Saturday, 12 November 2016

COP प्रस्तुत करते हैं

महर्षि देव ( विषरक्षक : भाग 1)

लेखक : राम चौहान 


नोट - इस सीरीज को पूरी तरह समझने के लिए अवश्य पढ़ें पुर्व सीरीज रेवेल मस्ट डाई
नागराज के कानों में अब भी भेड़िये के रुदन की आवाज आ रही थी और बार बार उसका ध्यान भटक जाता था।
बाबा गोरखनाथ :- "भेड़िया की आवाज तुम्हारा ध्यान भटका रही हैं नागराज।उस पर ध्यान मत दो।वैसे भी प्रेम ऋतू आ चुकी है और भेड़िया अपनी जेन को याद कर रहा है।"
नागराज चुप रहा।फिर बोला:- "तो क्या जेन नही लौटेगी?"
बाबा गोरखनाथ:- "तुम्हारी चिंता का विषय वो नही है नागराज।फ़िलहाल तुम अपने सफर पर ध्यान केंद्रित करो।"
नागराज ने सहमति जताई।
बाबा गोरखनाथ ने हवा में एक तंत्र बनाया और नागराज को देखते हुए बोले:- "ये द्वार तुम्हे स्वर्णक्षेत्र के करीब पहुंचा देगा। स्वर्णक्षेत्र 42 राज्यो का एक देश है,जिसमे विषनगरी भी शामिल है।तुम्हे स्वर्णक्षेत्र तक पहुंचने में काफी दिक्कतें आएँगी।पर तुम्हे आगे बढ़ते रहना होगा।अगर तुमने स्वर्णक्षेत्र का द्वार खोल लिया तो विषनगरी ज्यादा दूर नही।याद रखना विषनगरी के करीब पहुंचते ही तुम्हारी विष शक्तियां चरम सीमा पर होंगी।"
नागराज ने सहमति में सिर हिलाया और द्वार में समा गया।
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अभी सफर शुरू नही हुआ था कि उसे रोकने की तैयारी शुरू हो गई थी।

New York,america
The poison's headquarters

मैथिलि अपनी दिव्य दृष्टि से नागराज के सफर को देख रही थी।उसने आँखे खोली और बाहर निकल गई।
सभी अपने काम में व्यस्त थे।मैथिलि बाहर आई और सभी खड़े हो गए।
हाथ के इशारे से उसने सभी को बैठने को कहा।
"देविका कहाँ है?" उसका स्वर गूंजा।
देविका सामने आ गई। "आईएम हियर.." मुस्काती हुई।
"मेरे केबिन में आओ।"मैथिलि वापस कैबिन में चली गई।

