उद्दंडता के पश्चात् भी आर्यन उससे क्रुद्ध नहीं था। अपने प्रशंसक-मित्रों से घिरा रहने वाला आर्यन हमेशा से एक ऐसा मित्र चाहता था, जो उसकी ख्याति की चकाचौंध से इतर, असली आर्यन को पहचाने।


(आर्यन धीमी आवाज़ में खुद से बात करता है।)
आर्यन- बहुत ही उद्दंड है वह। अगली बार उसको सजा दूंगा।
अंतर्मन- अगली बार का इंतजार क्यों? सजा तुम आज ही दे सकते थे।
आर्यन- वह मित्रविहीन है। ऐसे ही अकेला रहेगा। संस्कार-हीन !
अंतर्मन-( व्यंग्य से) और तुम्हारे आस-पास  जो प्रशंसक रहते हैं, उन्हें मित्र कहते हो?सत्य तो यह है कि तुम खुद उसके जैसा बनना चाहते हो!

आर्यन- मैं नहीं जानता! कल  फिर उस स्थान पर जाऊंगा। और अगर वह मुझसे टकराया, तो यह उसके हित में नहीं होगा।
अंतर्मन-(परिहासपूर्वक) हाँ! कल देखते हैं!

स्थान-कमिश्नर राजन मेहरा का घर, राजनगर।
समय- सुबह, ध्रुव के गश्त से घर लौटने का वक़्त।

रजनी- इन बाप- बेटे को तो मेरी परवाह ही नहीं। हरदम काम और अपराधियों के पीछे दौड़ते रहते हैं।जैसे घर के प्रति इनकी कोई जिम्मेदारी नहीं। आज फिर नाश्ते के वक़्त दोनों गायब हैं।

श्वेता- क्या बात है ,मम्मी! लगता है आज भैया की शामत आने वाली है।

रजनी- आज मैं कुछ सुनने के मूड में नहीं हूँ। कोई मजाक नहीं।चुप करके नाश्ता कर।

श्वेता- वाह मम्मी! वाह! आज आपने साबित कर ही दिया कि आप 'महान वैज्ञानिक श्वेता मेहरा' की माँ हो।
मैं कब से कहती आ रही हूँ! सुनने से अच्छा सुनाना होता है। और भैया कहता है कि मैं बहुत बोलती हूँ। आज चुप मत होना मम्मी!

रजनी- हाँ अब चुप कर! मेरी ही गलती है जो तुझसे उलझने की भूल की।और ये ध्रुव अब तक क्यों नहीं आया!

श्वेता- घूम रहा होगा कहीं! साहबजादे की आवारागर्दी बढ़ती ही जा रही है। मैं तो कहती हूँ, आपने ही भैया को बिगाड़ रखा है। एक बार कान पकड़ो, मजाल तो हो जो दोबारा रात को मटरगश्ती करे! हुँह!

रजनी-(हँसते हुए) हाँ ! हाँ! समझ गयी।अब तेरा भैया पुराण चलता ही रहेगा, या नाश्ता भी करना है?

श्वेता-(रजनी के गले लगते हुए)मेरी अच्छी मम्मी! जल्दी जल्दी अपने आलू के पराँठे लाओ। शेर भूखा है!

रजनी-(हँसते हुए) और शेर आलू के पराँठे भी खाता है!

श्वेता- कुक मेरी माँ जैसा हो, तो बिलकुल खायेगा।

रजनी-(पराँठा रखते हुए) ध्रुव कल भी पूरे दिन नहीं आया। मुझे चिंता हो रही है। बता कर भी तो नहीं गया। एक बार उसके दोस्तों से पता कर  लेना बेटा!

श्वेता-(मन ही मन चौंकते हुए) अरे किसी केस में बिजी होगा माँ। आप फ़िक्र मत करो। मैं  कमांडो हेडक्वार्टर से होकर ही लैब जाऊंगी।

रजनी- ठीक है।

स्थान-कमांडो हेडक्वार्टर

श्वेता-हैलो करीम! रेनू और पीटर नहीं दिख रहे। कहीं गए हुए हैं?

करीम- हाँ!

श्वेता-क्या बात है कमांडो! चेहरा उतरा हुआ क्यों है?

करीम- वह , कुछ नहीं। तुमको ऐसे ही लग रहा है।

श्वेता-(सशंकित अंदाज में) मुझसे क्या छुपा रहे हो? और भैया कहाँ है? मम्मी कह रही थीं कि कल भी घर नहीं आया था!

