Wednesday, 21 December 2016

COP प्रस्तुत करते हैं

विषसम्राट (महर्षि देव - भाग 3)

लेखक - राम चौहान

देविका और सौडांगी तेजी से एक ओर बढ़ने लगे।
"आप कुछ ज्यादा ही जल्दी में लगती हैं नागशक्ति।" सौडांगी उसके पीछे चलती रही।
"हां," देविका ने आसमान की तरफ इशारा किया। "वहाँ देखो।"
सौडांगी ने नजरें उठाई तो भौचक्की रह गई।
आसमान में ढेरों चमगादड़ नजर आ रहे थे। शायद उनकी संख्या करोडों में थी।
"ये कैसे?" सौडांगी बोली।
देविका के चेहरे पर अफ़सोस नजर आ रहा था। "रिवील यहाँ आ चुकी है और उसके आने के साथ ही सारी शैतानी शक्तियां भी आजाद हो चुकी है।अब स्वर्णक्षेत्र पर शैतानों का कब्जा होने में देर नही लगेगी।"
"इन्हें रोकने का कोई तरीका तो होगा ही।" सौडांगी ने इस तरह कहा जैसे वो देविका से उस तरीके को इस्तेमाल करने को कह रही हो।
देविका ने उसे क्षण भर देखा।फिर बोली:- "अपने साथियों को ढूंढकर यहाँ से निकल जाओ।बाकि मै संभाल लुंगी।"

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यजूर् अपने रथ में सवार विषनगरी की तरफ चल रहे थे।हर क्षण के साथ शैतानी शक्तियां खड़ी हो रही थीं।कभी कोई इमारत गिरा कर तो कभी रास्ते को बीच से तोड़कर यजूर् का रास्ता रोकने की कोशिश जारी थीं। लेकिन यजूर् रुकने वालो में से नही थे।

आखिर विषनगरी का द्वार नजर आने लगा था।

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चमगादड़ो की अगुआ बनकर रिवील के कदम अंदर पड़ चुके थे।
चारो तरफ से जगह जगह कंकाल जमीन से बाहर आते दिख रहे थे।जिन्हें देखकर रेवेल मुस्कुरा पड़ी। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसे किसी से कोई मतलब नहीं था।

चमगादड़ो के बीच उसकी नजर देविका और सौडांगी पर पड़ी,जो दूर होते जा रहे थे हर पल।
लेकिन रिवील के तो करोड़ो रूप थे।और हर रूप उसके जितना ही ताकतवर।

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यजूर् ने विषनगरी में प्रवेश कर लिया था।
उसकी नजरें आसमान की तरफ उठी।
"इतने चमगादड़?" मन ही मन सोच पड़े यजूर्। "जरूर ये उस युवती की करामात है।"

यजूर् ने तीर निकाला और आसमान की तरफ चला दिया।
देखते ही देखते आसमान से विष वर्षा होने लगी और चमगादड़ गल कर जमीन पर गिरने लगे।
रिवील की नजरें यजूर् की ओर उठ गईं।
"कौन हैं आप युवती? और स्वर्णक्षेत्र में घुसने का दुस्साहस क्यों किया आपने?" यजूर् ने पूछा।
रिवील के लिए ये भाषा समझ से परे थी।इसलिये बिना जवाब दिए वो पलटकर जाने लगी।
यजूर् ने अगले तीर को प्रत्यंचा पर चढ़ाया और अंतिम चेतावनी दी:- "वही रुक जाइये अन्यथा हमे आप पर वार करना होगा।"
रिवील न रुकी।उसे तो पता भी नहीं था कि उसपर वार होने जा रहा है।
यजूर् ने तीर छोड़ा।
तीर रिवील के शरीर में घुसा और आरपार हो गया।
रिवील रुकी।पलटी।
यजूर् चौंक गया। "क्या इस युवती को वार महसुस नही हुआ?"
रिवील ने उसकी तरफ हाथ ऐसे उठाये जैसे पूछ रही हो कि ये क्या हरकत थी।
यजूर् कुछ देर उसे देखता रहा।फिर उसने अगला तीर प्रत्यंचा पर चढ़ाया।
रिवील शांत रही।
तीर चला और रिवील ने हथेली सामने कर ली।आश्चर्यजनक रूप से तीर उसकी हथेली में समा गया।
अभी यजूर् के आश्चर्य की सीमा खत्म भी न हुई थी कि रिवील ने दूसरी हथेली से उसका तीर उसी पर वापस छोड़ दिया।
यजूर् ने तेजी से झुककर खुद का बचाव किया।
"ओह्ह,तो आप किसी आयाम की तरह अपनी शक्तियां इस्तेमाल करती हैं।"
रिवील और यजूर् के टकराव ने देविका और सौडांगी का ध्यान भी खींच लिया था।
सौडांगी:- "ये दिव्य शक्तियों वाला पुरुष कौन है नागशक्ति?'"
देविका(लगातार आगे बढ़ते हुए):- "महर्षि देव के द्वितीय पुत्र यजूर्।इनकी शक्तियों की कोई सीमा नही।शायद ही कोई इन्हें हरा सकेगा।"
सौडांगी:- "रिवील?'
देविका(कुछ सोचते हुए):- "पता नहीं।क्योंकि उसकी शक्तियां भी अनन्त है और अब तक उसकी शक्तियां भी उसे खुद नही पता कि कितनी प्रलयंकारी है।"

