Sunday, 18 September 2016

【℃OP 】 प्रस्तुत करते हैं

नागराज, सुपर कमांडो ध्रुव, परमाणु, कोबी, शक्ति और नागू का एक सनसनीखेज विशेषांक

   ■*षड्यंत्र भाग-4*■

कथा एवं संपादन - *अंकित निगम*
कैलीग्राफी - *गूगल हिंदी फ़ॉन्ट्स*
चित्रांकन एवं रंगसज्जा - *जो करेगा उस पर ईश्वर की असीम अनुकम्पा होगी* 😜

नोट-: ( ) के अंदर लिखी गयी बात मन में कही जा रही है

पूर्वसार- भाग 1, भाग 2 और भाग 3 में पढ़ें 😉
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

*स्थान - रायसीना हिल्स, नई दिल्ली*

रोज़ाना की तरह ही आज भी सैंकडों पर्यटक, भारत के लोकतांत्रिक गौरव के प्रतीक, संसद भवन एवं राष्ट्रपति भवन को देखने के लिए उपस्थित थे, कोई इनके साथ फोटो खिंचाने में व्यस्त था तो कोई केवल यहाँ होने के एहसास से ही रोमांचित था..... अचानक हवा में एक द्वार उत्पन्न हुआ और पर्यटकों के साथ साथ सुरक्षा कर्मियों के भी कौतुहल का केंद्र बन गया।

(भीड़ में से आवाज़)
"ये क्या है?"
"पता नहीं..."

"गार्ड्स, Be Alert and take your positions, कुछ भी असामान्य लगे तो गोलियां चला देना"
सुरक्षा प्रमुख ने अपने गार्ड्स को निर्देश दिए

कुछ क्षण पश्चात् उस द्वार से किरणों का एक जाल बाहर निकलकर पूरे क्षेत्र में फैलने लगा और फिर कोई भी कुछ भी करने की स्थिति में नहीं रहा... ऐसा लगा मानो सभी संवेदना शून्य हो गए हों।
◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆

भारती न्यूज़ नेटवर्क पर आज के समाचार

¶¶¶¶ नई दिल्ली समेत दुनिया के लगभग सभी देशों की राजधानियों के आकाश में एक रहस्यमय द्वार देखा गया है जिससे एक किरण जाल निकलकर पूरे शहर में फ़ैल गया और उसके बाद वहाँ उपस्थित सभी लोग जड़ हो गए हैं, ये पूरा कवरेज ड्रोन्स के द्वारा किया जा रहा है क्योंकि किरणों से ढके क्षेत्र में जाने वाला हर शख़्स अजीबोगरीब तरीके से संवेदना शून्य हो जा रहा है, सभी नागरिकों को सूचित किया जाता है की इन स्थानों पर न जाएं....¶¶¶¶
◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆

*स्थान - स्वर्णनगरी*

"महारानी जी... आपके आदेशानुसार सभी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को नियंत्रक के अधीन किया जा चुका है अब सभी केवल आपके आदेश की प्रतीक्षा कर रहे हैं।"

"हम्म... चलो ।"

मिसकिलर और धनंजय एक विशेष कक्ष में दाखिल हो गए।
कक्ष में चारों ओर कई यंत्र लगे हुए थे, इनमे से एक यंत्र के सामने आकर धनंजय ने कहा
"ये सम्प्रेषण यंत्र है... और इसका संपर्क विभिन्न सैटेलाइटों से है... आप यहाँ पर जो भी सन्देश देंगी वो आपकी द्विविमिय (two dimensional) आकृति के माध्यम से सभी राष्ट्राध्यक्षों तक पहुँच जाएगा।"

सम्प्रेषण यंत्र चालू हुआ और सभी देशों की राजधानियों के आकाश में मिसकिलर का चेहरा उभर आया, साथ ही एक आवाज़ गूंजी
"" तुम सब अभी और इसी वक़्त से मेरे गुलाम हो और मैं तुम्हारी महारानी, तुम्हारी सेनाएं, प्रबंधन एवं कोष सभी पर मेरा अधिकार है और मेरे आदेश के बिना इनमें से किसी का भी प्रयोग नहीं किया जाएगा। ""

स्वर्णनगरी के कक्ष में कई छोटे छोटे ब्लॉक्स में हर देश की पिक्चर दिखाई पड़ रही थी, उसमें से आवाज़ आई
"जी महारानी जी... हम सभी आपके गुलाम हैं"

"हमारा उद्देश्य सफलता के बहुत करीब है.... अगर कोई रुकावट बची है तो वो बस.... नागराज है"
◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆

*नागदीप दक्षिणी तट में*

"महारानी नगीना की अधीनता स्वीकार कर लो नागराज, और समस्त नागों को मुक्त कर दो... यही तुम्हारे लिए हितकर रहेगा"

"होश में आइये महात्मन्... नगीना ने आपको छल से नियंत्रण में किया हुआ है"

नागराज की बात का जवाब कालदूत ने अपनी मस्तक किरण के वार से दिया... वार शक्तिशाली था... पर नागराज खड़ा रहा

(इस वक़्त इसके शरीर का घनत्व अत्यधिक है क्योंकि नागदीप के सभी नाग इसके शरीर में हैं... इसे रोकना दुष्कर होगा)

"आप पर हाथ उठाने के लिए क्षमा चाहता हूँ महात्मन् किन्तु अभी ये आवश्यक है"

नागराज ने कालदूत को पूँछ से उठाकर धरा पर पटक दिया... वार अप्रत्याशित था ... कालदूत कराह उठे....