करीम-(गहरी साँस लेते हुए) कैप्टेन का कल सुबह से कुछ पता नहीं है श्वेता!

श्वेता-क्या मतलब?

करीम-कैप्टेन से कल से कोई संपर्क नहीं है। स्टार ट्रांसमीटर पर भी संपर्क नहीं हो पा रहा।अभी पीटर और रेनू के साथ सभी कैडेट्स राजनगर के हर इलाके में कैप्टेन को खोज रहे हैं।

श्वेता-(यह तो काफी सस्पेंस वाली बात है। एक दिन में भैया , मिस्टर इंडिया कैसे बन गया!) इस बारे में कोई अपडेट?

करीम- कैप्टेन की बाइक राजनगर के समुद्री इलाके के पास से मिली है। वहाँ पूछताछ से मालूम पड़ा, एक मछुवारे ने कैप्टेन को समुद्र तट की तरफ जाते देखा था। इसके अलावा कोई क्लू नहीं है।

श्वेता-वहाँ के समुद्र तट की तलाशी ली? शायद कोई क्लू मिले।

करीम-ले चुके हैं। कुछ नहीं मिला।

श्वेता- इस बारे में पापा को कोई खबर है?

करीम-हम इस खबर को लीक नहीं करना चाहते।वर्ना अपराधियों के हौंसले बुलंद हो जायेंगे।

श्वेता- तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे भैया लापता हो गया है। शायद किसी केस में उलझा हो!

करीम-कैप्टेन ने डॉ० वायरस की फाइल्स चेक करने को कहा था।शायद कैप्टेन का वायरस से टकराव हुआ है। और अब तक कैप्टेन से संपर्क न होना खतरे की निशानी है।

श्वेता- अभी कुछ कहा नहीं जा सकता, जब तक कि कोई ठोस सुबूत न मिल जाए।

करीम- सुबूत के इंतजार में हम हाथ पर हाथ रखे नहीं बैठ सकते।शायद कैप्टेन को मदद  की जरुरत हो।

श्वेता-हाथ पर हाथ रखे बैठने की कोई जरुरत नहीं। तुम अपने स्तर से प्रयास करो। मैं स्थिति को स्पष्ट करने की कोशिश करती हूँ। जैसे ही कोई खबर मिले, मुझे कांटेक्ट करना।

करीम- तुम घर जाओ श्वेता। कैप्टेन को हम जल्द ही ढूंढ निकालेंगे। ये मेरा वादा है।

श्वेता- कुछ वादे शायद टूटने के लिए ही बने होते हैं।मेरा दिल कहता है , इस बार सब कुछ ठीक नहीं है। मैं इन हालातों में हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती।

(इतना कहकर श्वेता तेजी से निकल जाती है।)

अज्ञात स्थान पर किसी समय-
डॉ० वायरस-(गुस्से से) मैंने बिलकुल वैसा ही किया जैसा तुमने कहा। फिर मुझे क्यों इस तरह बंधक बनाया गया है?

पहला नकाबपोश-क्यों वेवजह उत्तेजित हो रहा है पापी! तू इस शतरंज का एक छोटा सा प्यादा है। और प्यादों का काम बड़े मोहरों के लिए मार्ग बनाना होता है। तुझे तो प्रसन्न होना चाहिए! अपने संपूर्ण जीवनकाल में पहली बार तू कोई कार्य सफलता से कर पाया है।

डॉ० वायरस- क्या मतलब?

दूसरा नकाबपोश-अर्थ जान कर क्या करेगा मूर्ख?

पहला नकाबपोश-इसके मस्तिष्क से सभी सूचनाएं मिटा कर इस स्थान के रक्षक दल को सूचित कर दो।

दूसरा नकाबपोश- जो आज्ञा!

पहला नकाबपोश- शीघ्र ही हमें सूचित करना। समय रहते प्रस्थान करना होगा।

स्थान-महानगर

भारती और नागराज वेदाचार्य के बुलावे पर ऑफिस से छुट्टी लेकर घर पहुँचते हैं।

भारती- क्या समस्या है दादाजी! आप चिंतित लग रहे हैं।

वेदाचार्य-हाँ! यह विकट समय है। ऐसे में मेरा चिंतित होना ,आश्चर्य की बात नहीं।

नागराज-मैं कुछ समझा नहीं दादाजी!