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यजूर् के हर वार नाकाम सिद्ध हो रहे थे।हर वार रिवील के लिए किसी आसान से पजल की तरह था,जिसे वो कुछ ही देर में सॉल्व कर देती।

देखते ही देखते काली शक्तियों और कंकालों का एक पहाड़ खड़ा हो गया था यजूर् के आसपास।
इस बार यजूर् के निशाना बदला और तीर जमीन में जा धंसा।
देखते ही देखते उस वार का असर हुआ और सभी कंकाल वापस जमीन में समाने लगे। साथ ही रिवील भी जमीन के अंदर खींचने लगी।
यजूर् के चेहरे पर मुस्कान आई।
रिवील ने प्रतिरोध करने की कोशिश की पर जमीन से खिंचाव और भी बढ़ गया।
रिवील ने प्रतिरोध करना छोड़ दिया और जमीन में समाती चली गई।

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दूर से देविका और सौडांगी दूर से ये दृश्य देख रही थीं।
देविका(मुस्कुराते हुए):- "कहा था न?"

अचानक जोर से जमीन हिलने लगी।
देविका और सौडांगी ने भी जमीन हिलते देख एक दूसरे को थाम लिया।
एक 100 फुट लम्बा इंसानी हाथ बाहर आया। सौडांगी और देविका बहुत दूर होते हुए भी उस हाथ को बेहद करीब महसूस कर रहे थे।
अभी वो सम्भल भी नहीं पाए थे कि 70 फुट दूर एक और 100 फुट लम्बा हाथ निकल आया।
यजूर् अपनी जगह पर खड़ा रहा जबकि देविका और सौडांगी तेजी से और दूर होने लगे।
अभी दोनों ज्यादा दूर भी नहीं हुए थे कि अचानक 200 फुट से भी लम्बी रिवील बाहर निकल आई।
यजूर् की आँखों से आश्चर्य झलक रहा था।
रिवील ने यजूर् की तरफ यूँ देखा जैसे कह रही हो कि मेरे रास्ते में मत आओ।

यजूर् नही रुका और लगातार तीन तीर उस पर चला दिए।
नतीजा वही।सभी तीर उसके आर पार हो गए।रिवील यूँ हंसी जैसे यजूर् के तीरों का उपहास कर रही हो।
रिवील यजूर् पर बिना हमला किये पलटकर जाने लगी।जैसे यजूर् के वार उसके लिए कोई महत्व न रखते हो।

