Wednesday, 30 November 2016

COP प्रस्तुतकरते हैं 

महर्षि देव

विषनगरी (भाग 2)

लेखक - राम चौहान 


The Poison's
मैथिलि की आँखे झटके से खुली।
"अरे ये क्या हुआ? नागराज तो विषनगरी के द्वार तक पहुंच गया।यानि अब अंदर पहुंचने में भी उसे देर नही लगेगी।शायद मैंने देविका पर भरोसा करके गलती कर दी है।"

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Verona,Italy

पुरे कमरे में धुंध छाई हुई थी।एक लड़की श्वेत वस्त्र पहने कमरे के बीचोबीच बैठी थी।सामने ही एक आदमी का शरीर निश्चेष्ट पड़ा था।
लड़की कोई और नही बल्कि रिवील थी और उसके सामने उसके पिता का शरीर था,जिसे आज उसने परावैज्ञानिक ताकतों से होश में लाने का फैसला कर लिया था।
धीरे धीरे रिवील ने आँखे खोली और अपने पिता की तरफ देखने लगी।
आखिर निश्चेष्ट पड़े शरीर में हलचल मची।उसके पिता ने आँखे खोली।
रिवील की आँखों में आंसू छलक उठे।
भरी हुई आँखों से वो बोली ;- "Tu sei OK papa (पापा, आप ठीक है?)"
उसके पिता ने जवाब नहीं दिया।आँखों से आंसू छलक आये और दोनों एक दूसरे से लिपट गए।
फिर हिम्मत करके बोले " Ti ho dato quel libro dov'è?(मैने तुम्हे जो किताब दी थी, वो कहाँ है??)"
रिवील से जवाब देते न बना।
उसके पिता के चेहरे पर बेचैनी नजर आने लगी थी। "Get per ordinare altrimenti tutto sarà devastata.( जाओ उसे ढूंढो वरना सबकुछ तबाह हो जायेगा।)"
रिवील की समझ में कुछ नहीं आया।पर उसके पिता ने ये कहा था और वही उसके लिए सबकुछ था।
वो उठ खड़ी हुई। " I comandi (जैसा आप कहें)'"
रिवील निकल चली थी स्वर्णशास्त्र के पीछे।
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नागराज आ खड़ा हुआ था विषनगरी के द्वार पर।उसके चेहरे पर दृढ़ निश्चय और एक अलग ही तेज नजर आ रहा था।जैसे वो अपनी जीत के प्रति आश्वस्त हो। द्वार 12 फुट ऊँचा और 5 फुट चौड़ा था।नागराज के हाथ द्वार पर जम गए और एक जोरदार धक्के से द्वार खुलता चला गया।
अंदर आने से पहले ही नागराज ने अंदर नजर दौड़ाई। यहाँ का दृश्य तो बिल्कुल ही अलग था।अंदर सब कुछ किसी सपनो की नगरी की तरह था। बड़े बड़े महल और शानदार मकान नजर आ रहे थे। "कहीँ ये कोई जाल तो नही।" होंठो में बुदबुदा उठा नागराज।
लेकिन आगे बढ़ना ही था उसे।
उसके बढ़ते कदम ठिठके।
वो देविका थी।

"हेलो मि. स्नेकमैन।" देविका मुस्काई।
नागराज ने गहरी सांस ली।
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(नागराज के विषनगरी का द्वार खोलना काफी मुश्किलें खड़ी करने वाला था।क्योंकि उसके अंदर प्रवेश की देर थी और कई काली शक्तियां जाग उठने वाली थी।)
ऐसा ही कुछ हुआ था।नागराज के द्वार खोलते ही जाग उठी थी विषनगरी,वही विषनगरी,जो सैकडों सालों से सोई हुई थी और जिसमे जाने को आतुर था नागराज।

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रिवील के कदम पड़ चुके थे स्वर्णक्षेत्र के दरवाजे पर।
अब तक वो दरवाजा बंद हो चूका था।
रिवील दरवाजे की तरफ देखती रही।
जैसी उसे उम्मीद थी, दरवाजे को छूते ही स्वर्णरक्षक बाहर निकल आये।
रिवील के होंठो पर मुस्कान छाई।