*इसी समय नागमहल के द्वार के समीप*

"सौडांगी दीदी ... इसी स्थान पर इन किरणों का घनत्व केंद्रित होता लग रहा है... हो ना हो यहीं पर इस सारे झमेले का केंद्र है"

"मुझे भी ऐसा ही लग रहा है नागू क्योंकि अब मुझे अपने दिमाग को बचाने के लिए अधिक तंत्र शक्ति का उपयोग करना पड़ रहा है... अगर ऐसा ही रहा तो मैं तुम्हारी कोई सहायता कर पाने के बजाए खुद को ही संभालती रह जाऊंगी।"

"अरे दीदी why fear when Nagu is here"
"तुम हो तभी तो डर है..."
दोनों मुस्कुरा दिये

*नागमहल के अंदर गुप्त कक्ष में बाहर की स्थिति पर नज़र रखी जा रही थी*

"कोबी... जाओ और इन दोनों को महल में आने से रोको और परमाणु तुम जा कर कालदूत की सहायता करो ..."
नगीना के आदेश पर कोबी और परमाणु वहाँ से चले गए और फिर द्वार पर...

"मेरे रहते तुम दोनों आगे नहीं जा सकते"
कोबी ने चेतावनी दी

"ओ तेरी... मैं डर गया ... पर अगर तुम रहो ही ना .... तो जा सकते हैं ना"
"मर गए कोबी को मारने वाले"

कोबी ने उछलकर नागू को एक लात जड़ दी पर नागू संभल कर फुर्ती से कोबी के पीछे गया और उसे कमर से पकड़ कर उठाया फिर अपने शरीर को पीछे की तरफ गिरा कर उसे भी नीचे गिरा दिया ....  जैसे ही कोबी खड़ा हुआ नागू ने उसका दायाँ हाथ पकड़ कर उसे अपनी ओर खिंचा और अपने कंधे से टक्कर दी...कोबी के सँभलने से पहले ही उसे ज़मीन पर गिराया फिर उसके पेट पर सर रख कर गुलाटी मारी और घुटनों पर बैठ कर खड़ा हो कर आगे बढ़ गया

सौडांगी ने हैरानी से पहले कोबी और फिर नागू को देखा
"ये नागू का दांव था दीदी, ये पहलवान अब नहीं उठेगा"

बेचारा नागू अभी ठीक से खुश भी नहीं हो पाया था कि एक स्वर गूंजा "हे भेड़िया देवता... मदद"
और क्रोधित कोबी ने नागू को अंधाधुंध मारना शुरू कर दिया... नागू किसी तरह से खुद को बचाते हुए चीखा ...

"ब् ... ब्... बचाओ दीदी ... ये सांड तो बिना लाल कपडे के ही पागल हो गया"
"अभी तो बड़े दांव दिखा रहा था... अब क्या हुआ... सांप को सांप सूँघ गया क्या !!"

सौडांगी ने कोबी को अपनी कंटीली कुंडली में फंसा लिया और उसकी गदा हाथ से गिर गयी...

" बस बहुत हुआ... नागू तुम अंदर जाओ मैं इसे रोकती हूँ"

*दूसरी तरफ नागराज कालदूत को रोकने के उपाय कर रहा था।*

"महात्मा कालदूत को हराने के लिए मुझे अपनी पूरी शक्ति लगानी होगी"
(मैं सभी नागों को आदेश देता हूँ की वो मुझे अपनी इच्छाधारी शक्ति प्रदान करें)

सम्मोहन के अधीन सभी नागों ने ऐसा ही किया और फिर नागराज ने तीन फन वाले एक विशाल सर्प का रूप धारण किया जो शायद दुनिया के सबसे लंबे सर्प से भी कई गुना बड़ा था... फिर उसने कालदूत को अपनी कुंडली में लपेटा और उनके तीनों मुखों पर अपनी तीव्रतम विष फुंकार का प्रयोग किया... कालदूत विष के प्रभाव से हल्का विचलित हो गए

"आह्ह... समय के साथ तूने अपने विष की तीक्ष्णता का अधिकतम उपयोग सीख लिया है, किन्तु हम कालदूत हैं और हमें सामान्य होने में कुछ ही पल लगेंगे"

"मैं जानता हूँ महात्मन्... किन्तु वो कुछ पल आपको नही मिलेंगे"

नागराज ने पुनः इच्छाधारी शक्ति का प्रयोग किया और इस बार वो चार भुजाओं वाले भीमकाय नागराज के रूप में परिवर्तित हुआ... बीच वाले दो हाथों से उसने परमविष्या को पकड़ा और दायें और बायें वाली लंबी भुजाओं से विष्या और महाविष्या को ....और फिर...
"हर.... हर.... महादेएएएएएव"

इस जयघोष के साथ अपनी सम्पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक इच्छाशक्ति का प्रयोग करके नागराज ने कालदूत की सन्धि को खंडित कर दिया ।

अब कालदूत तीन अलग अलग योद्धा में बंट गए थे जिन्हें नागराज ने सरलता से मूर्छित कर दिया।

नागराज अभी ठीक से साँस भी नहीं ले पाया था कि वहाँ परमाणु आ गया,

अब फिर एक लड़ाई की शुरुआत होने वाली थी पर नागमहल में लड़ाई का अंत निकट आ गया था

"माना कि तूने मेरे दोनों हाथ बांध दिए हैं पर तू भूल गयी कि मेरे पास एक पूँछ भी है"

कोबी ने पूँछ से गदा उठाई और सौडांगी पर जड़ दी ...... अपने तंत्र का अधिकांश भाग नियंत्रक किरण से बचने में इस्तेमाल करने के कारण सौडांगी अपना बचाव नहीं कर सकी और मूर्छित हो गयी..... और कोबी ने महल के द्वार के एकदम सामने पहुँच चुके नागू पर पीछे से गदा का वार करके उसे ज़मीन पर गिरा दिया...

" THE RETURN OF SAND(सांड).... (नागू ने धीरे धीरे उठते हुए कहा)... अबे इतनी वापसी तो साउथ की फ़िल्में भी नहीं मारती जितनी तू मार चुका हैं"

"तू क्या बडबड़ा रहा है ये तो पता नहीं पर अब अगर तुझे मार ना डाला तो मेरा भी नाम कोबी नहीं"

"कोबी नहीं तो धोबी रख लेना यार.."