वेदाचार्य- जिन रहस्यमयी तरंगों के बारे में मैंने बताया था नागराज,कल उनको फिर महसूस किया।मैंने जब उनको पढ़ने की कोशिश की तो मुझे एक जोरदार झटका लगा, जिसके फलस्वरूप मैं कई घंटों तक बेहोश रहा।

भारती-उफ्फ दादाजी! किसकी हो सकती हैं ये भीषण तरंगे?

वेदाचार्य- यह अभी भी रहस्य है। लेकिन मेरी गणनाओं से कुछ रहस्यों से पर्दा उठा है। इसीलिए तुमको यूँ अचानक बुलाया है।

नागराज-यह तो अच्छी खबर है दादाजी।क्या मालूम पड़ा?

वेदाचार्य-नहीं, यह अच्छी खबर नहीं है। आने वाला समय चुनौतियों से भरा है।
यह तो बस शुरुवात है!एक भंयकर तूफान करवट बदल रहा है, जो युगों से शांत था। ग्रहों की चाल से अनिष्ट की सम्भावना स्पष्ट है।

नागराज- आप मुझे चिंतित कर रहे हैं दादाजी। इतना बड़ा खतरा हमें किस से हो सकता है?


हिस्स- फुस्स! हिस्स- फुस्स!

वेदाचार्य-देखो भारती! कौन आया है।

नागराज- यह भारती भी न! देखिये कैसी कॉलबेल लगायी है दादाजी!

वेदाचार्य- यह बचपना दिखाने का समय नहीं है।

नागराज-(बुझी आवाज़ में) ओके!

(तभी भारती के साथ श्वेता आती है)

श्वेता- प्रणाम दादाजी! हाय नागराज!

नागराज-श्वेता! तुम यहाँ! अचानक, बिना खबर किये?

श्वेता-हाँ नागराज! वक़्त की जरुरत कुछ ऐसी पड़ गयी, मुझे आनन-फानन यूँ आना पड़ा। वैसे भी! क्या मैं यहाँ आ नहीं सकती?

भारती-(नागराज को गुस्से से घूरते हुए)जरूर! ये भी तुम्हारा ही घर है श्वेता!

नागराज-(सावधानी पूर्वक, भारती से निगाहें चुराते हुए) ध्रुव की क्या खबर है। ठीक है न?

श्वेता- इसीलिए मुझे आना पड़ा। भैया की कल से कोई खबर नहीं। वह शायद डॉ० वायरस से लड़ने गया था। मैं चाहती हूँ कि दादाजी भैया की तरंगों का पीछा कर उसकी स्थिति ज्ञात करें। शायद भैया को मदद की जरुरत पड़े।

वेदाचार्य-ठीक है। मुझे इसके लिए एकांत चाहिए। तुम लोग यहाँ बातें करो। मैं थोड़ी देर में आता हूँ।
(और वेदाचार्य उठ कर दूसरे कक्ष में चले जाते हैं।)

भारती-(चिंतित स्वर में) अरे! इतनी सी बात के लिए तुम परेशान होकर इतनी दूर तक आयी हो।ध्रुव उसको कई बार आसानी से हरा चुका है।इस बार भी हरा देगा।

नागराज- वह शैतान खोपड़ी मामूली चीज नहीं! बाजील को बना,नाक में दम कर डाला था कम्बख्त ने! महामानव जैसे तीस मार खान तक को नहीं छोड़ा! उसे तिगनी का ऐसा नाच नचाया! अब सपने में भी वायरस को ही देखता होगा ठिगना! गुर्रर!

श्वेता-हम्म! और इस बार वायरस पहले से ज्यादा तैयारी करके आया है।

(श्वेता उन्हें राजनगर पर हुए बायोलॉजिकल अटैक के बारे में बताती है।)

श्वेता-भैया पर मुझे पूरा भरोसा है, लेकिन जाने क्यों , इस बार मन सशंकित  है। सभी हालात चीख -चीख कर कुछ गलत होने का आभास दिल रहे हैं।

भारती- नागराज भी तो कभी- कभी हफ्ते भर गायब रहता है।अभी बिना किसी सुबूत के अटकलें लगाने से कोई लाभ नहीं।और इस सब के पीछे वायरस है भी, अभी यही साबित नहीं हुआ।

श्वेता-भैया घर पर कांटेक्ट में भले ही न रहे, लेकिन कमांडो हेडक्वार्टर से हमेशा कनेक्टेड रहता है। लेकिन कल से वहाँ भी कांटेक्ट नहीं किया। और हम सुबूत का इंतजार करने नहीं बैठ सकते।

नागराज- चिंतित न हो श्वेता! दादाजी सभी आशंकाओं का निवारण कर देंगे।

(तभी वेदाचार्य वापस आते हैं।)

वेदाचार्य- वही हुआ, जिसकी मुझे आशंका थी। राजनगर के पहाडी क्षेत्र से  ध्रुव की तरंगों का आभास हो रहा है। किंतु ये तरंगे शक्तिशाली नहीं हैं। उस स्थान के आगे कहीं पर भी ध्रुव की तरंगों का आभास नहीं हो रहा।

श्वेता- मैं समझी नहीं दादाजी!

