Thursday, 11 August 2016

COP प्रस्तुत करते हैं

अभिशप्त योद्धा

लेखक निशांत मौर्य

अध्याय 2


एक अज्ञात स्थान, चारों ओर बिखरे हुए नरमुंड, और एक तांत्रिक गहरी साधना में लीन |
अचानक तांत्रिक की साधना टूट जाती है और प्रस्तर का लहूलुहान शरीर तांत्रिक के आगे गिरता है|
" तू असफल होकर लौटा है, तुझे सजा मिलेगी " ,
तांत्रिक ने हवन कुंड में बकरे के ताजा कटे हुए सिर से खून की बूंदें टपकाते हुए कहा|

" जय काल भैरव...  भेट स्वीकार कीजिए| "
और बाकी का बचा हुआ खून एक टूटी हुई खोपड़ी में डालकर पीने लगा
 "मुझ पर दया कीजिए तन्त्रसम्राट, मुझे नहीं पता था कि वो इतना शक्तिशाली है। मैने उसके पास से अत्यंत तीव्र पुण्य ऊर्जा महसूस की थी, और यही ऊर्जा मेरी तामसिक शक्तियों को कमजोर बना रही थी।", प्रस्तर कालपुत्र के सामने गिड़गिड़ाने लगा।
 " हाहाहा अत्यंत मूर्ख है तू, इसलिए तो मैंने तुझे सावधान करके भेजा था ताकि मैं इस संसार की सबसे महान पुण्यात्मा की बलि काल भैरव को दे सकूं और फिर मुझे कोई भी नहीं हरा सकता था।"
"सज़ा तो मिलेगी "
यह बोलने के साथ ही कालपुत्र ने कुछ मंत्र पढे और प्रस्तर का शरीर आग से घिर गया|
 "अब तू हमेशा इस नर्क की आग में जलेगा "
"  माफ कर दीजिए सम्राट.... आह्ह्ह्ह्ह्ह्.... नहीँइइइइइइ ",
प्रस्तर की चीखों से पूरी गुफा गूंजने लगी|

स्थान -  राजन मेहरा का घर :
भारती न्यूज चैनल
आज लगातार पांचवां दिन है और सुपर कमांडो ध्रुव का कोई पता नहीं चल पा रहा है। ध्रुव की गैरमौजूदगी में राजनगर में अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, हालांकि पुलिस और कमांडो फोर्स ने स्थिति संभाल रखी है। उन्हें आखिरी बार दो गुंडों से एक लड़की को बचाते हुए देखा गया था। परंतु कुछ लोगों का कहना है कि वो आखिरी बार राजनगर के उत्तरी हिस्से में दिखे थे जहां से राजनगर का पहाड़ी क्षेत्र शुरू होता है और उनके साथ उनकी एक मित्र भी जिसका नाम रिचा बताया जा रहा है।

श्वेता,  राजन से रिमोट छीनकर टीवी बन्द कर देती है।
" पापा भैया कहाँ चला गया, उसे इस बात का भी ख्याल नहीं है कि आज मेरा जन्मदिन है| मैं भैया को कभी माफ नहीं करूंगी ", इसी के साथ श्वेता रोने लगती है।
तभी डोरबेल बजती है और कुरियर वाला एक बड़ा सा पैकेट गिफ्ट करता है जिस पर लिखा था हैप्पी बर्थडे मेरी पगली बहन|
कुरियर वाला बताता है कि ये पैकेट ध्रुव सर ने एक हफ्ते पहले बुक किया था ताकि वो अपनी बहन को सरप्राइज दे सकें|
" देखा बेटा ध्रुव तुम्हारा कितना ख्याल रखता है| हमारे साथ ना होते हुए भी वो हमें अपनी कमी महसूस नहीं होने दे रहा है ", बोलते - बोलते राजन मेहरा का गला रूंध गया और आंखों से दो बूंद आंसू निकल आये।
श्वेता पैकेट खोलती है और उसकी आंखें फैल जाती है| वो मन में निर्णय करती है कि वो पता लगा कर ही रहेगी कि आखिर उसका भाई कहाँ गया।