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"हमे अंदर जाना है देविका।रास्ता छोड़ो।" नागराज ने सौम्य तरीके से कहा।
देविका ने सोचने का अभिनय किया।फिर बोली :- "तुम्हे क्या लगता है कि मै यहाँ तुम्हारा स्वागत करने आई हूं।" आखिरी शब्द कहते हुए मुस्कुरा पड़ी वो।
नागराज के चेहरे पर अनिश्चय के भाव आए। (क्या देविका लड़ना चाहती थी) वो समझ नहीं पाया और न ही शुरुआत करना चाहता था।
"तुम लड़ना चाहती हो?" आखिर बोला नागराज।
देविका मुस्काई।बोली :- "तुम अंदर नही आ सकते मि. स्नेकमैन.."
नागराज के चेहरे पर दृढ़ निश्चय के भाव आये। "अंदर तो मै आकर रहूंगा।"
देविका मुस्काई। "कोशिश कर सकते हो।"
नागराज ने बिना सोचे तीव्र विषफुंकार का प्रहार कर दिया। (वो कोई रिस्क नही लेना चाहता था)
देविका ने जरा सा मुँह घुमाया।फिर विष फुंकार देखते ही उसने एक सांस में नागराज की विष फुंकार खींच ली।
नागराज अभी कुछ समझ भी नहीं पाया था कि देविका ने तेजी से अपनी विषफुंकार नागराज पर छोड़ दी।
फुंकार के प्रहार से नागराज कई फुट पीछे जा गिरा।
तेजी से सौडांगी उसके शरीर से निकली और एक जोरदार तंत्र प्रहार देविका पर कर दिया।देविका से तंत्र प्रहार टकरा तो गया।पर देविका पर इसका कोई असर नहीं हुआ।तंत्र उससे ऐसे टकराया जैसे कंकड़ किसी पहाड़ से टकराया हो।
"तुम्हारे बचकाने वार मुझपर असर नहीं करेंगे सौडांगी।" देविका मुस्कुराती हुई बोली।
नागराज ने पाषाण सर्प जमीन पर छोड़े जो जमीन के अंदर होते हुए देविका के नीचे एक सुरंग बनाने लगे।लेकिन देविका की नजर उन पर पड़ गई और एक झटके से उसने नागराज के सर्पों को अपने शरीर में समा लिया।
नागराज अवाक् सा देखता रह गया।
"ये तुमने कैसे किया?" उसके मुंह से निकला।
देविका अब गम्भीर नजर आई। "बचपना बन्द करो और लौट जाओ अन्यथा तुम्हारा भी यही हाल होगा।"
नागराज के जबड़े भींचे। विषफुंकार बेअसर रही।अब सिर्फ नागफनी सर्पो का भरोसा था।
(देव कालजयी के सर्पों का कोई तोड़ नही होना चाहिए इसके पास) मन ही मन नागराज ने सोचा।
तेजी से नागफनी सर्प बाहर निकले और देविका की कलाइयों में समाते चले गए।
नागराज की आँखे खुली रह गई।
(ये कैसे हो सकता है) नागराज के आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
देविका मुस्काई। "चलो ये लड़ाई खत्म करते हैं।"
नागराज को अपना शरीर खींचता महसूस हुआ और वो देविका की तरफ खींचने लगा।सौडांगी ने नागराज को अपने तंत्र जाल में फंसा लिया ताकि वो देविका की तरफ न खींचे।
लेकिन असर उल्टा ही हुआ।सौडांगी भी साथ खींचने लगी।सौडांगी ने पास ही एक पत्थर पर तंत्र की मदद से खुद को और नागराज को रोकने की कोशिश की, पर पत्थर भी साथ खींच गया।
उसकी हरकते देखकर देविका हंस पड़ी।
नागराज ने भी खुद को रोकने की कोशिश की पर वो खींचता ही गया।सौडांगी भी साथ खींची आ रही थी।नागराज ने ध्वंसक सर्प का हमला सौडांगी पर किया।
सौडांगी का ध्यान भंग हुआ और उसका तंत्र जाल टूटता चला गया।नागराज तेजी से देविका की कलाइयों में समाता गया और सौडांगी नीचे आ गिरी।

*********
सौडांगी पहले ही घायल थी।फिर भी उसने देविका से लड़ने का फैसला किया। "तुम जो भी हो,नागराज को छोड़ दो वरना..." आधे शब्द उसने धमकी के तौर पर छोड़ दिये।
देविका ने मुँह बनाया।बोली :- "दिखा दो अपना तंत्र मिस..." उसने भी जानबूझकर शब्द अधूरे छोड़ दिए।
सौडांगी ने अपनी ताकत बटोरी और तंत्र निर्माण करने लगी। देविका ने हटने का उपक्रम न किया।
देखते ही देखते सौडांगी ने तंत्र निर्माण किया और उसका वार देविका पर कर दिया।
आखिर देविका एक तंत्र जाल में फंस ही गई। सौडांगी के चेहरे पर मुस्कान आई।
"ये अनन्त तंत्र है देविका।इसका कोई तोड़ नही मेरे पास भी नहीं।जितना बाहर निकलने की कोशिश करोगी उतना ही फ़ंसोगी।" सौडांगी खुश होती बोली। "इसका तोड़ सिर्फ नागराज के पास है जो उसे पिछले साल नागयज्ञ के दौरान नागशक्तियों से मिला था।"
देविका अब भी मुस्कुरा रही थी।जैसे उसे बाहर निकलने की कोई जल्दी नहीं।
सौडांगी समझ न सकी उसकी मुस्कान का राज।फिर भी बोली :- *"अगर बाहर  निकलना चाहती हो तो नागराज को आजाद करो।वरना हमेशा के लिए अंदर ही फंसी रहो।"*
देविका ने मुस्कुराना बन्द किया।अनंत तंत्र को थामा और हाथों से चीरती चली गई। सौडांगी की आँखे फ़टी रह गई।
"क्या इसी तरह नागराज बाहर आता है।" बाहर निकलती देविका बोली।
सौडांगी को खुद की आँखों पर भरोसा नहीं हुआ। "ये कैसे किया तुमने?"
देविका मुस्काई।बोली :- "तुम्हे ये तंत्र शक्ति देने वाली नागशक्ति मै ही थी और नागराज को इसकी काट देने वाली नागशक्ति भी मै ही हूं।"
सौडांगी के मुंह से शब्द नही निकले।
देविका उसे देखकर मुस्कुराती रही।
आखिर सौडांगी झुकी। "मुझे माफ़ कर दीजिये नागशक्ति।मै आपको पहचान नहीं पाई और आपसे लड़ने की धृष्टता कर बैठी।"
देविका मुस्काई। "कोई बात नहीं सौडांगी।नागराज के प्रति तुम्हारा प्रेम मुझे पता है।"
प्रेम शब्द सुनते ही सौडांगी चौंकी। उसके मुँह से बोल न फूटे।कैसे झूठ बोलती नागशक्ति से,जो सब जानती है।
देविका आगे बोली:- "मै नागराज को अंदर जाने नही दे सकती थी, क्योंकि प्रेम की ताकत से ही यहाँ किसी को बंदी बनाकर रखा गया है और अगर वो नागमानव अंदर प्रवेश कर गया तो कई चीज़े वापस जाग उठेंगी।"

"लेकिन मै खुद भी नागराज और साथियों के बिन यहाँ से नही लौटूंगी।" सौडांगी बोली।
देविका ने सोचने का अभिनय किया।फिर बोली:- "ठीक है।मै उन्हें ढूंढने में तुम्हारी मदद करुँगी।बदले में मुझे तुम्हारी नागप्रतिज्ञा चाहिये।"
सौडांगी चुप रही।कुछ देर सोचने के बाद वो बोली:- "पर नागराज का साथ मै हर वक़्त दूंगी।"
देविका ने सहमति में सिर हिलाया।

**********

सौडांगी और देविका आगे बढ़ रही थीं।
सौडांगी आसपास देख रही थी और हर तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था।बड़े बड़े महल और शानदार मकान।सब कुछ किसी दिवास्वप्न की तरह लग रहा था।
देविका इन सबसे बेखबर आगे बढ़ रही थी जैसे उसे किसी की परवाह न हो।
आखिर सौडांगी बोली:- "नागशक्ति, यहाँ इतने बड़े महल हैं और शानदार मकान भी।उसके बावजूद यहाँ इतनी शांति क्यों है?कोई भी स्वर्णमानव नजर नहीं आ रहा।"
देविका ने चलते हुए क्षण भर के लिए सौडांगी को देखा। फिर रुकी और सौडांगी के चेहरे के आगे हथेली यूँ घुमाने लगी जैसे सौडांगी अंधी हो।
सौडांगी ने देविका का हाथ चेहरे के सामने से हटते ही एक अजीब सी धुंध को खत्म होते महसूस किया।
सामने का नजारा देखकर उसे खुदपर यकीन नहीं हुआ ।सौडांगी के सामने ही बड़े बड़े महलों की जगह खण्डहरों ने ले ली थी।शानदार मकान टूटी फूटी झोपडी में बदल चुके थे।सौडांगी आखिर देविका से पूछ बैठी। "ये क्या है नागशक्ति? अभी जो मैने देखा वो सच है या कुछ देर पहले जो मै देख रही थी वो सच था।"
देविका रुकी।उसके होंठो पर मुस्कुराहट थी। "ये सारा सम्मोहन उन शैतानी आत्माओ का था।जिन्होंने नागराज को यहाँ तक पहुंचा दिया।वरना नागराज यहाँ तक कभी नहीं आ पाता।"
"मतलब इस सम्मोहन को मै भी नहीं पकड़ सकी, न ही नागराज।" सौडांगी सोच में पड़ गई। "ऐसा कैसे हो सकता है? नागराज तो सम्मोहन सम्राट है।उस पर किसी का सम्मोहन नही चल सकता।"
देविका मुस्काई। "लगता है तुमसे बर्दाश्त नहीं हो रहा कि कोई तुमसे भी मजबूत है।"
सौडांगी चुप रही। देविका पलट कर चल पड़ी।
"सम्मोहन विद्या उतनी ही नहीं, जितनी नागराज या नागू जानता है।न ही इच्छाधारी शक्ति की कोई थाह है।लेकिन अभी तुम लोग उसे प्राप्त करने के शुरूआती चरण में हो।" देविका बोलती हुई आगे बढ़ती जा रही थी कि एकाएक तेज भूकम्प ने दोनों को रुक जाने पर मजबूर कर दिया।
सौडांगी देविका की तरफ देखती हुई बोली "क्या ये भूकम्प था?"
"नही।" देविका ने आँखे बंद करके किसी को देख लिया था।
"तो ये क्या था?" सौडांगी बोल पड़ी।
"ये रिवील है।" देविका के चेहरे पर अफ़सोस के भाव आये। "वो विषनगरी में आ चुकी है और इसका मतलब है कि शैतानी शक्तियां आजाद हो चुकी हैं।"

