Thursday, 5 January 2017


COP प्रस्तुत करते हैं

खूनी हंसी

लेखक - दिव्यांशु त्रिपाठी

 फ़ोन के बजने की आवाज़ से मेरी आँख खुली | मैंने टेबल पर रक्खे हुए अपने फ़ोन को उठाया |
“हेल्लो”
“ हेल्लो समीर, में अंजलि बोल रही हूँ |”
उसने एक शब्द भी नहीं बोला मगर मुझे अंदाजा हो गया था की वो क्या चाहती हैं, मगर मैंने फिर भी पुछा ,” क्या हुआ ?”
“ मैंने और मेरे दोस्तों ने आज रात पार्टी करने के बारे में सोचा हैं, तो में सोच रही थी की क्या तुम मेरा नाईट शिफ्ट कर लोगे ?”
“ ठीक है | वैसे भी मुझे अपने रूम का किराया देने के लिए एक्स्ट्रा शिफ्ट करनी ही हैं |
में अपने अपार्टमेंट की बिल्डिंग के पूल में एक लाईफगार्ड के तौर पर काम करता हूँ | मुझे ये जॉब बहुत अच्छी लगती है | मेरे अपार्टमेंट की बाकी सब चीज़ों की तरह ही पूल का रख रखाव बहुत ख़राब तरीके से किया जाता हैं | इसका एक कारण ये भी हैं की पूल बिलकुल बिल्डिंग के नीचे हैं तो वह पर सूरज की रोशिनी  आ ही नहीं पाती है |
में लिफ्ट से नीचे उतरा और एक छोटे से गलियारे को पार करते हुए पूल तक पहुच गया | मुझे वहा कोई लाईफगार्ड नहीं दिखाई दिया जबकि पूल को चोबीसो घंटे निगरानी में रखने का आदेश दिया गया था | खासकर के की दिन के इस समय पर जब बहुत अधिक लोग नहाने के लिए आते है | मैंने अपनी घडी देखि , उसमे शाम के सात बज रहे थे | इस समय पर तो हमेशा काफी लोग रहते हैं अमूमन मगर आज क्या हो गया | मैंने सोचा पर फिर मैंने सोचा की अच्छा है आज काम के समय भी आराम हो जायेगा |
मैं वह रक्खी अपनी लाईफगार्ड की कुर्सी पर गया और जाके बैठ गया मगर मुझे उस कुर्सी के अगले हिस्से में कुछ खून के दाग दिखे | मुझे लगा की क्या पता की मेरे पहले जो बंदा ड्यूटी पर था उसका किसी ऐसे बच्चे से पाला पड़ा होगा जिसकी नाक से खून बह रहा होगा या कुछ और बात हुई होगी | इस बात से मुझे याद आया की मुझे ये देख लेना चाहिए की मेरे पहले कौन बंदा ड्यूटी पर था क्योकि अगर बॉस को पता चलेगा की किसी ने अपनी शिफ्ट पूरी नहीं की है तो वह बहुत नाराज़ हो जायेंगे | मैंने देखा की आखिरी बंदा जो अपनी ड्यूटी पर था वो आनंद था | मुझे हैरानी हुई क्योंकि आनंद उन लोगो में से नहीं हैं जो बिना बताये अपनी ड्यूटी छोड़ कर चल दें, पर अब इस बारे में कुछ किया नहीं जा सकता था |
मैंने वह पर रखे हुए रद्दी कागजों से कुर्सी को साफ़ किया और क्योकि कोई आदमी वह पर नहाने को आया नहीं था तो मैंने कुछ देर सो गया |
मुझे पता नहीं चला की में कितनी देर से सोया हुआ था जब कुछ बच्चो की हँसने की आवाज़ सुनकर मेरी आँख खुली, मगर मुझे इतनी जोर की नींद आ रही थी की में वापस से गया |
अगली बार मेरी नींद खुली तब एकदम सन्नाटा छाया हुआ था| मैंने अपने मोबाइल में समय देखा तो सुबह के तीन बज रहे थे | में सात घंटे से सो रहा था | मुझे कुछ याद नहीं आ रहा था सिवाय इस बात के की मैंने कुछ बच्चो की आवाज़ सुनी थी मगर मुझे ये सोच कर हैरानी हुई की इतनी रात को कौन बच्चे यहाँ पर आयेंगे | मैंने उठ कर देखा तो पूल में उस समय कोई बच्चे नहीं थे | मैंने दुबारा सोने के लिए जैसे ही आँखे बंद की मुझे अपने कुर्सी के अगले हिस्से में खून दिखाई दिया, उसी जगह पर जहाँ पर मैंने पहले देखा था | में कसम खाकर कह सकता हूँ की मैंने उस समय कुर्सी पर से से खून साफ़ किया था | मैंने उठकर देखा तो कुर्सी से पूल तक की जमीन गीली था | मैंने सोचा की क्या पता उन बच्चो की ही शरारत होगी |
मैंने फिर से कुछ रद्दी कागजों की मदद से कुर्सी को साफ़ किया और उस कागजों को कूड़े के डब्बे में फ़ेंक दिया | फेंकते समय मैंने ध्यान दिया तो उसमे वो पुराने रद्दी के कागज़ भी पड़े थे जिससे मैंने पहले वो खून के धब्बे साफ़ किये थे |