यजूर् के लिए भी ये काफी शर्मनाक था।जिसे स्वर्णक्षेत्र में हर तीर का ज्ञान था जो हर तीरंदाज से श्रेष्ठ था।एक युवती को रोक नहीं पा रहा था।
अंत में उसने एक फैसला किया।
मन ही मन वो नागशक्ति का आह्वान करने लगा।
नागशक्ति का आह्वान हो और देविका को पता न चले ऐसा हो ही नहीं सकता।
"अब यजूर् के मन में क्या चल रहा है?" मन ही मन सोचती नागशक्ति उसके सामने जा खड़ी हुई।
"कहो यजूर्?" देविका सामने जा खड़ी हुई।
यजूर् ने देविका को प्रणाम किया।
"प्रणाम नागशक्ति।आज प्रथम बार मैने आपका आह्वान किया है और वो भी इसलिये क्योंकि मै ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल नही करना चाहता।"यजूर् बोला।
देविका:- "मुझे पता है कि जब तक तुम बहुत ज्यादा जरूरत नही समझोगे मुझे याद नहीं करोगे।कहो क्या चाहते हो?'
यजूर्:- "आपसे आज्ञा चाहता हूं कि आप मुझे सामने बस रहे विषकुंड को तोड़कर विषप्रपात को आजाद करने की अनुमति दें।"
इतना सुनते ही देविका की भृकुटि तन गई।एक साथ हजारो नाग उसके शरीर से बाहर झाँकने लगे।बेहद डरावना दृश्य था।
"यह क्या कह रहे हो तुम? क्या तुम होश में हो यजूर्? या तुमने भांग पी रखी है? यदि तुम महर्षि देव के पुत्र न होते तो इसी क्षण मै तुम्हे मृत्युदण्ड देती।"देविका गरजी।
यजूर्:- "मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं है नागशक्ति।परंतु कारण वह युवती है जिस पर किसी वार का असर नहीं हो रहा।उसके हर बढ़ते कदम के साथ काली शक्तियां शाप मुक्त हो रही हैं।यदि ऐसा हुआ तो देव पुत्रों की जगह काली शक्तियां यहाँ राज करेंगी।"

देविका कुछ क्षण सोचती है।
देविका:- "परन्तु तुम जानते हो यजूर्।यदि विषकुण्ड का विष मुक्त हो गया तो स्वर्णक्षेत्र डूब जायेगा और नागबल का वजूद भी समाप्त हो जायेगा।
*(नागबल के बारे में जानने के लिए पढ़ें अज्ञात सीरीज)*

यजूर् :- "मै जानता हूँ नागशक्ति।परन्तु अब कोई उपाय नहीं नजर आ रहा।आज मै आपसे अपना वरदान चाहता हूं जो मैने कभी नहीं माँगा था।"
देविका मजबूर थी।भूतकाल में दिया गया वचन आज पूरा करना था।
देविका:- "ठीक है यजूर्।तुम विषबाण चला सकते हो।"

यजूर् ने तुरंत ही विषबाण चला दिया।
विषकुण्ड एक ही निशाने में टुटा और विषप्रपात बहने लगा।

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यजूर् के चेहरे पर मुस्कुराहट आई।सभी काली शक्तियां,जो निकल रही थीं।अब विषप्रपात में डूबने लगी।
एक आयाम द्वार खुला और महर्षि देव ने विषनगरी में कदम रखा।
एक तेज से सभी की आँखे चौंधिया गई।
यजूर् और देविका ने उन्हें झुककर प्रणाम किया।ये देख सौडांगी भी उनके आगे झुकी।
जैसे ही महर्षि की नजर विषप्रपात पर पड़ी।
महर्षि:- "ये कैसी धृष्टता की है तुमने यजूर्? विष प्रपात को मुक्त करने का विचार तुम्हे कैसे आया?"
क्रोध उनके मुख पर झलक रहा था।
यजूर् ने जल्द ही पूरी बात उन्हें बता दी।
महर्षि:- "तुम्हारी परेशानी मै समझ रहा हूं लेकिन मेरे ध्यान के भंग होते ही महारानी धरा मुक्त हो गई हैं और अवश्य ही वो पृथ्वी लोक को गई हैं।यदि महाराज आदित्य उन्हें मिल गए तो अनर्थ हो जायेगा।"
यजूर्:- "महाराज आदित्य?"
"मुझे आज्ञा दीजिये पिताश्री.."

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यजूर् और महर्षि देव वहाँ से जा चुके थे। देविका और सौडांगी अब भी वहीँ मौजूद थे।
सौडांगी:- "हमें इस विष प्रपात को रोकना होगा।"
देविका:- "असम्भव है।"
सौडांगी:- "नागराज के लिए कुछ भी असम्भव नही।"
देविका:- "पागल मत बनो।ये विष हलाहल के विष का सैकड़ो गुना खतरनाक है।नागराज ही क्या स्वयं मै इसे अपने अंदर नही समा सकती।"
सौडांगी:- "सिर्फ एक बार मेरी बात मान लीजिये।"

सौडांगी के काफी मनाने पर देविका मान गई।
देविका:- "ठीक है।तुम्हारी जिद पर मै नागराज को यहाँ ला रही हूं लेकिन एक बात याद रखो कि भगवान शिव के सिवाय इस विष को कोई धारण नही कर सकता।"