स्थान - असम के जंगल में एक अत्यंत गुप्त स्थान पर:

" पुत्र ध्रुव और पुत्री ऋचा अब तुम दोनों काफी हद तक अपनी मानसिक शक्तियों पर काबू करना सीख चुके हो। किसी तरह का साधारण तांत्रिक और मांत्रिक वार अब तुम दोनों पर असर नहीं करेगा और विशेषकर ध्रुव तुम्हारी मानसिक शक्तियों की तो कोई सीमा ही नहीं है यदि तुम चाहो तो कुछ भी कर सकते हो",  एक वृद्ध व्यक्ति जिसकी आंखें बहुत तेजवान थीं ने ऋचा और ध्रुव को संबोधित करते हुए कहा।
" परंतु बाबा आपने हमें यह तो बताया कि कालपुत्र फिर से लौट आया है और वो पूरी धरती का विनाश करने की क्षमता रखता है। परंतु आपने यह नहीं बताया कि मुझे उससे खतरा क्यों है और वास्तव में कालपुत्र है कौन " -  ध्रुव ने अचरज भरी निगाहों से बाबा को देखा।
"  मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि तुम दोनों इस सच्चाई को जानों की आखिर तुम्हारा कालपुत्र से क्या संबंध है|"

कुछ घटनाएँ ब्रह्मांड के संदर्भ में अत्यंत सूक्ष्म होती हैं, इतनी सूक्ष्म कि कोई उन्हें ध्यान भी नहीं रखना चाहता परंतु उनमें से कुछ घटनाओं का काफी गहरा असर होता है। मैं भी तुम्हें आज एक ऐसी घटना सुनाने वाला हूँ।"