वेदाचार्य-  बात को इस तरह समझो। इंसानी शरीर हमेशा खास प्रकार की तरंगें छोड़ता रहता है। यह तुम जानती ही होगी।

श्वेता- हाँ।

वेदाचार्य- हम जहाँ कहीं भी जाते हैं, उन तरंगों की कुछ ऊर्जा उस स्थान के साथ रह जाती है। लगातार क्षरण की वजह से यह ऊर्जा उस स्थान पर अधिक मात्रा में होती है, जहाँ आप मौजूद होते हैं। उदाहरण के लिए, अभी तुम यहाँ उपस्थित हो। तो पूरी पृथ्वी पर  जहाँ -जहाँ तुम गयी हो, वहाँ तुम्हारी ऊर्जा होगी लेकिन सबसे ज्यादा यहाँ केंद्रित होगी। यह समय के साथ स्थान को धीरे - धीरे छोड़ती है।सबसे कम ऊर्जा वहाँ मिलेगी, जहाँ तुम सबसे पहले गयी होगी।

श्वेता-ओह ! समझ गयी। इसका मतलब , जहाँ से आपको भैया की तरंगें मिलीं, वहाँ भैया गया था, लेकिन अब चला गया है।

वेदाचार्य- यही तो चिंता का विषय है। उस स्थान के आगे कहीं भी ध्रुव की ऊर्जा तरंगे नहीं मिल रहीं। मानो उस स्थान से ध्रुव पृथ्वी से गायब हो गया हो।

नागराज-यह कैसे संभव है?

वेदाचार्य- जैसा भी हो, किन्तु यही सत्य है।

नागराज- ओह! फिर तो वहाँ छानबीन करनी होगी।मामला संदिग्ध है।

श्वेता- मैं करीम को इन्फॉर्म करती हूँ। वह वहाँ कुछ कैडेट्स को भेज देगा।

वेदाचार्य- नहीं! वहाँ एक रहस्मयी ऊर्जा भी उपस्थित  है। और उन रहस्यमयी मानसिक तरंगों का आभास भी मुझे इसी क्षेत्र से हुआ था नागराज।  तुम स्वयं वहाँ जा कर जांच करो।

नागराज- ठीक है दादाजी!

वेदाचार्य- भारती और श्वेता! तुम दोनों मेरे साथ आओ! तुम्हारे लिए भी कुछ काम है।

नागराज- मैं शीघ्र ही छानबीन करके लौटूंगा!

(इतना कहकर नागराज चला जाता है।)


किसी अज्ञात स्थान पर-

एक युवक और युवती ,एक विशाल झरने के समीप कुछ लताओं के पीछे बैठे हैं। यहाँ के शांत वातावरण में कोयल की मधुर गूंज बहुत ही प्यारी लग रही है। झरने की कल-कल भी जैसे वाद्ययंत्र का काम दे रही है। ऐसे मन को मोहने वाले वातावरण में यह प्रेमी जोड़ा भी इस वातावरण का पूरक ही है।

युवती- देवगण नहीं चाहते हमारा मिलन हो।

युवक- फिर तुम किसे चुनोगी?

युवती- मैं नहीं जानती कल मैं क्या करने वाली हूँ। एक ओर मेरा प्रेम होगा और दूसरी ओर मेरा कर्तव्य। प्रेम का सानिध्य प्राप्त करने हेतू, कर्तव्य से विमुख होना पड़ेगा। और कर्तव्य का निर्वाह किया तो प्रेम को खो दूंगी। इस धर्मसंकट से कैसे बाहर निकलूँ?

युवक- तुम जानती हो मैं तुमसे इतना प्रेम क्यों करता हूँ?

युवती- तुम मुझे प्रेम करते हो, यही मेरा सत्य है। इससे अधिक,न मैंने सोचा! न चाहा!