तो जब मैंने वो खून के धब्बे साफ़ किये थे तो ये नए खून के धब्बे कहा से आ गए | जरूर उन बच्चो ने ही कुछ किया होगा , मैंने सोचा | पर जब मैंने वापस कुर्सी पर खून लगा हुआ था  | मुझे लगा की इस बार तो बच्चो ने ये काम नहीं किया हैं | मैंने ऊपर देखा तो वह ऊपर के पैनल से खून गिर रहा था | मैंने सोचा की मुझे मैनेजमेंट को बताना चाहिए पर उन्हें बताने का कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि उन्होंने ने तो कोई भी काम टाइम से न करने की कसम खा रक्खी है | इसलिए मैंने अपने हाथों में दस्ताने पहने और खुद ही कुर्सी पर चढ़कर पैनल के अन्दर झाखाने लगा | वह पर घुप्प अँधेरा था इसलिए मुझे वह पर कुछ  दिख नहीं रहा था | मैंने अपने मोबाइल से रोशिनी की तो में वहां के दृश्य को देखकर आवक रह गया | वह पर आनंद की लाश पड़ी हुई थी | उसका मूह खुला हुआ था और उसके मुहं में से जीभ निकल ली गयी थी और उसके चेहरे पर किसी के खून भरे हाथ का निशान था | में बहुत ज्यादा घबरा गया था और उस घबराहट के कारण में वह से हिल भी नहीं पा रहा था की तभी मैंने कुछ बच्चो के हँसने की आवाज़ सुनी , मगर मैंने पूल का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ तो नहीं सुनी थी |
उसके बाद् मैंने पूल में किसी के उतरने की आवाज़ सुनी | मैंने सुना की पूल से कोई ऊपर चढ़ रहा है और मेरी तरफ बढ़ा चला आ रहा हैं | डर के मारे में नीचे देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था | डर के मारे मेरी सासें बहुत तेज़ हो गयी थी | किसी के ठन्डे हाथों ने मेरे पैरो को छुआ | अब मेरी घबराहट एकदम चरम सीमा पर पहुच गयी थी जिसके कारण में वह पर से गिरा और मेरा सर वह रक्खे टेबल से टकरा गया और बहोश हो गया |
कुछ देर बाद मेरी आखें खुली तो मुझे सब कुछ याद आया और में वह से बहार निकलने के लिए दरवाज़े की तरफ भागा | मगर दरवाज़ा खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था |
अब तो में बुरी तरह से घबरा गया था | मेरे हाथ और पैर अब जवाब देने लगे थे | में अपनी कुर्सी के पास वापस आया और मैंने देखा की कुर्सी के आसपास बहुत ज्यादा खून फैला हुआ था | ऊपर का पैनल भी अभी तक खुला हुआ था | मैंने वह पर लगी हुई घडी देखि तोह उसमे सुबह के सात बज रहे थे , इसका मतलब की मेरी ड्यूटी १ घंटा पहले जी ख़तम हो गयी थी | मुझे अचानक से उस फ़ोन कॉल की याद आ गयी जिसके कारण आज मुझे ये ड्यूटी करनी पड़ी थी | इसी से मुझे याद आया की मेरे पास तो मोबाइल भी है | मैंने अपना मोबाइल निकल लिया और फ़ोन मिलाने के लिए फ़ोन खोलने की कोशिश की मगर घबराहट में मेरे हाथ ही काम नहीं कर रहे थे | तभी मुझे अपने पीछे वही हँसी फिर एक बार सुनाई दी और पूल के पानी में कुछ हलचल की भी आवाज़ सुनाई दी | में पीछे मुड़कर बिलकुल भी नहीं देखना चाह रहा था मगर जिज्ञासा डर के ऊपर हावी हो गयी | मैंने एक लम्बी साँस ली और पीछे मुड़कर देखा |
पूल बिलकुल खली था मगर अभी भी उसमे से बच्चो के खेलने की आवाज़ आ रही थी | शुरुआत में तो पूल का पानी बिलकुल शांत था मगर धीरे धीरे पूल के बीचो बीच कुछ हलचल दिखने लगी | बच्चो की हँसी की आवाज़ तेज़ हो गयी और पूल में हलचल और बढ़ गयी | उनकी हँसी अब मेरे शारीर को दर्द का एहसास करा रही थी | ऐसा लग रहा था की मेरा दिमाग मेरे शारीर को फाड़ के बहार आ जायेगा | पूल के पानी में हलचल और ज्यादा बढ़ गयी थी और पूल में धीरे धीरे एक चक्रवात जैसा बनने लगा था | में वहां पर एकदम डरा हुआ सा खड़ा था की अचानक से उस चक्रवात में से एक आकृति बहार आने लगी थी |
