Saturday, 5 November 2016



यात्रा वृतान्त

इलाहबाद से मुम्बई वाया महानगरी एक्सप्रेस


ये बात सन् 2011 की है। हम लोग इलाहाबाद में रहते थे और मेरी दीदी की शादी मुम्बई में हुई थी। पहली बार दीदी को ससुराल से मायके लाने की जिम्मेदारी मुझे ही दी गयी। मेरा ग्रेजुएशन पूरा हो चुका था और मैं "तैयारी" कर रहा था, अगर आप इलाहाबाद या आस पास के जिले के हैं तो इस शब्द का अर्थ बहुत अच्छे से जानते होंगे अगर नहीं तो जान लें की तैयारी शब्द का बृहद अर्थ किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी होता है, क्लर्क से लेकर IAS तक के लिये आप इस शब्द का प्रयोग कर सकते हैं।

पहली बार मुम्बई अकेले जाने की कल्पना से ही मन रोमांचित हो उठा। आपको अपने बारे में बता दूँ की मैं बहुत ही अडवेंचरस आदमी हूँ, मुझे यात्राओं का बहुत शौक है और मैं छुट्टियों में अपने कमरे को बंद करके अक्सर प्रेमचंद, शरतचंद, सिडनी शेल्डन या नागराज और सुपरमैन के साथ यात्राओ पे निकल जाता हूँ।

बहुत बहाने बनाने के बाद भी मुझे ही जिम्मेदारी दी गयी, मैंने साफ़ साफ़ बोल दिया था की एक एयरबैग के अतरिक्त मैं कोई और सामान ले के नहीं जाऊंगा। मेरी इस धमकी का असर हुआ और जाते वक्त मेरे पास केवल 4 बोरियाँ, 2 बैग और एक 20 किलो की स्टील की टंकी ही थी। उस पर से तुर्रा ये कि थर्ड AC का टिकट था। जिन भी भद्र जनों को AC में यात्रा करने का सौभाग्य मिला होगा उन्हें ये पता होगा कि ज्यादा सामान वाले यात्री को कम सामान वाले यात्री उसी दृष्टि से देखते हैं जिस दृष्टि से कार में बैठे लोग सिग्नल पे अपने आगे खड़े मोटर साइकिल वाले को देखते हैं। ऊपर से रही सही कसर मुझे छोड़ने
आने वाले दोस्तों ने पूरी कर दी, एक आदमी को 6 लोग छोड़ने आये थे। ट्रेन में सामान देखते ही एक अधेड़ उम्र के यात्री ने अपने साथ वाले यात्री से कहा " एक तो जब से ये स्लीपर क्लास वाले AC में चलने लगे तब से ac का क्लास ही खत्म हो गया है"। बात मुझे और मेरे सामान और दोस्तों को ही लक्ष्य करके बोली गयी थी इसलिए जवाब भी मेरे एक दोस्त के मुँह से निकला " अबे पंडित, कल कउन ट्रेनवा रही जेहमा लौंडे घुस के सवारी को पीटे रहेन?"
बोगी में सबको जवाब मिल गया था क्योंकि उसके बाद कोई कुछ नहीं बोला। किसी तरह सामान एडजस्ट कर के मैं अपनी सीट पे बैठ गया।
ट्रेन चलने के 20 मिनट के अंदर ही सबलोगों में बात चीत शुरू होगयी। लेकिन वो अधेड़ अंकल मुझपे खुन्नस खा के बैठे थे, जैसे ही TTE आया वो चिल्ला के बोले " ये बताइये, आप लोग का कोई नियम है की नहीं, ये लड़का इतना सामान ले के AC में घुस गया है, अकेले इसका ही सामान दिख रहा है चारों तरफ, आखिर ये सामान लगेज में भी ले जा सकता था।"

TTE ने मुझसे मेरा टिकट माँगा और चेक करने के बाद बोला, अरे भाई इतना सामान अलाउड नहीं है , आपको सामान का टिकट लेना पड़ेगा।
मैंने उसे समझाने की कोशिश की लेकिन वो सुनने को तैयार नहीं था, उसका मेन ऑब्जेक्शन उस छोटी सी दोपहिया साइकिल पे था जो मैं अपनी दीदी की नन्द के लड़के के लिए ले जा रहा था।

देखिये भैया" TTE बोला, अगर ये तीन पहिया साइकिल होती तो आप इसे ले जा सकते थे, लेकिन दो पहिया पे आपको लगेज टिकट ले लेना था।

वो अंकल इसे अपनी जीत समझ के खुश हो रहे थे,तभी बगल वाली सीट से एक 20 -21 साल के एक लड़के ने वो साइकिल उठाई और उसके 2 नट खोल के उसे बीच में से फोल्ड कर दिया। साइकिल अब आराम से एक बैग में आ जाती। TTE ने उसकी तरफ देखा और मुस्कुरा के आगे बढ़ गया। मैंने उसे धन्यवाद कहा तो उसने बोला मेरे पापा की साइकिल की दुकान है कटरा में। मैं देखते ही समझ गया था की फोल्डिंग साइकिल है।
अंकल का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था, मैंने उन्हें देखा और जोर से ठहाका लगा के हंस पड़ा।वो रास्ते भर मुझे देख के भुनभुनाते रहे और मुझे उनका चेहरा देख के हंसी आती रही।
 अब भी मुम्बई जाता हूँ तो माँ बहुत सारी गठरियां बना देती है दीदी के लिए। अब मुझे ज्यादा सामान होने पे गुस्सा नहीं आता।
लेकिन अब भी जब कभी महानगरी एक्सप्रेस में AC में बैठता हूँ तो उस घटना को याद करके एक मुस्कराहट आ ही जाती है।

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