 नागू ने मणि शक्ति से किरण वार किये पर वो कोबी की गदा ने रोक लिये

"अपनी मणि के दम पर ही उछल रहा है न तू इसे नोंचकर जेन को दूंगा मैं... इसे पाकर वो बहुत खुश होगी"

कोबी ने पूरी ताकत से गदा का वार किया और नागू दूर जा गिरा

"अबे भाभी को तोहफा देने के लिए बच्चे की जान लेगा तू... चल साथ बैठ कर ऑनलाइन सर्च करते हैं, ज्यादा मस्त माल मिल जाएगा"

"बहुत बकवास कर ली बेटा अब और नहीं"

(इससे लड़ने से बेहतर है की मैं पकड़ा जाऊँ तब शायद ये मुझे नगीना के पास ले जाएगा)
इस बार कोबी ने नागू को अपनी पूँछ में बांध लिया और नागू ने खुद को बचाने का कोई खास प्रयास भी नहीं किया
◆●◆●◆●◆●◆

"महात्मा कालदूत को हराकर खुद को जीता हुआ न समझो नागराज"

"परमाणु... तुम भी यहाँ नागदीप में हो..."
(नगीना अवश्य ही कोई बड़ी आफत लाने की तैयारी में है तभी यहाँ की सुरक्षा का इतना कड़ा इंतज़ाम कर रखा है, ताकि मैं उस तक ना पहुँच पाऊँ )

परमाणु नागराज से भिड़ तो गया पर इस समय नागराज की शक्ति असीमित हो रखी थी और उसके वार बेदम होते जा रहे थे
(मैं परमाणु पर घातक वार नहीं कर सकता ... पर सम्मोहन का प्रयोग कर सकता हूँ जैसा मैंने सभी नागों पर किया था)

किन्तु नागराज के आश्चर्य की सीमा न रही जब परमाणु उसके सम्मोहन जाल में नहीं फ़ंसा।

"ये असंभव है... परमाणु मेरे सम्मोहन से कैसे बच गया"

"क्योंकि मेरी आँखों पर सम्राज्ञी ने अदृश्य तंत्र कवच चढ़ा रखा है नागराज... उन्हें पता था कि तुम मुझ पर भी सम्मोहन का प्रयोग करोगे"

नागदीप पर कहीं और से भी नज़र रखी जा रही थी

"नागराज की बढ़ी हुई शक्तियों के सामने परमाणु ज्यादा देर तक टिक नहीं पाएगा ... नागराज को रोकने के लिए कोई शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी चाहिये ...(कुछ देर सोंचकर) विशेष कारागार के कैदियों की सूची लाओ धनंजय"
"जो आज्ञा महारानी जी"

कुछ ही देर में मिसकिलर ने एक कातिल मुस्कान के साथ धनंजय को बता रही थी
"ये है हमारे काम का आदमी... इसे कारागार से निकालो और नागदीप भेजो"
◆●◆●◆●◆●◆●◆

नागराज के लिए एक नई मुसीबत तैयार की जा चुकी थी और ध्रुव-शक्ति की मुसीबतों का अभी तक कोई अंत ही नहीं था।
चक्रवात ने ध्रुव और शक्ति को एक बंद गुफा में ला पटका था ..... पथरीली ज़मीन और दीवारें.... दीवारों से किसी प्रकार का द्रव रिस रहा था और जमीन में कहीं से भी फौवारे फट पड़ रहे थे।

"ये तीक्ष्ण गंध बता रही है की ये अम्ल है... मतलब इन्हें छूना खतरनाक है"
ध्रुव ने जैसे ही अपनी बात ख़त्म की उसपर पीछे से एक वार हुआ .... अम्ल की ओर बढ़ते अपने शरीर को ध्रुव ने एक कुशल नट की तरह मोड़कर खाली जमीन पर गिरा लिया और गलने से बच गया

"बहुत खूब... कुशल कलाबाज है तू लड़के... पर ये अम्ल क्षेत्र है और यहाँ हर जगह अम्ल ही अम्ल है कब तक बचेगा अम्लिका से"
उस हमलावर ने, जो खुद को अम्लिका कह रही थी, शक्ति पर भी वार करना चाहा पर ध्रुव पर हुए हमले के बाद शक्ति सावधान थी और वह बच गई

"खड़ग तो वापस मिला नहीं★... पता नहीं यहाँ पर मेरी अन्य शक्तियां काम करेंगी या नहीं.... उपयोग करके देखती हूँ"

शक्ति ने अम्लिका पर ऊष्मा वार किया पर वो स्वयं अम्ल में परिवर्तित होकर बच गयी और दूसरे स्थान पर पहुंचकर पुनः स्त्री रूप में आ गई।

【★शक्ति अपना खड़ग प्रश्न क्षेत्र में गँवा चुकी है, जानने के लिए पढ़ें- षड्यंत्र-3】

" यहाँ वैसे ही जगह की कमी है और उसपर ये अम्ल के फौहारे स्थिति को और भी गंभीर बना रहे हैं .... साथ में इस अम्लिका के अम्लीय वार... जल्दी ही निकलने का रास्ता तलाशना होगा"

अम्लिका के वारों और अम्लीय फौहरो से बचते हुए ध्रुव ने शक्ति से कहा

"धीरे धीरे सतह पर भी अम्ल फैलता जा रहा है... कुछ समय बाद खड़े रहने का भी स्थान नहीं बचेगा ध्रुव... और यहाँ दीवारों में कोई धातु भी नही है जिससे मैं इस अम्लिका पर वार कर सकूँ"
गुफा की दीवारों पर हाथ रखते हुए शक्ति ने कहा