उस आकृति को शुरुआत में देखकर ऐसा लगा की वो कोई बच्चा हैं | मगर फिर नुझे एहसास हुआ की नहीं ऐसी अजीब सी आकृति कोई इंसान कैसा हो सकता है क्योकि इंसान के शारीर जैसा कुछ भी उस आकृति में मौजूद नहीं था | वो आकृति बिलकुल काली छाया जैसी प्रतीत हो रही थी |
इतना सब हो ही रहा था की अचानक से ही वो आकृति गायब हो गयी और पूल ऐसे शांत हो गया जैसे की वह पर कुछ हुआ ही नहीं था | में बहुत देर तक भौचक्का सा वह पर खड़ा था और जब मुझे होश आया तब में तुरंत दरवाज़े की तरफ भागा |
तभी दरवाज़ा अचानक से अपने आप खुल जाता हैं |
“क्या हुआ समीर तुम इतने घबराए हुए से क्यों हो ?” अंजलि ने मुझसे पुछा |
मेरे मूहं से शब्द बाहर ही नहीं निकल रहे थे | में बस उससे इतना ही बोल पाया की तुम लेट हो गयी हो |
“ तो क्या हो गया उससे तुम्हे ही फायदा हुआ , तुम्हे ज्यादा पैसे मिल जायेंगे “
तभी उसका फ़ोन बजने लगा | “ हेल्लो आनंद | क्या तुम मेरी सुबह की शिफ्ट ले लोगे ? ओके थैंक्यू | “
में भौचक्का सा रह गया | अंजलि आनंद से कैसे बात कर रही थी | मैंने तो अभी अभी उसकी लाश देखि थी | मैंने एक बार फिर पूल की तरफ देखा मगर सब कुछ शांत लग रहा था जैसे की यहाँ कुछ हुआ ही न हो |
“ हाँ तो समीर, मैंने आनंद से बात कर ली हैं | वो अभी थोड़ी देर में आ रहा हैं इसलिए में अब जा रही हूँ | तुम भी जाकर आराम कर लो , तुम्हे देखकर ऐसा लग रहा है की जैसे तुमने किसी भूत को देख लिया हैं |”
मैंने भी अपना सर हिलाया और बाहर जाने के लिए दरवाज़ा खोला की मुझे सामने से आनंद आता हुआ दिखाई दिया | “ हेलो समीर कैसे हो “
उसके शब्द सुनकर मुझे थोडा सुकून मिला और और मैंने कहा, “ बस बढ़िया हूँ |”
उसके बाद में सीधा अपने अपार्टमेंट गया और अपना मोबाइल साइलेंट पर करके लेट गया | मुझे लगा की मैंने कोई बहुत भयावह सपना देखा होगा | कुछ ही देर में मुझे नींद आ गयी |
लघभग आठ घंटे बाद जब में उठा तो मैंने देखा की मेरे फ़ोन पर बहुत सरे मिस कॉल्स और मेसेज पड़े हुए थे | क्योंकि मेरा फ़ोन साइलेंट पर था इसलिए मुझे कुछ पता नहीं चला | मैंने फ़ोन खोल कर देखा तो उसमे आनंद के पांच मेसेज आये हुए थे |
“ समीर तुम्हे पता हैं की ये खून लगे हुए रद्दी कागज़ कहा से आ गए ?”
“ मुझे पता हैं ये बात तुम्हे अजीब लगेगी मगर क्या तुम नीचे पूल पर आ सकते हो |”
“ देखो अब मुझे पक्का लग रहा हैं की यहाँ कुछ अजीब हो रहा हैं | अगर ये सब तुम कर रहे हो तो मैं बता देना चाहता हूँ की मुझे अब अच्छा नहीं लग रहा हैं |”
“ मेरा फ़ोन तो उठा लो | मुझे पता हैं ये सब तुम ही कर रहे हो |”
“ बचाओ “
आखिरी मेसेज पांच घंटे पहले का था | मैंने तुरंत ही अपने कमरे का दरवाज़ा खोला हो नीचे की तरफ भागा | नीचे पहुँच के मैंने देखा की पुलिस वह पर पहले से कड़ी हुई थी और उन्होंने बताया की आनंद की पूल में डूबने से मौत हो गयी थी और किसी ने उसके मूंह में से उसकी जीभ निकाल ली थी | उसके चेहरे पर किसी के खून से सने हुए हाथो का निशान भी था |
अगले ही दिन मैंने अपने काम से इस्तीफा दे दिया |

3 comments

बेहतरीन कहानी है। ऐसी गिनी चुनी हॉरर कथाएँ ही हैं, जिन्हें पढ़ते वक़्त रोमांच का एहसास हुआ। यह उनमे से एक है।
बहुत अच्छे दिव्यांशु भैया।😊

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बहुत खूब दीव्यंशु भाई.. सही जा रहे हो.. रोमांचित करने वाली कहानी थी लेकिन मसाले की कमी है 😂😂

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धन्यवाद भाई ।

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