देविका अंदर दाखिल हुई। "क्या हुआ डिअर?"
मैथिलि उसे देखती रही।उसकी आँखे शांत थी।
"बोलो भी।" देविका पुनः बोली।
मैथिलि ने गहरी सांस ली और बोली :- "याद है उस नाग मानव के बारे में तुमने मुझसे क्या कहा था?"
"कौन सा नाग मानव?"देविका ने सोचने का अभिनय किया।
मैथिलि उसे चुपचाप देखने लगी।
देविका आगे बोली:- "अरे हां,नागराज नाम है उसका।"
मैथिलि ने बोलना शुरू किया :- "मुझे तो पहले ही शक था कि तुम्हे अपने साथ रखकर मैने सबसे बड़ी गलती की है और तुमने मुझे सही साबित किया। तुमने रेवेल से वो **स्वर्णशास्त्र** चुरा तो लिया पर उस तुच्छ नागमानव के सामने विषनगरी का राज भी खोल दिया(पढ़े "रेवेल मस्ट डाई")।अब वो नागमानव स्वर्णक्षेत्र के लिए निकल पड़ा है और अगर वो विषनगरी पहुंच गया तो तुम किस नगरी जाओगी?" आखिरी शब्द कहते हुए मैथिलि ने आसमान की तरफ इशारा किया।
देविका ऊपर देखने लगी।फिर घबराहट दिखाती बोली:- "अरे,ऐसा कुछ नही होगा।वो न तो स्वर्णक्षेत्र पहुंच पायेगा न विषनगरी।"
कहते हुए देविका बाहर निकल गई।पीछे मैथिलि मुस्कुरा पड़ी।
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नागराज और उसके दोस्त इस वक़्त एक पत्थर पर खड़े थे।आसपास कुछ भी नहीं था।पत्थर हवा में रुका हुआ था और एक भी अतिरिक्त व्यक्ति उस पर खड़ा नही हो सकता था।आसपास धुंध फैली हुई थी।न ही उन्हें ठंडक महसूस हो रही थी और न ही वो उन्हें सांस लेने में व्यवधान उत्पन्न कर रही थी।
"ये क्या है नागराज?" सौडांगी बोली।
नागराज ने सोचते हुए जवाब दिया :- 'जो भी है,अभी तो हमे नुकसान नहीं पहुंचा रहा।पर आँखे खुली रखनी होगी हमे।"
ऐसा लगता था जैसे बादलो के बीच उस पत्थर पर खड़े थे सब।
"आगे कैसे बढें?रास्ता तो नजर ही नही आ रहा।" सौडांगी आगे बढ़ी।
 नागराज ने उसका हाथ पकड़ा। "आगे रास्ता नहीं है।"
 पर हुआ कुछ और ही।जैसे ही सौडांगी आगे बढ़ी,आगे एक पत्थर हवा में प्रकट हो गया और सौडांगी उस पर आ खड़ी हुई।
 सभी की आँखे फ़टी रह गई।
 "ओह्ह" नागराज की होंठ गोल हुए।
 पीछे मुड़कर सौडांगी मुस्काई। "चलें?"
 "लेकिन कहाँ?" नागराज बोला। "रास्ता कहाँ है और स्वर्णक्षेत्र का द्वार भी?"
 नागू, जो अब तक शांत खड़ा था, नाटकीय ढंग से बोला :- "शायद मेरी मणि शक्ति द्वार ढूंढ सके।"
 सभी उसे देखने लगे। नागू ने अपनी मणि को इस्तेमाल किया।चारो तरफ एक तेज रोशनी फैल गई। सभी की आँखे बंद हो गई।
 कुछ देर बाद रौशनी खत्म हो गई। नागू ने हांफते हुए कहा :- "सफलता।"
 सभी पीछे मुड़े। सामने नजर आ रहा था *स्वर्णक्षेत्र का द्वार*
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*(स्वर्णक्षेत्र तक नागराज का पहुंच जाना एक आसान काम था, लेकिन क्या अंदर जाना भी आसान होने वाला था।)*

नागराज और उसके साथी स्वर्णक्षेत्र के दरवाजे तक आ चुके थे। उसके आसपास दूर दूर दिवार का नामोनिशान नजर नहीं आता था।
"ये कैसा जाल है?आसपास दीवारें नजर ही नहीं आ रही और तो और अगर यहाँ दीवारे नही है तो दरवाजे के पीछे भी कुछ नहीं है?" शीतनाग एक ही सांस में बोल गया।
नागराज ने दरवाजे को गौर से देखा। वो कोई 12 फुट लम्बा और 5 फुट चौड़ा सोने का दरवाजा था,जिसपर 42 खण्ड बने थे।सभी खण्डों में स्वर्ण अक्षरों से कुछ लिखा था।
"नॉक करें?" शीतनाग ने पूछा।
नागू फ़िल्मी स्टाइल में बोला :- "नही,स्मैश करते हैं।"
नागराज ने हाथ के इशारे से सबको रोका। अपनी बेल्ट से उसने स्वर्णशास्त्र का वो टुकड़ा निकाला,जो रेवेल से लड़ते हुए उसने पाया था।
उस टुकड़े को देखते हुए नागराज सबको सम्बोधित करने लगा :- "बाबा गोरखनाथ ने बताया था कि स्वर्णक्षेत्र 42 राज्यो का एक देश है।इस दरवाजे पर भी 42 खण्ड बने हैं जो शायद उन 42 राज्यो के नाम हो सकते हैं।"
सौडांगी सहित सभी उसके पास आये और उसके हाथ में थमे कागज के अक्षरों को खण्डों में लिखे अक्षरों से मिलाने में लग गए।
सौडांगी ने एकाएक कहा:- "ये रही विषनगरी नागराज।"
सभी उसकी तरफ बढ़े।
अचानक अदृश्य दीवारों में हलचल मची।
नागराज सहित सभी ने उसे देखा।
वो दीवारों से निकले स्वर्ण रक्षक थे।सभी तैयार थे।उनके हाथों में स्वर्णबाण नजर आ रहे थे।
नागराज और उसके साथी लड़ने के लिए तैयार हो गए।
नागराज :- "हो सकता है कि ये लोग अमर हो, क्योंकि ये जगह स्वर्ग और धरती के बीच स्थित है।पर हम लोग अमर नही है इसलिये कोई रहम मत दिखाना।"
नागराज की कलाइयों से सर्प निकलकर तेजी से स्वर्ण रक्षको से जा टकराये।
"तुम लोग दरवाजा खोलो।" नागराज ने कहा।