(यहाँ से बाहर निकलने का कोई न कोई संकेत जरूर होगा यहाँ... बस उसे ढूँढना होगा... और वो भी शक्ति के हारने से पहले)

शक्ति ने अम्लिका पर ऊष्मा वार जारी रखे थे और ध्रुव का दिमाग बचाव का मार्ग खोजने में लगा था.... तभी अम्लिका ने ध्रुव पर भी वार कर दिया ... ध्रुव ने बचने का प्रयास तो किया पर उसके दायें हाथ पर बंधा ब्रेसलेट अम्ल के संपर्क में आ गया और गलकर जमीन पे गिर गया... ध्रुव ने अगले वार से बचने के लिए स्टार रोप का प्रयोग किया और उसे छत पर अटकाने के लिए फेंका लेकिन रोप का नुकीला सिरा छत में धंस गया

"मुझे नहीं पता था ये चट्टान इतनी कोमल है कि ब्लेड इसमें धंस जाएगा... खैर इसके सहारे ऊपर झूल कर मैं इसके वारों से कुछ देर तक तो बच ही सकता हूँ.... अरे ये क्या है"

"क्या हुआ ध्रुव?"

"ऊंचाई पर आने के बाद मैं देख पा रहा हूँ कि जिस जमीन पर हम खड़े हैं वो एक मछली की आकृति में तराशी हुई है... इसका क्या अर्थ हो सकता है"

"इसका मतलब कहीं ये तो नहीं कि हमें यहाँ से निकलने के लिए किसी मछली का प्रयोग करना होगा"
शक्ति ने कहा तो अम्लिका शक्ति पर वार करते हुए बोल पड़ी

"आंsssssहांssss.... इसका अर्थ है की तुम दोनों जल बिन मछली जैसे तड़प तड़प कर मरोगे"

"जल.... हाँ .... जल ही बचाएगा हमें शक्ति"
"पर यहाँ अम्ल क्षेत्र में जल कहाँ से आएगा... और आ भी गया तो ये अम्ल उसमे घुल कर उसे बेकार कर देगा"

"नहीं करेगा.... तुम बस अम्लिका को संभाल लो"
ध्रुव ने अपनी स्टार रोप का दूसरा सिरा भी छत में धंसा दिया और खुद जमीन पर आ गया... इसके बाद उसने तीन और स्टाररोप्स के दोनों सिरों के ब्लेडस् को छत के अलग अलग कोनों में धंसा दिया.... ऐसा करने के बाद उसने सभी रोप्स के बीच वाले झूलते हिस्सों को पकड़कर पूरी ताकत से खींचा और पूरी की पूरी छत नीचे आ गयी...छत के टुकड़ों के अम्ल में मिलने के बाद देखते ही देखते उस स्थान पर पानी नज़र आने लगा... और....

"....अम्लिका भी ख़त्म हो गयी, ये कैसा जादू था ध्रुव"

"जादू नहीं शक्ति... विज्ञान था... दरअसल जब मैंने महसूस किया की छत की चट्टान ठोस ना हो कर भुरभुरी है साथ ही अम्लिका छत की ओर वार करने से बच रही है तब मुझे यकीन हो गया की छत वास्तव में क्षार तत्व की बनी हुई है और..."

".... अम्ल क्षार मिलकर जल का निर्माण करते हैं"

शक्ति ने चहक कर कहा... थोड़ी ही देर में पूरी गुफा लवणीय (नमक वाले) जल से भर गयी और दोनों उसमे डूब गए......
◆●◆●◆●◆●◆●◆

(अद्भुत.... लग ही नहीं रहा की इस तिलस्म की रचना एक मानव ने की है)

तिलस्म के अगले चरण के दृश्य देख कर विस्मित शक्ति ने बोलना चाहा, किन्तु जल के अंदर होने के कारण भावनाएं शब्दों का रूप ना ले सकीं, पर आश्चर्यजनक रूप से शक्ति जल में सांस ले पा रही थी
ध्रुव भी आश्चर्य के सागर में गोते लगा रहा था, उसके गले में लगा यंत्र उसे सांस तो लेने दे रहा था पर वो भी बोल पाने में असमर्थ था

दोनों के चारों ओर ढेरों सर्प फैले हुए थे जिनके फनों से अलग अलग प्रकार की फुंकार निकल रही थी, और सामने पांच फनों वाला एक विशाल नाग था जिसके प्रत्येक फन पर पृथ्वी जैसी एक गोल आकृति रखी थी।

(इस पानी में मैं बोल नहीं पा रहा हूँ और शक्ति सांस ले पा रही है... इसका अर्थ ये है कि ये भी तिलस्म की ही कोई शक्ति है... शायद इसलिए ताकि हम आपस में बात करके कोई प्लान न बना पाएं और साथ ही इन सर्पों के विष के प्रभाव से मारे जाएँ)

"यथार्थ.... तू सर्वथा सत्य ही विचार कर रहा है बालक, ये परिस्थितियां इन्ही कार्यों की पूर्ति हेतु निर्मित की गयीं हैं"

ये स्वर ध्रुव और शक्ति के दिमागों में ऐसे गूंजा मानो कोई सामने से बोल रहा हो
ध्रुव और शक्ति ने चारों तरफ घूम कर देखा पर उन्हें सर्पों के अलावा कोई नहीं दिखाई दिया

"विस्मित मत हो... ये हमारा क्षेत्र है, हमें तुम दोनों शेषनाग बुला सकते हो, और आज इस जल क्षेत्र में हम तुम्हारी जल समाधी बनायेंगे"

आवाज की गूँज समाप्त होने के साथ ही नागों ने दोनों पर आक्रमण कर दिया... सबकी शक्तियां भिन्न थीं... ध्रुव पर आक्रमण करने वाले नाग के दो फन थे और दोनों फनों से भीषण अग्नि लपटें निकल रही थी, ध्रुव केवल अपनी फुर्ती से उनसे बचने का प्रयास कर रहा था.....
(कमाल है, पानी में आग....पानी के अंदर मेरी गति बहुत कम है पर शुक्र है की ये समस्या इस नाग को भी है, फिर भी मैं ऐसे ज्यादा देर तक नहीं बच सकता क्योंकि अन्य नाग भी पास आ रहे हैं )

शक्ति पर एक साथ कई नागों ने आक्रमण कर दिया, सभी उसपर अपनी विष फुंकार छोड़ रहे थे साथ ही उसे अपनी कुंडली में बांधने का प्रयास भी कर रहे थे ... शक्ति ने मुंड का प्रयोग करके जल में घुल रहे विष से बचने का प्रबंध किया और अपने अमानवीय प्रहारों से नागों को विचलित एवं मूर्छित करना प्रारम्भ कर दिया
(तिलस्म के इस चरण से भी निकलने का कोई न कोई मार्ग अवश्य ही होगा... किन्तु क्या?)

इधर ध्रुव अपनी सधी हुई कलाबाजियों से अपने शत्रुओं के वारों को उनके खिलाफ ही इस्तेमाल कर रहा था... ऐसा करते हुए वो अब तक चार सर्पों को आपस में उलझा चुका था और तीन को अग्नि फुंकार में झुलसा चुका था....

(ये आग छोड़ने वाला सांप सबसे ज्यादा खतरनाक है इससे ज्यादा देर तक लड़ते रहना ठीक नहीं होगा, ब्रेसलेट में बची ये आखिरी स्टारलाइन अब काम आयेगी)

इस बार नाग ने जैसे ही आग फेंकने के लिए मुँह खोला , ध्रुव ने स्टारलाइन के दोनों सिरों को उस नाग के दोनों फनों में बांध कर खींच दिया, अग्नि के दबाव से उसके दोनों फन बिना धमाके के ही फट गए।

(शेषनाग.... अगर पुरातन कथाओं को आधार मानें तो शेषनाग ही हमारी पृथ्वी को अपने फन पर धारण करते हैं... मतलब इसके फनों पर रखी इन पृथ्वीयों में से कोई एक हमारा लक्ष्य है... और बाकी शायद मृत्यु)

ध्रुव सोंच में मगन था कि तभी अंतिम बचे नाग ने उसे अपनी कुंडली में फंसा लिया... वो ध्रुव को निगलने ही वाला था की शक्ति ने उसपर वार करके ध्रुव को बचा लिया

ध्रुव ने शेषनाग की ओर इशारा करके शक्ति का ध्यान उस ओर खींचा और फिर अपने हाथों से उसके फनों पर रखी पृथ्वीयों की ओर इशारा करके अपने हाथ को गोल घुमाकर एक उंगली दिखाई।

(ध्रुव शायद ये कहना चाह रहा है कि हमारा मार्ग इनमें से किसी एक पृथ्वी में है, पर सही पृथ्वी का चुनाव करने के लिए पहले शेषनाग के नज़दीक जाना होगा)

शक्ति और ध्रुव शेषनाग की ओर बढे तो शेषनाग ने उनपर पूँछ से प्रहार किया...

(आआह्ह्ह्ह... पूरा दिमाग घूम गया... ऐसे दो चार वार और हो गए तो मेरा तो राम नाम सत्य हो जाएगा)
शेषनाग ने एक फन से असावधान ध्रुव को लगभग निगल ही लिया और शक्ति एक अन्य फन से लड़ने में व्यस्त थी

(इससे पहले ये मुझे पूरा निगले, कुछ करना होगा)
ध्रुव ने अपनी बेल्ट से 3 - 4 एसिड कैप्सूल निकाले और फन के अंदर ही फोड़ दिए ... शेषनाग ने तड़प कर अपना फन खोला और ध्रुव बाहर आ गया

एक दूसरे फन के विष से शक्ति के मुंड ने उसे बचाया, लड़ाई जारी थी

(ध्रुव के अनुसार इन सभी पृथ्वीयों में से कोई एक ही असली है.... सामान्य रूप से देखने पर तो सभी एक जैसी लग रही हैं, लेकिन अगर वास्तविक शेषनाग की स्थिति पर गौर करें तो वो भी इसी नाग की तरह बहुत क्रोधी स्वाभाव के हैं किन्तु वो जिस भी फन पर पृथ्वी धारण करते हैं वो फन शांत रहता है ताकि पृथ्वी शांत रह सके, और इस नाग का सिर्फ एक ही फन शांत है अर्थात वही है हमारा लक्ष्य)

शक्ति ने ध्रुव के पास जा कर उस पृथ्वी की ओर इशारा किया ... दोनों उसी ओर तैरने लगे पर शेषनाग ने उन्हें अपनी कुंडली में जकड लिया...

"तुम्हारी समय सीमा समाप्त हुई मानवों"

(शेषनाग ने हमें दुम से पकड़कर अपने शरीर पर वार करने का अच्छा अवसर दिया है)

ध्रुव ने अपने जूते की हील से चाकू निकालकर शेषनाग की पूँछ पर जगह जगह वार किये जिससे पूँछ की पकड़ ढीली पड़ गयी ... शक्ति और ध्रुव बाहर आ गए... इसके तुरंत बाद शक्ति असावधान शेषनाग की पूँछ पकड़कर अपनी पूरी गति से दूसरी दिशा में तैर गयी और शेषनाग का संतुलन बिगड़ गया, उसके कुछ भी समझ पाने से पूर्व ध्रुव और शक्ति शांत फन वाली पृथ्वी में समा गए।
◆●◆●◆●◆●◆●◆

इधर नागदीप में नागराज और परमाणु एक दूसरे को रोकने में लगे थे
नागराज ने विष फुंकार का प्रयोग किया लेकिन परमाणु उसके मार्ग से हटकर बच गया

