Wednesday, 10 August 2016

*आकाश के फूल*
*अभिषेक*

                           [1]

"मैं तुमसे प्रेम करता हूँ,शौर्या"-अनायास ही स्वास्तिक के मुखकमल से ये वचन फूट पड़े।शब्दों में गंभीरता थी।शंका का कोई स्थान न था।शब्दों में धीमापन था। उस एकांत के शांत वातावरण में भी वो आवाज स्वास्तिक के मुख के चहुँओर सीमित रहकर रह गयी परन्तु अनायास में ही हृदय्कोष्ठ के अंतर्तल से निकले इन शब्दों ने स्वास्तिक के ह्रदय को एक गहरी शीतलता प्रदान की। इस बात के श्रवण से स्वास्तिक को अपने ही कर्णों के प्रति आभार होने लगा। फिर एक उल्लास भरे आनंद की कल्पना में आँखें स्वतः ही मुन्द गयी। और स्वास्तिक कल्पना के सागर में उतरता चला गया।
अपने आँचल में खुशियों की सौगात समेटे वर्ष भर बाद दीपावली आज फिर आई थी।बच्चे बड़े सभी के मुख पर मुस्कराहट सिंघासन जमाये बैठी थी। बच्चे सुबह से ही रात में मचाये जाने वाले कोहराम की तैयारियों में जुटे हुए थे।सभी अपनी तैयारियां कर रहे थे। परन्तु इन सबसे दूर बैठा स्वास्तिक कुछ और ही सोचकर मुस्कुरा पड़ता था.जिस तरह समंदर में आने वाली लहर किनारे तक आ कर बाहर की रेत को भी अन्दर ले आती है और फिर अगली लहर के साथ उसे वापस छोड़ भी आती है ठीक उसी मानिंद एक निराशा की लहर आने पर उसके सारे उन्मादों को अपने साथ समेटे ले जाती थी और फिर मर्मपटल पर वापस छोड़ भी आती थी।उसके प्रेमवृक्ष पर नए नए कुसुमों का उदय हो रहा था जो अपना सौरभ उसके अंतर्मन में बिखेर रहीं थीं।और इसी प्रेमवृक्ष का आधार थी 'शौर्या'।
शौर्या और स्वास्तिक दोनों एक दुसरे के अच्छे दोस्त थे और दोनों एक ही कक्षा में पढ़ते थे।किसी मनुष्य के साथ बहुत ज्यादा बात करने पर उसके प्रति प्रीत हो ही जाती है और जब वो कोई परमसुन्दरी लड़की हो तो उसे प्रेम में बदल जाना स्वभाविक है। कक्षा में शौर्या से होने वाली बातें,बातों में हर पल भावनाओं से सृंगार करती शौर्या का सौम्य चेहरा,इस चेहरे पे विराजमान मुस्कराहट और इन मुस्कुराहटों से स्वास्तिक के मर्म को प्राप्त होती शीतलता ,इस शीतलता की पुनरावृत्ति की बारम्बार कामना ,और इस कामना की पूर्ति के लिए स्वास्तिक के द्वारा किये गए कार्यों ने एक दुसरे को समीप ला दिया। उसकी हंसी में स्वास्तिक को वो परमानंद मिलता था जो संभवतः इस समय संसार की कोई भी अन्य चीज से उसे ना मिल सकता था।
दीपावली के अवकाश के कारण दो दिनों से विद्यालय बंद था जिस वजह से वो शौर्या की चित्तहरिणी मुस्कान,स्वास्तिक को प्रेमरस में डुबोने वाली बातें और उन बातों एवं मुस्कुराहटों से जनित शांति से वंचित था।दिल में शौर्या का मनमोहक चेहरा देखने की अभिलाषा बारम्बार दस्तक दे रही थी। स्वास्तिक का दिल कहीं चैन न पा रहा था।बस एक भी झलक मिल जाए तो सुकून आये- ऐसे ख्याल बार बार उसके मन में उठ रहे थे, परन्तु वहां कहाँ थी 'शौर्या'!!ख्यालों की दुनिया में भटक रहे स्वास्तिक की तन्द्रा तब भंग हुई जब अश्रुओं की बूंदों ने होठों का दरवाजा खटखटाया। गहन वेदना के साथ उसने अपने आंसुओं को पोंछा और अपने आँखों से आंसुओं के निकलने का कारण जानने की कोशिस करने लगा।और कोई उचित कारण न मिलने पर वहाँ से उठकर अपने बिस्स्तर पर सोचते सोचते सो गया और कब निद्रा ने आकर उस पर आक्रमण कर दिया उसे पता नहीं चला। सभवतः इस समय प्रेम और प्रेम के प्रभावों की अनुभूति तो वो कर रहा था परन्तु अपने मन में इसको प्रेम का नाम देने का विचार न आ रहा था।
खैर,दिन किसी तरह बीता और सांझ के उस दिन का जीवनकाल प्रारंभ हुआ। जब स्वास्तिक की निद्रा भंग हुई तो उसने आसपास नजर दौड़ाई और उसे सांयकाल का विहंगम दृश्य दिखाई पड़ा। हाथ मुंह धोकर,तरोताजा हो कर पुनः अपने कमरे में आया और खिड़की को खोलकर बाहर झाँकने लगा।विहंगों का झुण्ड अपने बसेरे की ओर प्रस्थान कर चूका था। हरसिंगार के पुष्पों की खुसबू उसके कण कण में व्याप्त हो रही थी एवं मन में नए एहसासों का निरंतर निर्माण कर रही थी। पुष्पों की खुसबू खिड़की के रास्ते छनकर अन्दर आ रही थी जिसने स्वास्तिक के मन अज्ञात प्रसन्नता से भर दिया।वायु भी अपनी मस्त चाल में चल रहा था जो निरंतर शीतलता प्रदान कर रहा था।आकाश की ओर जब उसने नजरें दौड़ाई तो वहां बादलों का झुण्ड अपने स्थान पर स्थिर था,त्रस्त था।कुछ पलों बाद महसूस हुआ की बादलो में हलकी गति थी,परन्तु इतनी ही की एक नजर देखने पर उनके स्थिर होने का भ्रम हो।बादलों के मिश्रण से उस नील वितान पर नए नए आकृतियो का दृश्य उसे मयस्सर हो रहा था। वो कुछ खोज रहा था उन आकृतियों में। "हाँ मिल गयी। वो रही उन आकृतियों के बीच शर्माती हुई शौर्या,जैसे की वो हमेश शर्माती है।वो बगल से गुजर रहा अम्बुद मानो उसके लम्बे केशो की मानिंद है जो बादलो में उपस्थित धूम्र की कच्छप गति के साथ अपना आकार बदलती है तो ऐसा लगता है जैसे वसंत की वायु अपनी धीमी गति से सरसों के पौधों को चूमकर गुजरी हो। उसी बादल के टुकड़े के अग्रभाग और एक छोटा बादल का टुकड़ा ऐसी भंगिमा प्रस्तुत कर रहे थे मानों की ये शौर्या की चंचल आँखें है जो कभी इधर जाती है और कभी उधर परन्तु अभी शर्म के मारे झुकी हुई हैं।एक पतला सा बादल उसके होंठो के स्थान का कार्यभार संभाल रही है जिसके कारन ऐसा प्रतीत होता है की वो कुछ बोलना चाहती है परन्तु अपने होंठों को दबा रही है। वो नीचे से गुजरती छोटे छोटे बादल के टुकड़े उस चेहरे को ऐसा दृश्य प्रदान कर रहे हैं मानो शौर्या ने बादलों के मोतियो की माला पहन रखी हो।मजे की बात तो ये रही की उसके नाक के स्थान पर अभी चाँद था जो धीमे अंधकार के कारण अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। उसे देखकर स्वास्तिक एक पल के लिए खिलखिलाकर हंस पड़ा। उसके होंठो ने आज उसके मुख पर संभवतः प्रथम बार हंसी का सौर धारण किया था।उस मनोहारी,चित्तहरिणी दृश्य से वो वहीँ मानो बंध सा गया और उस स्थान को छोड़ने के ख्यालों ने मन में जरा भी अस्तित्व न पाया।कुछ देर तक वो यूँ ही नजरें उठाये देखते रहा। सहसा उसने देखा की लम्बे लम्बे बालों ने बादलों के मोतियों के माला पर आक्रमण करके उसको अपना ग्रास बना लिया है।अग्रभाग,जो की एक आंख के स्थान पर था,वो दुसरे आँख वाले बादल का साम्राज्य अपने में मिला रहा है। वो पतला सा बादल का टुकड़ा जो अब तक होंठो का कार्यभार देख रहा था,वो अब अन्य बादलों के साथ मिलकर सघन हो गया है तथा चाँद को ढँक लिया है।
स्वास्तिक ने उस चेहरे का बनना भी देखा और क्षतिग्रस्त होना भी। ये सब देखकर स्वास्तिक मन विचलित हो उठा ।वो तो यूँ ही उसे देखना चाहता था उस चेहरे को अनंतकाल के लिए...उसकी तो परमिच्छा थी की कोई उसके चेहरे को ना हटाये उसकी नजरो के आगे से!!"कोई इंसान होता तो अभी उसको खूब सुनाता,खूब फटकारता कि क्यू उसने बादलों में से उसका चेहरा हटा लिया,परन्तु उस आसमान से कैसे लडूँ जिसको देखो तो ऐसा प्रतीत होता है बस हाथ बढाओ और आसमान तुम्हारी मुट्ठी में परन्तु वो कभी आ नही सकती। उन बादलों को कैसे ललकार दू जिनको मुट्ठी में बंद करना सम्भव नही"- यह उसकी मन की व्यथा थी इस वक़्त। उन बादलों द्वारा निर्मित सौंदर्य एवं माधुर्य की प्रतिमूर्ति को देखते हुए कुछ क्षणों के लिए स्वास्तिक वास्तविक शौर्या को भूल चुका था जिसका कारण संभवतः ये रहा हो कि उस चेहरे में भी उसको वो आनन्द मिल रहा था जो शौर्या के चेहरे में मिलता था। उसने उस चेहरे में अपनी कल्पना का सर्वश्व उस चेहरे में अर्पित कर दिया था और अपनी कल्पना को उसमे रखकर अपनी शौर्या को उसी में पा लिया था।पर.....!! खैर हार मानकर वो नजदीक रखी कुर्सी पर बैठ गया और बगल में रखे पानी को पीने लगा।

 "मैं तुमसे प्रेम करता हूँ,शौर्या"-उसने इस तरह से कहा मानो शौर्या उसके सम्मुख बैठी हो जिसके कारण उसके होंठ लज्जा और भय से सिहर रहे हो।ये वही स्वर थे जो उसके मुखमंडल के चहुँओर सीमित रह गयी थी। ये वही ध्वनि थी जिसने मन के संग्राम से बाहर निकाल कर स्वस्तिक  ने गहरी शान्ति की अनुभूति की।ऐसा लगा हो जैसे मानों..बड़ी उलझनों के बाद उस भावना को पा लिया हो।।


-------------------------- *क्रमशः* ---------------------------

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