सभी दरवाजे को खोलने में लग गए।
सौडांगी ने कागज खोला और उसपर लिखे अक्षरों को दरवाजे में विषनगरी के खण्ड में ढूढने लगी।
सोने से लिखे वो अक्षर दरवाजे पर उभरे हुए थे।
सौडांगी ध्यान से एक एक शब्द को दबाने लगी।

दूसरी तरफ नागराज स्वर्ण रक्षको से भीड़ रहा था।नागराज ने कलाइयों से सर्प निकाल कर स्वर्ण रक्षको पर छोड़े।जिसे उन्होंने रास्ते में ही काट दिया।पर वो ध्वंसक सर्प थे जो कटते ही फट गए और रक्षको का ध्यान भटक गया।नागू ने तुरंत ही मणी के अंदर उन्हें कैद कर लिया।
"अब ये मणि का केंद्र ढूंढते रह जायेंगे।" नागू मुस्कुराया।
लेकिन यहाँ हुआ उल्टा ही।सिर्फ हाथो से ही उन्होंने मणि के जाल को फाड़ दिया और बाहर निकल आये।
नागू चकित रह गया। "ऐसा तो पहले कभी इतनी आसानी से नही हुआ था।"
नागराज ने जगमग सर्प छोड़े और कुछ पलों के लिए तेज रोशनी हो गई।
ये पल खतरनाक हो सकता है ये बात नागराज ने नही सोची थी।सौडांगी,जो इस दौरान स्वर्णक्षेत्र का दरवाजा खोलने में लगी थी, उसकी आँखे भी चौंधिया गई और उसका हाथ गलत बटन पर दब गया।
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स्वर्णक्षेत्र के बाहर ही नहीं, बल्कि अंदर भी रक्षक मौजूद थे।
सौडांगी के हाथ से जैसे ही गलत बटन दबा।मुख्य द्वार पर मौजूद रक्षक हरकत में आ गए।
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वो पल खत्म हुआ जब रौशनी छंट गई।
सौडांगी को समझ में आ गया कि उससे गलती हो गई है।शायद उसने गलत बटन दबा दिया है।इससे पहले कि वो गलती सुधार पाती, अंदर मौजूद स्वर्ण रक्षक बाहर निकल आये।
सौडांगी ने तेजी से तंत्र का इस्तेमाल करके ढाल बनाई पर स्वर्ण रक्षक ज्यादा तेज थे।तलवार तंत्र को तोड़ती हुई सौडांगी के कंधे पर जा लगी।
"आह्ह" सौडांगी दूर जा गिरी।
शीतनाग ने तेजी से उन्हें बर्फ में जमा दिया।पर उनकी ताकत कही ज्यादा थी।सिर्फ दो सेकण्ड्स में ही वो बर्फ तोड़कर बाहर आ गए।
नागराज बाहुबल में उनसे कम नहीं था।पर सिर्फ बाहुबल काम नहीं आने वाला था।कुल्हाड़ी जैसे हथियार का वार नागराज के कंधे में जा घुसा।
"उफ्फ्फ" नागराज ने अपनी चीख अंदर ही दबा ली।वो नही क्षचाहता था कि उसके साथी उसे लेकर चिंतित हो जाएं।
तेजी से उसने खुद को इच्छाधारी कणों में बदला और उनके पीछे आ खड़ा हुआ।
तेजी से उसने स्वर्ण रक्षक के दिमाग में एक सर्प घुसा दिया।