युवक-निसंदेह रूप में तुम सभी स्त्रियों में अग्रणी हो। किन्तु, इससे भी बढ़कर, तुम मेरी आदर्श हो! मुझे कभी तुम्हारे निर्णय पर संदेह नहीं हो सकता। और मैं पूर्ण आश्वस्त हूँ, कल तुम सर्वोचित निर्णय लोगी।

युवती-कल जो भी हो! किन्तु स्मरण रहे , यह प्रेम मिथ्या नहीं है। कोई, कभी भी, मेरे हृदय से तुम्हारा स्थान नहीं ले सकता।
 युवक- तुम्हारे प्रेम पर संदेह करने का प्रश्न ही नहीं उठता। फिर भी! इस समस्त सृष्टि एवं ईश्वर को साक्षी मान कर मैं  यह प्रतिज्ञा करता हूँ-" मेरे जीवन में तुम्हारा स्थान कोई नहीं लेगा।कल को अगर तुम मुझसे मुँह भी मोड़ लो, फिर भी , मैं अनंत काल तक तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा!"

भड़ाम!

दरवाजा जोर से खुलता है।

 रोबो-नताशा! एक महत्वपूर्ण सूचना है! जल्दी से कम्युनिकेशन सेंटर में आओ!

नताशा- ओके डैड! आप जाइये ! मैं आती हूँ!

(रोबो चला जाता है।)

नताशा- यह कैसा अजीब सपना था। ध्रुव किसी लड़की से प्यार का इजहार कर रहा था! मुझसे तो ठीक से कह नहीं पाया आज तक! (मुस्कुराते हुए)वेवकूफ!
लेकिन यह लड़की कौन थी? ऐसा क्यों लगता है जैसे मैं उसको एक अर्से से जानती हूँ। (शरारती मुस्कराहट के साथ)अब जाने भी दे नताशा! क्या अपने हीरो का इस फ़िजूल सपने के पीछे जनाजा निकालेगी!

शायराना अंदाज में-

दिलबर से आँखें चार किये, इक जमाना गुजर गया,
कि अब तलब भी है,तड़प भी है, सनम के दीदार की!

स्थान-कम्युनिकेशन सेंटर, रोबो सिटी।

नताशा- मॉर्निंग डैड! क्यों सुबह-सुबह मेरी नींद ख़राब की?

रोबो-यह देखो!

(इतना कहकर रोबो एक वीडियो फ़िल्म प्ले करता है। फिल्म के ख़त्म होते-होते कई रंग नताशा के चेहरे पर आकर गुजर जाते हैं।)

रोबो- यह अभी-अभी हमको मिला है। मैं इसको कहीं से भी ढूंढ निकालूंगा।

नताशा-आप कुछ नहीं करेंगे डैड! ये नहीं जानता इसने नताशा के दिल पर वार किया है। कमांडर नताशा नाम की सुनामी जब आयेगी तो सब कुछ तबाह कर देगी।
 मौत सजा नहीं होती! यह तो बस बच निकलने का जरिया होती है। उसकी मौत के हर दरवाज़े पर ताला लगा देगी- जल्लादों की भी जल्लाद  ब्लैक कमाण्डर, नताशा!

रोबो- मैं समझता हूँ, तुम पर क्या बीत रही है! लेकिन यह वक़्त सोच समझकर कदम उठाने का है।क्योंकि,एक  गलत कदम हमें बना सकता है, शिकारी से 'शिकार'!

कहानी जारी रहेगी, तीसरे भाग - 'शिकार'  में।

4 comments

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दिव्यांशु

जैसी आपसे आशा थी आपने वैसी ही बेहतरीन कहानी लिखी।
ईस कहानी में नागराज को देखकर मजा आ गया।
आर्यन और dhrawya का करैक्टर अच्छा लगा। उनके बारे में और जान्ने की उत्सुत्कता हो गई हैं।
वायरस की तो लग रहा है कोई इज़्ज़त ही नही हैं ।
भारती की घर की घंटी बहुत बढियां थी।
आपने रोमांटिक एंगल भी डाला। जो की बढियां था।
आखिर में एक बढियां सस्पेंस के साथ ईस भाग का अंत किया आपने।
अगले भाग का बेसब्री से ईन्तज़ार रहेगा।

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आगे बहुत कुछ मिलने वाला है। अगले भाग में कुछ रहस्यों से पर्दा उठेगा। मैं आगे भी पाठको की उम्मीदों पर खरा उतरने का पूरा प्रयास करूँगा! अपना कीमती वक़्त देने के लिए शुक्रिया!

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bhai iska pehla bhag ka kya nam hai?

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'वायरस का वायरस' इस श्रृंखला का पहला भाग है।

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