(परमाणु के नजदीक जा कर विष फुंकार का प्रयोग करना होगा)

परमाणु ने परमाणु रस्सी से नागराज के शरीर को बाँधने का प्रयास किया पर नागराज ने उसे साधारण रस्सी की तरह तोड़ दिया .... नागराज ने कलाई आगे करी तो नाग रस्सी ने परमाणु के शरीर को लपेट लिया, नागराज ने झटके से उसे अपनी तरफ घसीटा और एकदम नजदीक आ जाने पर उसे अपनी हल्की फुंकार से मूर्छित कर दिया।

नागराज अभी आगे बढ़ने की सोंच ही रहा था कि उसपर पीछे से एक वार हुआ और उसके आस पास की मिट्टी एक ठोस कैद का निर्माण करने लगी।

"इतनी भी क्या जल्दी है जाने की, जरा मैं भी तो देखूं की नागराज कितना शक्तिशाली हो गया है"

"राक्षस चण्डकाल, अब तुम आये हो मुझे रोकने, वो भी इस मिट्टी की कैद में, इसे तो मैं पल भर में ही तोड़ दूंगा"

नागराज ने अपने दोनों हाथों से उस कैद को तोडना चाहा किन्तु कराह उठा, सलाखों पर हुआ वार उसे अपने ऊपर लगता हुआ महसूस हुआ ... नागराज ने कणों में बदलकर निकलने का प्रयास किया किन्तु कैद भी उसी के साथ कणों में बदल गयी।

"हा हा हा... तू  इस कैद से नहीं बच सकता नागराज, ये तेरे शरीर की ही मिट्टी(तत्व) से बनी कैद है, ये तेरा साथ नहीं छोड़ेगी.... हा हा हा... महारानी तो कह रही थी की तू बड़ा शक्तिशाली हो गया है, पर तू तो पहले ही वार से कैद में आ गया।"

(चण्डकाल भी नगीना का गुलाम... नहीं ... अवश्य ही इस षड्यंत्र में कोई और महारानी भी है और उसका पता लगाने के लिए मुझे पहले इसे हराना होगा)
चण्डकाल के ठहाके एकाएक रुक गए जब उसने देखा की उसकी बनाई कैद वापस नागराज के जिस्म में समा गई

"असंभव... ये कैसे हुआ"

"क्योंकि तुमने अपने अति आत्मविश्वास में मुझे बता दिया की ये कैद मेरे शरीर के ही तत्वों से बनी है, और इस समय मेरे पास इच्छाधारी शक्ति भी है जिससे मैं अपने शरीर को कोई आकार दे भी सकता हूँ और पुनः अपना आकार प्राप्त भी कर सकता हूँ... अब तुम सीधी तरह से मुझे अपनी रानी के पास ले चलोगे या..."

नागराज ने चण्डकाल जैसा ही रूप धरकर उसे दबोच लिया

(इस रूप में तो इसकी और मेरी शक्तियां बराबर हैं, मैं इसे मार नहीं पाउँगा, मुझे कोई ऐसा वार करना होगा जो इसकी इच्छाधारी शक्ति की सीमा से परे हो... {चारों तरफ नज़र घुमाकर} वो शरीर मेरे काम आ सकते हैं)

चण्डकाल धुंए में बदलकर नागराज के पंजो से मुक्त हुआ और तीन हिस्सों में बंटकर जमीन पर मूर्छित पड़े कालदूत के तीनों शरीर में समा गया... और तीनों ही एक भयानक अट्टाहास के साथ उठ खड़े हुए।

"नामुमकिन... इसने अशक्त कालदूत के शरीर पर कब्ज़ा कर लिया है.. . इस प्रकार तो इसे महात्मा की शक्तियां भी हासिल हो गयी होंगी"

"हा हा हा... सही कहा नागराज, दुर्दान्त योद्धा है ये कालदूत और अनंत शक्तियां हैं इन शरीरों में, अब ये कालरूप 'काल' (विष्या), 'महाकाल' (महाविष्या) और 'परमकाल' (परमविष्या) मिलकर तेरे प्राण निकालेंगे और तू एक साथ तीन रूप नहीं धारण कर सकता... अब मरेगा नागराज हा हा हा"

कालरूपों ने नागराज पर विष उगलना शुरू कर दिया... नागराज ने भी बचने के लिए विष फुंकार का ही सहारा लिया।

(कालदूत के सम्मिलित विष के आगे मेरा विष ज्यादा देर नहीं टिक सकता )
नागराज का सोचना सही था कुछ ही पलों बाद नागराज को बचने के लिए कणो में बदलकर वहां से हटना पड़ा...
काल, महाकाल और परमकाल ने उसपर किरणों से वार करना प्रारम्भ कर दिया

"पिछली बार मैं कालदूत के किरण वार झेल गया था पर इस बार इनमें चण्डकाल की राक्षसी शक्तियां भी हैं, ऐसे कुछ एक सम्मिलित वार मेरी जीवनलीला समाप्त कर सकते हैं"

नागराज ने ध्वंसक सर्पों का प्रयोग किया किंतु कोई प्रभाव नहीं हुआ... कालरूपों ने नागराज को एक साथ अपनी कुंडलियों में फंसाकर कुचलना प्रारम्भ कर दिया।

"इस चक्की में से तेरी हड्डियों का चूरा ही बाहर आएगा नागराज"

(ये सही कह रहा है... तीनों कुंडलियों को एक साथ खोल पाना मेरे बस की बात नहीं है)
नागराज ने कणो में बदलना चाहा पर महाकाल के किरण वार ने उसे कणो में नहीं बदलने दिया

(नागू और सौडांगी अभी तक इन किरणों का स्रोत नहीं खोज पाए हैं और ऐसी स्थिति में मैं अपने किसी भी सर्प को बाहर लाने का खतरा नही उठा सकता... अब एक ही तरीका है मेरे पास)

नागराज ने कलाइयाँ आगे करीं और उससे नागफनी सर्प निकल कर तीनों की गर्दनों पर लिपट गए... कुछ ही पलों में काल, महाकाल और परमकाल की पकड़ ढीली पड़ गयी और नागराज बाहर आ गया

(इनकी गर्दन दबने के बाद ऐसा लगा जैसे धड़ों में जान ही नहीं है जबकि इनके मस्तक सचेत हैं ये कैसे.... ओह् अब समझा)

काल रूप के अगले वार से पहले ही नागराज ने पास पड़ी एक चट्टान पर जोरदार लात मारी और.... चट्टान धुंए में बदलकर चण्डकाल में परिवर्तित हो गयी

"आअह्ह... तुझे मेरी स्थिति का ज्ञान कैसे हो गया?"

"जब मुझे इस बात का ज्ञान हुआ की अगर राक्षस मेरा विष ही नहीं पचा सकते तो तू महात्मा के विषैले शरीर में कैसे घुस सकता है,और जैसे ही महात्मा के धड़ का उनके मष्तिष्क से संपर्क कटा तो वो बेजान हो गया... इससे मैं समझ गया की तूने मात्र उनके सुप्त मष्तिष्क पर अधिकार किया हुआ है और खुद कहीं छुपा है... फिर चारों ओर देखने पर मुझे एक यही चट्टान नई प्रतीत हुई क्योंकि ये पहले यहाँ नहीं थी, इससे मैं समझ गया की ये तू ही है"

"पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा नागराज क्योंकि कालदूत को मैं पुनः अधिकार में कर लूंगा"

"कोशिश कर के देख ले चण्डकाल... पर तेरे मानसिक वार नागफनी सर्पों को पार नहीं कर सकते और किसी अन्य वार के लिए मेरे ये घूंसे तेरे दिमाग को केंद्रित नहीं होने देंगे"

नागराज इतनी फुर्ती से वार कर रहा था की चण्डकाल को धुंए में बदलने के लिए भी ध्यान केंद्रित करने का मौका नहीं मिला और अंततः वो मूर्छित हो गया।

"उम्मीद करता हूँ की कालदूत भी नागफनी सर्पों की इस कैद से बाहर नहीं आ पाएंगे, अब तक नागू और सौडांगी ने इस सारे फसाद की जड़ भी खोज ली होगी, ना जाने अभी और कितने मित्रों और शत्रुओं से लड़ना होगा"

नागराज ने नागू से मानसिक संपर्क किया और नागमहल की ओर बढ़ गया।
◆●◆●◆●◆●◆

पृथ्वी के अंदर समाते ही ध्रुव और शक्ति एक नए स्थान पर पहुँच गए थे
तेज बिजलियाँ चमक रही थीं घनघोर वर्षा हो रही थी जिससे जमीन दलदली हो रही थी, एक ओर अथाह जल राशि थी, दूसरी ओर ऊँचा पहाड़ और सामने चार समुराई लड़ाके जिनके तलवार चलाने की गति किसी आम इंसान के हिलने की गति से भी ज्यादा तेज़ थी।

"एक और मुसीबत... अब यहाँ से कहाँ जाना है ध्रुव... दलदल में, पानी में, आसमान में या फिर पहाड़ में"

"जहाँ भी जाना हो... इनसे बच के ही जाना होगा शक्ति, पहले इनसे लड़ो फिर सोंचते हैं"

शक्ति ने जमीन पर हाथ रखा और लड़ाकों पर एक साथ कई धारदार हथियार चला दिए... बला की फुर्ती से वो चारों उस वार से बच गए... सबने एक साथ ही दोनों पर आक्रमण किया पर तलवार किसी को भी लगने से पहले पिघल गयी... शक्ति ने ऊष्मा वार किया था

"जमीन दलदली होती जा रही है... हमें पहाड़ की ओर जाना है"
ध्रुव ने पहाड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा

शक्ति और ध्रुव उन चारों से और जमीनी दलदल से बचते हुए पहाड़ की तरफ बढ़ने लगे... ध्रुव ने अपने प्रतिद्वंदियों को दलदल में गिरा दिया और शक्ति ने अपनी ऊष्मा से उन्हें जला दिया....और पहाड़ी के ऊपर पहुँचने पर

"यहाँ तो भयानक अग्नि प्रज्वलित है... एक और रूकावट, फिर मार्ग कहाँ है... यहाँ पर तो अभी तक कोई संकेत भी नहीं दिखाई दिया है और ना ही कोई खतरनाक प्रतिद्वंदी"

"है शक्ति, सब है... संकेत है पूरा तिलस्म जो पंच तत्वों पर आधारित था, पहली बार प्रश्न क्षेत्र में आकाश में मार्ग मिला था, फिर ऑक्सिजन यानि वायु में, उसके बाद अम्ल क्षेत्र में जल में और जल क्षेत्र में पृथ्वी में, ये (आकाश, वायु, जल, पृथ्वी) शरीर को बनाने वाले चार तत्व है, अब आखिरी मार्ग आखिरी तत्व  यानि अग्नि में होना चाहिए"

"तुम कह रहे हो तो सत्य ही होगा"

दोनों एक साथ अग्नि कुण्ड में कूद गए और झुलसते हुए सीधे बर्फीली जमीन पर आ गिरे।

"लगता है हम वापस हिमालय पर ही आ गए हैं और.... मेरी शक्तियां भी वापस आ गई हैं"
शक्ति ने आस पास के नज़ारो और अपने खड़ग को देख कर कहा

"हुम्म... हमें तुरंत ही नागदीप चलना चाहिए... योजना का अगला चरण वहीँ पर होना था"

शक्ति और ध्रुव नागदीप की तरफ चल दिए
◆●◆●◆●◆●◆

नागदीप में

नागराज नागू के संकेतों का पीछा करते हुए नागमहल के उस कक्ष में प्रवेश कर चुका था जहाँ से सबको गुलाम बनाने की प्रक्रिया को अंजाम दिया जा रहा था।