बात सतयुग की है जब चारों ओर सिर्फ़ धर्म का राज्य था| सभी आपस में प्रेम से रह रहे थे। उस समय यहाँ असम में राजा धर्मपुत्र का शासन था। राजा धर्मपुत्र एक आदर्श राजा थे, प्रजा उसके राज्य में अत्यंत प्रसन्न थी| राजा का एक छोटा भाई भी था जिसका नाम कालपुत्र था| कालपुत्र राज्य का सेनापति और एक शूरवीर था उसने प्रजा और राजा के लिए कई बार अपनी जान दांव पर लगाई थी| उसी राज्य में हिमालय पर्वत की तराई में यक्षों का निवास था।
कहा जाता है यक्षों का निवास होने के कारण उस राज्य में समृद्धि हमेशा बनी रहती थी कोई भी दुखी नहीं था|  राज्य का प्रत्येक नागरिक यक्षों की पूजा करता था।
राजा की पुत्री का जन्म भी एक यक्ष के आशिर्वाद से हुआ था| इसलिए राजा ने उसका नाम यक्षांशी रखा था।
यक्षांशी बहुत सुंदर थी| उसके जन्म के समय भविष्यवाणी हुई थी कि यह कन्या जिस इंसान से प्रेम करेगी उसे संसार में कोई पराजित नहीं कर पाएगा। राजकुमारी इतनी सुंदर थी कि कोई भी साधारण मनुष्य ज्यादा देर तक उसकी ओर लगातार नहीं देख सकता था। युवा अवस्था आने के साथ साथ उसकी सुंदरता और बढ गई थी।
 राजा के छोटे भाई कालपुत्र को यक्षों की पूजा नहीं पसंद थी उसे लगता था कि राज्य की समृद्धि का कारण यक्ष नहीं बल्कि कुशल शासन है और यक्षों के आशिर्वाद के बिना भी वो राज्य करने में सक्षम है परंतु बहुत ही जल्द उसका यह भ्रम टूटने वाला था। अक्सर ज्यादा खुशियों को नजर लग जाती है और यक्षनगर के साथ भी यही होने वाला था।
एक दिन राजकुमारी यक्षांशी अपनी सखियों के साथ भ्रमण को निकली। राज्य का वातावरण कुछ ज्यादा ही मनमोहक था और बसंत ऋतु ने तो उस पर चार चांद लगा दिए थे। भ्रमण करते हुए वो कब घने जंगल के अंदर पहुंच गई उसे खुद नहीं पता चला
 जंगल का दृश्य अत्यंत मनोहारी था, चारों ओर हरियाली, ऊंचे-ऊंचे देवदार के वृक्ष, अठखेलियां करते हुए झरने। मानो धरती पर स्वर्ग उतर आया हो। और इस स्वर्ग की सुंदरता को देखने के लिए स्वर्गवासी (देवता) भी तरसते थे।
" सैनिकों यहीं रूक कर पहरेदारी करो हमें झरने में स्नान करना है ",  यह बोलकर यक्षांशी अपनी सखियों को लेकर झरने में स्नान करने चली गई।
राजकुमारी नहीं जानती थी कि उसे स्नान करते हुए कोई देख रहा था। कुछ देवपुत्र भी उसी समय वहाँ भ्रमण को आए थे। सामान्य लोगों की दृष्टि से बचने के लिए उन्होंने भंवरो का रूप धारण कर रखा था, इसी बात का लाभ उठाते हुए वो सभी राजकुमारी और उनकी का स्नान देखने लगे| उनमें से एक अग्निदेव का पुत्र कृशानु भी था। कृशानु राजकुमारी के अतुलनीय सौंदर्य पर मोहित हो गया और उसने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वो राजकुमारी को किसी भी सूरत में प्राप्त करके रहेगा।
राजकुमारी की जल क्रीड़ा समाप्त होने के बाद सभी महल की ओर प्रस्थान करने वाले थे कि राजकुमारी की दृष्टि झाड़ियों के पास पड़े एक व्यक्ति पर पड़ी
 राजकुमारी ने उस व्यक्ति के पास जाकर देखा तो वह एक नवयुवक था जिसके मुख पर एक विचित्र सा तेज़ था। चूंकि युवक मूर्छित था तो राजकुमारी ने सैनिकों से उसे भी साथ लाने को कहा।
जब सभी महल पहुंचे तब तक सूर्य लगभग डूब चुका था और महाराज धर्मपुत्र महल में चिंतित होकर टहल रहे थे।

"पिताजी हम आ गए"

पुत्री की आवाज कान में पड़ते ही मानों महाराज पुनर्जीवन मिल गया।
" कहाँ थी आप? जानती हैं हमें आपकी कितनी चिंता हो रही थी, हमारे तो प्राण ही निकल गए।",राजा ने बनावटी क्रोध प्रदर्शित किया|
" पिताजी आप भी व्यर्थ चिंता कर रहे हैं, आप जानते हैं कि मैंने युद्ध का प्रशिक्षण चाचाश्री से लिया है और भला उनसे प्रशिक्षण लेने के बाद मेरा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता है क्या।"
यक्षांशी वाद में भी उतनी ही चपल थी ।
"और आप जानते हैं मुझे वन में एक व्यक्ति मिला देखने में राजकुमार लगता है, राजवैद्य को उनके उपचार के लिए बुलाया है हमनें ।"
"अरे हमारी पुत्री कितनी समझदार है| चलिए हम भी उसे देखना चाहेंगे कि हमारी पुत्री ने किसके प्राण बचाए"

महाराज यक्षिणी के साथ उपचार कक्ष में पहुंचते हैं और युवक का चेहरा देखते ही आश्चर्य से उनके मुंह से निकल जाता है
"यक्षकुमार अक्षांश वो भी इस अवस्था में "

अध्याय 2 समाप्त

To be continued....

Post a Comment: