Friday, 12 August 2016

COP प्रस्तुत करते हैं

अभिशप्त योद्धा

लेखक - निशांत मौर्य

अध्याय - 3


स्थान - राजनगर का पहाड़ी क्षेत्र :

चंडिका (श्वेता) गहन छानबीन में जुटी है अपने भाई को ढूंढने के लिए........

वहां पर उसे ध्रुव की बाइक के कुछ टुकड़े मिलते हैं।
(तो इसका मतलब यहीं पर भैया की लड़ाई किसी विलेन के साथ हुई है और लड़ाई काफी भयंकर थी तभी भैया की बाइक टूट गई|)
(भैया टूटी बाइक के साथ तो कहीं जा नहीं सकता यानि बाइक पुलिसवालों ने पहले से उठा ली है और जनता में डर ना फैले इसके लिए उन्होंने ये बात पब्लिक नहीं की|)
(कहीं भैया भी....
नहीं ऐसा नहीं हो सकता
भैया हमें छोड़कर जा ही नहीं सकता सुपर कमांडो ध्रुव को मार पाना नामुमकिन है| )
चंडिका काफी परेशान दिख रही थी......
तभी चंडिका अपना बैग खोलती है और उसके मन में एक आता है ।
(यस, ये तरीका काम कर सकता है)

असम:

"बाबा ये अक्षांश कौन था"
ध्रुव और ऋचा ने एक साथ पूछा।
"बिल्कुल यही प्रश्न यक्षांशी ने धर्मपुत्र से किया था उस समय "
बाबा ने ध्रुव और ऋचा को एक रहस्यमयी मुस्कुराहट के साथ देखा।

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 " पुत्री ये हमारे पूज्य हैं।"
राजा धर्मपुत्र ने कहा।
"ये यक्षकुमार अक्षांश है, यक्षराज के पुत्र
बात लगभग 2 वर्ष पुरानी है उस समय तुम आश्रम में शिक्षा ग्रहण कर रहीं थीं। उस समय पाताल लोक में असुर राज कृपाण का शासन था।
 वह धरती से धर्म को पूरी तरह से नष्ट करना चाहता था ताकि वो देवताओं को पराजित कर सके और इसका आरंभ उन्होंने हमारे राज्य पर आक्रमण से किया।
  आपके चाचाश्री कालपुत्र जो कि हमारे सेनापति भी हैं उन्होंने असुरों से लोहा लिया और अद्भुत युद्धकला का प्रदर्शन करते हुए असुरों को मुंहतोड़ जवाब दिया।
  परंतु असुर काली शक्तियों के उपासक है उनसे पार पाना किसी साधारण मनुष्य के वश की बात नहीं है। जब असुर सीधे नहीं जीत पाते तो वो छल का सहारा लेते हैं।
कृपाण ने भी यही किया उसने मेरा रूप धरा और आपकी माताश्री महारानी रिधिमा का अपहरण कर लिया और उन्हें बंदी बना लिया। बदले में उन्होंने हमारी सेना से आत्मसमर्पण की मांग की।
  अब हमारे पास कोई और मार्ग शेष नहीं था,  हमने यक्षराज का आह्वान किया और उनसे युद्ध में सहायता करने की प्रार्थना की।
आपके चाचाश्री यक्षों से सहायता लेने के पक्ष में नहीं थें उन्हें अपनी शक्ति पर पूरा विश्वास था परंतु हमें पता था कि असुरों को हराना इतना सरल कार्य नहीं है।
यक्षराज ने हमें बताया कि वो सीधे युद्ध में हमारी सहायता नहीं कर सकते हैं परंतु वो अपने पुत्र अक्षांशको युद्ध में सहायता के लिए भेज सकते हैं।
  अक्षांश चेहरे से एक बालक प्रतीत होता था परंतु उसके चेहरे पर जो तेज़ था उसे देखकर सूर्य भी लज्जित हो जाए। कालपुत्र नहीं चाहता था कि हम एक बालक के भरोसे युद्ध करें, पर मुझे यक्षराज पर पूरा भरोसा था।
  एक बालक को युद्ध की कमान सौंपने पल कालपुत्र कुपित हो गया था परंतु वो मेरी आज्ञा की अवहेलना नहीं कर सकता था।
  हम असुरों से सीधे युद्ध नहीं कर सकते थे क्योंकि वो महारानी को नुकसान पहुंचा सकते थे इसलिए हमने योजना बनाई और अक्षांश के नेतृत्व में कुछ गिने-चुने सैनिकों के साथ पाताल लोक पर आक्रमण कर दिया।
 अक्षांश दैवीय शक्तियों से परिपूर्ण एक शूरवीर था, जिसे रोकना असंभव था। रही सही कसर कालपुत्र ने पूरी कर दी।
असुरों में त्राहि-त्राहि मच गई थी।
परिणाम स्वरूप असुरों को आत्मसमर्पण करना पड़ा और महारानी सकुशल वापस आ गई। इस विजय के पश्चात राज्य में अक्षांश की जयजयकार होने लगी।सभी के निवेदन पर अक्षांश ने यक्षनगर को अपना कार्य क्षेत्र बना लिया और कई संकटों से हमें बचाया।
  परंतु एक दिन यह ना जाने कहां विलुप्त हो गए। हमनें इन्हें बहुत ढूंढने का प्रयास किया परंतु यह कहीं भी नहीं मिले।
उस दिन के बाद से आज हम इन्हें देख रहे हैं,  लगभग 2 वर्षों के पश्चात।
" पिताजी इतना कुछ हो गया था और यह हमें आज तक ज्ञात नही था।"
"आपने यह बात हमें क्यों नहीं बताई?"
 यक्षांशी के मुख पर क्रोध से ज्यादा चिंता दिख रही थी।
" पुत्री उस समय तुम महर्षि विशेष के आश्रम में शिक्षा ग्रहण कर रहीं थीं और हम आपको विचलित नहीं करना चाहते थे ", धर्मपुत्र ने स्पष्ट किया।
"  वैद्यराज अब कैसी अवस्था है इनकी? ",
यक्षांशी ने वैद्यराज से पुछा।
"  स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है, मुझे लगता है इनका मस्तिष्क किसी गहरे आघात से गुजरा है, परंतु इनकी प्रतिरोधक क्षमता आश्चर्यजनक है। मेरे विचार सेकोई अंतद्वन्द चल रहा है इनके मस्तिष्क में।
"ये कब चेतन अवस्था में आएंगे कहा नहीं जा सकता। सम्भव है कि अगले ही पल आ जाए या एक युग बाद आयें।"

" तो आप कहना चाहते हैं कि ये शारीरिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ हैं किंतु किसी कारणवश मूर्छावस्था में हैं।",
यक्षांशी ने वैद्यराज से कहा।
वैद्यराज ने समर्थन में सिर हिलाया।
" तब तो एक उपाय हो सम्भव है, मैने महर्षि विशेष के आश्रम में चैतन्य विद्या सीखी है जिससे मैं किसी भी व्यक्ति के मस्तिष्क में लगा मानसिक अवरोध हटा सकतीं हूँ। यह कारगर होने की सम्भावना है "
यक्षांशी ने अक्षांश के सिर पर हाथ रखा, हाथ का स्पर्श होते ही अक्षांश के शरीर में थोड़ी सी गति हुई और यक्षांशी की नेत्रों में चमक आ गई।
" लगता है ये कार्य कर रहा है "
 यक्षांशी ने आंखें बंद कर ली और गहरे ध्यान में डूब गई।

  यक्षांशी और अक्षांश दोनों ने एक साथ आंखें खोली और आंखें खोलते ही अक्षांश एक झटके से उठ कर बैठ गया,
" कहाँ हूँ मैं?"
"यह कौन सा स्थान है? "
" हम आपको देखकर अत्यंत हर्षित है। आप यक्षनगर के महल में हैं कुमार। ", धर्मपुत्र ने कहा।
 यक्षनगर का नाम सुनते ही अक्षांश के दिमाग में सारे चित्र स्पष्ट होने लगे और सारी घटनाएं एक झटके में याद आ गई।
 सारी घटनाएं स्पष्ट होते ही अक्षांश ने सैनिक की तलवार खींचकर धर्मपुत्र के गले पर रख दी।
" विश्वासघाती हो तुम सब।"
"जिस राज्य को मैंने अपना सर्वत्र दिया उन्ही लोगों ने मेरी हत्या का प्रयास किया।"
"इस पूरे राज्य को परिणाम भुगतना होगा।"
इसी के साथ अक्षांश की छाती पर जोरदार प्रहार हुआ।

"विश्वासघाती तो आप हो यक्षकुमार, और मेरे रहते यदि मेरे पिता को खरोंच भी आई तो आप यहां से जीवित वापस नहीं जा सकेंगे ",
यक्षांशी ने अक्षांश को चेतावनी दे डाली थी।
 " तो अब एक कन्या हमसे युद्ध करेगी, वैसे भी हम पर प्रहार करके तुमने मेरा संदेह मिटा दिया। तुम सभी विश्वासघाती हो और अब परिणाम भुगतने को तैयार हो जाइए महाराज।"
"हमनें आपकी पत्नी को मुक्त कराया था ना, परंतु अब आप अपनी पुत्री को कभी मुक्त नहीं करा सकेंगे ",
इतना कहकर अक्षांश ने यक्षांशी का हाथ पकड़ा और आकाश में उड़ गया।
" सैनिकों पीछा करो ",
धर्मपुत्र ने सैनिकों को आदेश दिया परंतु वो भी जानते थे कि उनकी पुत्री का अपहरण हो चुका है।
महाराज अपनी पुत्री को अपनी नेत्रों के सामने ओझल होता हुआ देखते रह गये बेबस होकर ।

अध्याय - 3 समाप्त

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