बहुत मद्धिम प्रकाश था वहां, पर नागराज की सर्प दृष्टि देख पाने में सक्षम थी... कमरे के बीचोंबीच एक विशाल संयंत्र जिसमें ढेर सारी नागमणियां स्थापित की गयी थीं और मध्य में नियंत्रक पहने बुद्धिपलट बैठा था, संयंत्र के चारों ओर गोलाई से कई स्वर्णद्वार बने हुए थे जिनके माध्यम से नियंत्रक की किरणों को विभिन्न स्थानों तक फैलाया गया था

"ओह तो ये संयंत्र है सबके गुलाम बनने का कारण... ये द्वार तो वैसे ही हैं जैसा धनंजय बनाता है, इसका मतलब वो भी ..."

".... हमारा गुलाम है। ... कितनी देर लगा दी तुमने यहाँ तक आने में, मैं कब से तुम्हारी राह देख रही हूँ नागराज"
हाथों को आपस में बांध कर दीवार पर कन्धा टिकाए खड़ी नगीना ने कहा

"नगीना... हाँ इस बार थोड़ी ज्यादा देर हो गयी... पर चिंता मत करो ... अंजाम वही होगा जो हमेशा होता है... तुम्हारी हार!!"

"जागती आँखों से स्वप्न नहीं देखना चाहिए नागराज, तुम्हारे अतिरिक्त संसार की हर बड़ी शक्ति हमारे अधीन है... ब्रम्हांड रक्षक भी, अकेले कब तक लड़ोगे"

"जब तक साँस है तब तक लड़ूंगा... खैर ये बात तुम्हारी समझ में नहीं आएगी"
नागराज ने नगीना पर वार करना चाहा पर उसे पीछे से कोबी और नागू ने पकड़ लिया

"कोबी.... और नागू तुम भी...."

"चौंको मत नागराज...एक नागमणि के बल पर हज़ारों नागमणियों का मुकाबला कोई कितनी देर तक कर सकता है ... ये बेचारा तो इस कक्ष में प्रवेश करते ही नियंत्रक के प्रभाव में आ गया था, और इसने तुम्हे मेरे कहने पर ही यहाँ बुलाया है, ताकि मैं तुम्हे ख़त्म कर सकूँ"

(सबसे पहले इस संयंत्र का कुछ करना होगा वरना लोगों को गुलाम बनाने का ये सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा... पर इस कमरे में इतना अँधेरा क्यूँ है... शायद इस संयंत्र को रोशनी से कोई समस्या है, देख लेते हैं)

नागराज की कलाइयों से ढेरों जगमग सर्प निकल कर नागमणियों के पास एकत्रित होने लगे, कमरे में ढेर सारा प्रकाश फ़ैल गया... मणियों के पास प्रकाश की उपस्थिति से नियंत्रक किरणों के विस्तार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और ऐसा होते ही नागू वापस होश में आ गया।

"यहाँ तो अलग ही फ़िल्म चालू हो गयी थी, अच्छा हुआ जो तुमने कट करवा दिया"

नागराज ने शारीरिक शक्ति का प्रयोग करके कोबी की पकड़ से खुद को छुड़ाया और उसे उठाकर संयंत्र पर ही पटक दिया जिससे पूरा संयंत्र टूट गया...हड़बड़ाए बुद्धिपलट ने नियंत्रक से नागराज के दिमाग पर वार किया...

"नहीSSSSS, नागराज पर वार मत करना"

नगीना के रोक पाने से पहले ही वार हो गया और जैसा डर था वैसा ही हुआ... नागराज की इच्छाधारी शक्ति के प्रभाव में आते ही नियंत्रक पर इतना तीव्र बैक शॉक लगा की वो टूट गया और साथ ही बुद्धिपलट भी बेहोश हो गया

"नाsssss गराssssssज"
क्रोधित नगीना ने तंत्र वारों का प्रयोग किया जिसे नागू ने अपनी मणि शक्ति से बेकार कर दिया

"पागल नागिन की dvd नहीं मिल रही थी मार्केट में पर आज देख ली"

नागू ने नगीना को मणि की किरणों में कैद कर लिया

इधर कोबी ने नागराज पर गदा से वार करना शुरू कर दिया

(नियंत्रक टूटने के बाद भी इसका दिमाग नगीना के ही कब्ज़े में है मतलब गुलाम बने सभी व्यक्तियों को सम्मोहन से ही ठीक करना पड़ेगा... पर पहले इसका कुछ करना होगा क्योंकि इसकी आँखों को भी नगीना ने तंत्र किरण से ढका हुआ है, इसे बेहोश करना पड़ेगा)

कोबी के वारों से बचते हुए नागराज ने कोबी पर एक जोरदार प्रहार किया और सैंकडों नागों की शक्ति से भरे इस वार से कोबी बेहोश हो कर गिर पड़ा
◆●◆●◆●◆●◆●◆

स्वर्ण नगरी में

"नहींsssss ... मैं एक बार फिर मात नहीं खा सकती, अब मैं खुद जाउंगी नागदीप"

नागदीप के दृश्य देखकर मिसकिलर आपे से बाहर हो रही थी पर तभी...

"ये क्या...ये दोनों वापस आ गए... धनंजय तुम नागदीप जाओ और ध्रुव की सहायता करो... इस बार नागराज बचना नहीं चाहिए"

"जैसा आदेश महारानी"

धनंजय के वहां से जाने के बाद.....
अब कितना पढोगे भाइयों ... बाकि की कहानी
अगले और अंतिम भाग में
और हाँ पढ़ कर रिव्यु अवश्य दें।

1 comments :

ankit ji boht achhi kahani.... next part bhi upload kro jaldi.. plzzz

Reply