कुछ ही देर में नागराज बाहर निकल चुका था।वह फिरसे देविका से लड़ने के लिए तैयार हो गया था लेकिन सौडांगी ने देविका के बारे में जल्दी से उसे सब बताया।साथ ही नागराज को विषकुण्ड का विष धारण करने की सलाह दी।वरना स्वर्णक्षेत्र खत्म हो सकता था और उसके साथ ही ध्रुव का वो राज भी।जिसके लिए वो लोग यहाँ आये थे।

नागराज आखिर तैयार हुआ और नागशक्ति को आह्वान करते हुए उसने विषकुण्ड के विष को धारण करने की इच्छा व्यक्त की।
विषकुण्ड का विष वैसे ही रुकने वाला नही था।जैसे ही नागराज की स्वीकृति मिली वैसे ही सारे नागों और काली शक्तियों को समेटता विष नागराज के शरीर में समा गया।

सौडांगी और देविका अवाक् रह गए।
नागराज का शरीर काला पड़ता चला गया और फिर वो निढाल हो कर गिर पड़ा।

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The Poison's
सौडांगी और देविका बाहर बैठे थे।अंदर मैथिलि नागराज की जांच कर रही थी।
थोड़ी देर में दोनों को अंदर बुलाया गया।
देविका :- "कैसा है नागराज?"
मैथिलि(भड़कते हुए):- "कैसा है का क्या मतलब? तुम नही जानती क्या? "
देविका:- "मुझे पता है कि गलती हुई मुझसे पर उस समय मै खुद कुछ नही कर सकती थी।"
मैथिलि:- "तुम नागशक्ति हो कोई बच्ची नही। तुम्हे इस की बातों में नही आना चाहिए था।" (इशारा सौडांगी थी।)
सौडांगी:- "क्या मै कुछ बोलूं?"
दोनों(एक साथ):- "नही.."
सौडांगी चुप रह गई।

मैथिलि:- "अब एक ही रास्ता है इसे बचाने का।"
देविका:- "वो इसे मत बताना।"
मैथिलि चुप हो गई।
कोई कुछ न बोला।
सौडांगी:- "मुझे बताइये भी।"
देविका ने गहरी सांस ली। "ठीक है, सुनो। वो है *अमृत कलश* जो नागराज को ठीक भी कर सकता है और अमर भी।पर नागराज अपनी सर्प शक्तियां खो देगा।नही तो युगों तक सोता रहेगा।"
सौडांगी:- "ठीक है।मै जाऊंगी अमृत कलश लेने।"
मैथिलि:- "इस इमारत के बाहर नहीं रखा है वो।इस अकाशगंगा के 23 आकाशगंगा दूर। उनकी कुल संख्या 7 है।लेकिन तुम्हारे लिए एक ही काफी है।अगर किसी के हाथ में सातों कलश आ जाएं तो उसे रोकना नामुमकिन हो जायेगा।इसलिये याद रखना कि तुम्हारा पीछा कोई न करें।क्योंकि हर एक कलश दूसरे का रास्ता दिखाता है।'"
सौडांगी ने सहमति में सिर हिलाया।

देविका:- "इस मामले में हम नागशक्ति तुम्हारी मदद नही करेंगी।तुम्हे बहुत सोच कर आगे बढ़ना है कि तुम नागराज को विषहीन देख सकती हो या नही।"
सौडांगी:- "सोच चुकी मै।लेकिन रिवील का क्या हुआ? क्या वो भी नागराज के अंदर .."
देविका :- "नही,विषकुण्ड के विष का भी उसपर प्रभाव नही पड़ा।पता नहीं क्यों? लेकिन ऐसा ही हुआ। हो सकता है वो तुम्हारे पीछे आये।"
सौडांगी:- "मै ख्याल रखूंगी।"


सफर सिर्फ सौडांगी का ही नहीं, किसी और का भी शुरू हुआ था।
राजनगर

ध्रुव थका हुआ घर आया था कि कानो में एक आवाज पड़ी।
"आदित्य,मेरे प्रिय आदित्य।आपकी धरा आपका इंतजार कर रही है।आप कहाँ हैं?'
ध्रुव के दिमाग पर सम्मोहन छाने लगा।
एक झटके से उसने खुद को उस सम्मोहन से अलग किया।
"ये क्या था?"
जवाब *धरा*

सौडांगी का सफर शुरू हुआ था:- *अमृत कलश*
धरा की पुकार :- *Family feud*

1 comments :

suprrrr se v uperrrr h bro.....bs jldi se next chapter v release lr dijiye wait ho hi nhi rha

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