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सिर्फ शैतानी शक्तियां ही नहीं।पास ही मौजूद क्षितिजनगर की पुण्य आत्माएं भी जाग उठी थीं और सबसे पहले जागने वाला था क्षितिजनगर का सेनापति यजूर् ।
"आह्, ये क्या था?लगा जैसे मै युगों तक सोया रहा।" उठते ही विषनगरी घूम गई उसके दिमाग में। "हां,मुझे तो सोया ही रहना था पर किसी ने मुझे जगाया है।इसका मतलब किसी पृथ्वीवासी ने स्वर्णक्षेत्र में प्रवेश कर लिया है।"
बिना सोचे समझे यजूर् ने बाण और धनुष उठाया और दिव्य दृष्टि से देखते हुए विषनगरी के प्रवेश द्वार की तरफ चला दिया।।
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रिवील ने ही वो दरवाजा खोला था।
अभी उसने अंदर प्रवेश भी नहीं किया था कि तेजी से उड़ता हुआ एक तीर उसकी आँख में आ लगा।
लेकिन वो बिलकुल भी नहीं चीखी।बल्कि मुस्कुरा पड़ी। (ये वही तीर था जो यजूर् ने चलाया था।)
तीर को उसने आराम से बाहर निकाल कर एक तरफ फेंक दिया।अभी वो आगे बढ़ भी न सकी थी कि एक और तीर उसकी तरफ लपका,जिसे उसने हाथों से पकड़ा और तोड़ दिया।
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यजूर् के तीर का हश्र जल्द ही उसे अपनी दिव्य दृष्टि से पता चल गया।
"यह युवती।लगता है इसी के कारण मेरी निंद्रा भंग हुई है।अब इसे इसका दण्ड भुगतना होगा।"

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क्षितिजनगर में सिर्फ यजूर् की निंद्रा भंग नही हुई थी।जाग उठा था कोई और भी।
(आईने अक्सर अपनी सूरत देखने के काम आते हैं लेकिन वो एक दूसरी दुनिया की तरफ इशारा भी करते हैं।)
दूसरी दुनिया
एक दिव्य पुरुष समाधि में लीन थे।चेहरे पर गजब का तेज,उनके महापुरुष होने की ओर इशारा करता था।अचानक ही आये भूकम्प से उनका ध्यान भंग हो गया था।
"क्या विषनगरी के द्वार को किसी ने जबर्दस्ती खोल दिया है।किसने किया है ये दुस्साहस?" चेहरे पर क्रोध लिये वो समाधि से उठ गए।
लेकिन इस हड़बड़ी में उनके पास रखा पात्र गिर गया, जिसपर उन्होंने ध्यान नहीं दिया।
पात्र से एक धारा बह निकली और कुछ दूर जाकर इकट्ठी हो गई।वो पानी देखते ही देखते एक युवती का रूप धारण कर बैठा।
"मेरे प्रिय आदित्य!तुम्हारी धरा आ रही है।" होंठो पर मुस्कान थिरक उठी उसके।

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कहानी जारी है विषसम्राट में

2 comments

tumhein story likhni band kar deni chahiye

Reply

kisi tarah to revel must dai hajam hui thi ab ye nai series

bramha bhai ki takkar ki story koi nahi likh sakta

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