स्वर्ण रक्षक कुछ देर शांत रहा फिर अचानक ही अपने साथियों से भिड़ गया।
"अरे,ये कैसे हुआ?" शीतनाग बोला।
नागराज ने अपनी कलाई से छोटा सा सर्प निकाला।
सभी मुस्काये।
सौडांगी घायल होने के बावजूद उठकर दरवाजे को दोबारा खोलने लगी।
आखिर दरवाजा खुला और सभी अंदर दाखिल होते चले गए।
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अंदर जाते ही सबकी नजरें आसपास घूमने लगी।
चारो तरफ घुप्प अँधेरा था।जगह जगह अजीब सी आवाजे गूंज रही थी।
"कुछ समझ नहीं आ रहा कि हम हैं कहाँ?' शीतनाग का स्वर गूंजा।
सभी उस गूंज को सुनने लगे। नागराज बोला:- "लगता है जैसे हम सभी किसी खाली कमरे में बंद हैं।"
नागू कुछ सोचते हुए बोला :- "हो सकता है यहाँ रात हो!"
सभी ने उसे ऐसे देखा जैसे उसने कोई बेवकूफी भरी बात कर दी हो।
नागराज बोला:- "लेकिन उस दौरान हमारी आवाज इस तरह नही गूंजती नागू।"
शीतनाग बोला:- "जेम्स बॉन्ड की मूवी भी देख लिया करो।"
सब मुस्काये।
अचानक ही कई मशाले जल उठी।सबकी निगाहें उस तरफ उठ गईं।वो एक झोपड़ी और एक पक्के मकान में जल रही थी।
सब उस तरफ बढ़े।
नागू रास्ते में बोला:- "मैंने पहले ही कहा था कि रात है यहाँ.."
बोलते हुए नागू को रुकना पड़ गया।एक साथ कई जगह मशाले जल उठी।
सबकी नजरें उस तरफ उठी।
ये रौशनी घरो से नही,बल्कि कुछ कंकाल थे,जो मशाले लेकर उनकी तरफ भागे आ रहे थे।
शीतनाग बोला :- "हम स्वर्णक्षेत्र आये हैं या नर्कक्षेत्र?"
नागराज चुप रहा।फिर बोला:-"मुझे ये शैतान नही लगते।"
"कमाल है!" नागू आगे बढ़ता बोला।
नागराज ने उसे रोका। "आगे मत बढो।"
लेकिन नागू बढ़ चुका था।
एक मशाल नागू से टकराई और नागू गायब होने लगा।
"ना..नागराज...ब...बचाओ.." आधे शब्द उसके अंदर ही रह गए।नागू गायब हो चूका था।

नागराज और उसके साथी कंकालों से लड़ने के लिए तैयार हो चुके थे।लेकिन जहाँ नागू गायब हुआ था।वही तक आकर सब गायब होने लगे।
"ओह्ह नही।" नागराज के मुंह से निकला।
सभी थके हुए से बैठने लगे।
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सौडांगी घायल थी और इस वक़्त लड़ने में सक्षम नहीं दिख रही थी।नागराज उसके साथ रिस्क लेने का इरादा नहीं रखता था।शीतनाग और नागराज सौडांगी को सामने नजर आती झोपडी में उठा लाये।
दोनों आमने सामने बैठे।सौडांगी का सिर नागराज की जांघों पर था।
शीतनाग बोला:- "मुझे सौडांगी की बड़ी चिंता हो रही है नागराज।"
"मुझे भी।" नागराज धीरे से बोला।
"इसे यही कही छिपाना होगा ।" शीतनाग ने तर्क दिया। "अन्यथा हमारे लिए लड़ना मुश्किल हो जायेगा।"
नागराज ने सहमति में सिर हिलाया।

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स्वर्णक्षेत्र में रुककर शायद नागराज बडी गलती करने जा रहा था।
जिस गुफा में वो छिपे हुए थे अचानक ही सारे पत्थर एक साथ जुड़ने लगे और देखते ही देखते उसने एक दानव का रूप धारण कर लिया।
उसमे से आती विष गन्ध को नागराज ने आसानी से महसूस किया।इस गन्ध को उसने पहले भी महसूस किया था।

शीतनाग ने आव देखा न ताव और सीधा टूट पड़ा दानव पर।
पर उसका एक हाथ पड़ते ही वो कई फुट दूर जा गिरा।
नागराज :- "शीतनाग! सौडांगी को लेकर निकलो।मै इसे सम्भालता हूं।"
दोनों ने अपनी जगह बदली और इस बार दानव के सामने था *नागराज*
नागराज ने जगमग सर्प छोड़े और कुछ समय के लिए एक नया सूर्य निकल आया वहाँ। नागराज:- "जल्दी निकलो शीतनाग..."
शीतनाग,जिसने इस दौरान अपनी आँखे बंद कर ली थी, उस उजाले में देख सकता था।
शीतनाग सौडांगी को लेकर बाहर निकला और नागराज ने घातक वार किया।उसके एक मुक्के में ही पाषाण दानव चूर चूर हो गया।
पर जल्द ही वो जुड़ने लगा।
पाषाण दानव दोबारा जुड़कर नागराज की तरफ बढ़ा ही था कि अचानक टूट कर गिर गया।वो फिर जुड़ने लगा और दोबारा टूट गया।
नागराज ने ठंडी सांस ली और बाहर निकल आया।

शीतनाग सौडांगी के साथ मौजूद था।
नागराज को बाहर आता देख वो बोला:- "इतनी जल्दी तुमने उसे कैसे हरा दिया?"
नागराज:- "वो पाषाण दानव था।मतलब साफ था कि वो पत्थर से वापस जुड़ जाता।वो टूटता भी तो जमीन का ही हिस्सा बनता और दोबारा जुड़ जाता। और तुम तो जानते ही हो कि मेरे पास भी पाषाण सर्प हैं जिन्हें मैने उसके पहले टुकड़े करते ही उसके साथ मिला दिया।वो उसे वापस जुड़ने ही नही देंगे।"
शीतनाग उसके दिमाग का लोहा मान गया।

दोनों सामने की तरफ देखने लगे।उनके चेहरे पर सूर्य की रौशनी पड़ने लगी।
दोनों सूर्य की तरफ देखकर मुस्कुरा पड़े।अचानक ही सूर्य के सामने काली परछाई छाने लगी।
दोनों की नजरें आपस में मिली।
वो परछाई सामने से आते विषपक्षियों की थी।सैकड़ो की संख्या में।हर एक 20 फुट लम्बा।
नागराज ने सौडांगी को संभाला।शीतनाग ने करीब आ चुके पक्षियों पर शीत वार किए पर उन्होंने कुछ भी महसूस नही किया और देखते ही देखते शीतनाग उनके पंजो में फंसा हुआ था और सभी पक्षी उसे लेकर हवा में उड़ गए।
नागराज ने सौडांगी को नीचे रखा और एक जासूस सर्प पक्षी के पैर में चिपका दिया।

नागराज ने सौडांगी को अपने शरीर में समा लिया और पक्षियों के पीछे आ खड़ा हुआ *विषनगरी* में।


कहानी जारी है विषनगरी में

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