Wednesday, 31 August 2016

COP प्रस्तुत करते हैं

दिल्ली के रखवाले

साल 2025,
एसीपी विनय गहरी नींद में सो रहा था,जब अलार्म बज उठा।सुबह के सात बजने का संकेत था वो।
"अरे यार,ये हर घंटे क्यों बजता रहता है।"विनय ने एक जोरदार हाथ मारा और घड़ी को नीचे गिरा दिया।
"चलो एक टेंशन ख़त्म!"मुस्कुराता हुए वो वापस रजाई में घुसने ही वाला था कि क्षिप्रा की आवाज सुनाई दी।
"हे भगवान!जाने किस आदमी से मैने शादी कर ली?सोचती थी कि शादी होने के बाद कुछ बदलाव होगा।हुआ तो जरूर, पर ये इंसान तो कुम्भकर्ण का भी गुरु निकला सोने के मामले में।"किचन से आती क्षिप्रा की आवाज अब उसे सोने नही देगी।ये जानते ही विनय उठ गया।
"अरे मेरी जान,क्यों गरम हो रही हो?"किचन में घुसते ही पीछे से पकड़ लिया विनय ने क्षिप्रा को।अचानक वो हड़बड़ाया।
"आकृति कहाँ है?"विनय बोला।
"अपने पापा पर नही गई इस मामले में।"क्षिप्रा अब भी गुस्से में थी।"स्कुल गई है।"चाय उसने विनय के हाथों में थमाई और किचन से बाहर चल दी।बाहर झांककर विनय ने देखा।क्षिप्रा नजर नही आई।उसने बची हुई चाय मग में डाली और उसे मनाने चल दिया।
क्षिप्रा सामने टेबल पर नाश्ता लगाती नजर आ गई।वो गुस्से में भुनभुनाती विनय की तरफ एक ही नजर देखकर वापस अपने काम पर लग गई।विनय टहलता हुआ टेबल के करीब पहुंचा।उसने धीरे से मग उसकी तरफ सरकाया।क्षिप्रा की नजर उसकी तरफ उठी।गुस्सा अब भी था निगाहों में।
"चाय पीने से गुस्सा कम आता है।"विनय मुस्कुराते हुए बोला।
"गुस्सा तो अब तुम्हारी हरकतों से आता है।"क्षिप्रा का स्वर रुआंसा हुआ।"कहाँ मै सोचती थी,की जब हमारी शादी हो जायेगी,तो तुम्हारे साथ घूमने स्विट्जरलैंड जाउंगी।"
विनय की आँखे फैली।"मैने ऐसा कब कहा था?"
"तुमने कहा था."स्वर में ऐसा अधिकार था क्षिप्रा के कि विनय को चुप रहना ही बेहतर लगा।"तुमने कहा था कि हनीमून पर स्विट्जरलैंड जायेंगे।"
"जो नही गया होता है, वो तो ऐसा ही बोलता है।"विनय बड़बड़ाया।
"क्या कहा तुमने?"क्षिप्रा ने उसके बड़बड़ाते होंठ देख लिये थे।
विनय चुप हुआ।
"चाय अच्छी बनी है।यही बोला मै।"स्वर में ढेर सारी मासूमियत घोली उसने।
क्षिप्रा शांत हुई।उसने चाय का मग उठाया और एक घूंट भरकर किचन की तरफ चल दी।विनय ने उसका हाथ थामा और उसे अपनी तरफ खींच लिया।
इससे पहले कि क्षिप्रा कुछ समझ पाती, उसके होंठ विनय के होंठो से टकरा गए।
क्षिप्रा अलग हुई।
"क्या हुआ?अब तो आकृति भी नही है घर पर।"विनय बोला।
"मुझे काम है।आकृति के स्कुल भी जाना है।"मुँह बनाती क्षिप्रा चल दी।
अचानक प्रोबोट का मैसेज आया उसके होलोग्राम डिवाइस पर।विनय ने अपनी कलाई उठाई और हाथ में बन्धी घडी से होलोग्राम प्रकट हुआ।
"बोलो प्रोबोट।"विनय अब गम्भीर नजर आ रहा था।
"विनय,किड्ज़ वर्ल्ड स्कुल में परमाणु की जरूरत है।एक मामूली सा चोर अचानक ही कई रहस्य मई ताकतों का प्रयोग कर रहा है और तुम्हे याद कर रहा है।"सामने से पूरी तरह साफ़ बात सुनकर विनय का माथा ठनका।
"किड्ज़ वर्ल्ड में तो आकृति भी पढ़ रही है।"विनय बड़बड़ाया।"ठीक है प्रोबोट,जिसे परमाणु चाहिए, उसे मिलेगा।"
विनय तेजी से अपनी लैब में पहुंचा।
एक साथ कई परमाणु सूट कतार में खड़े थे।जिनमे से एक था सोनिक पॉवर से लैस।
"प्रोबोट ने कहा कि एक मामूली चोर रहस्यमयी शक्तियां इस्तेमाल कर रहा है।"विनय बड़बड़ाया।"ये परमाणु कवच काम आएगा।"

किड्ज़ स्कुल
परमाणु वहाँ पहुँच चूका था।अब उसने एक नए तरह का कवच पहन रखा था।काफी कुछ बदला था पिछले कुछ सालों में।इंस्पेक्टरसे एसीपी बन चूका था विनय और परमाणु अब हाईटेक आर्मर तक आ चूका था।पर अंदर आज भी वो परमाणु कॉस्ट्यूम पहनता था।
कुछ ही दुरी से उसे हवा में उड़ता साया नजर आ गया।वो बेहद पतला सा दिखने वाला एक सख्स था।
उसके हाथों में इस वक़्त स्कुल के प्रिंसिपल का हाथ था।हवा में कई फुट ऊपर होने के कारण प्रिंसिपल की हवा वैसे ही गुल थी।
परमाणु को देखते ही उसने प्रिंसिपल को छोड़ा।"तो परमाणु,अब हम बात कर सकते हैं।"
परमाणु नीचे की तरफ लहराया,पर एक अदृश्य दिवार से टकरा गया।
"तुम कही नही जाओगे,परमाणु।"उसके हाथों में काली एनर्जी नजर आने लगी।
परमाणु ने नीचे देखा।
प्रिंसिपल के गिरते शरीर को दो मजबूत हाथों ने थाम लिया था।"तिरंगा"था वो।
परमाणु -" ओह थैंक गॉड तिरंगा आ गया।
तभी ब्रह्माण्ड रक्षक की फ्रीक्वेंसी में तिरंगा परमाणु से बात करता है
कि परमाणु उस चोर को बातों में ही लगाये रखे और तिरंगा उसे पकड़ने की कोशिश करें।
"तुम कौन हो और चाहते क्या हो?"परमाणु ने कड़क लहजे में पूछा।
"मै अज्ञात हूँ।"कहते वक़्त उसकी आंखों में अजीब सी चमक आई।काली चमक।
"और मै चाहता हूँ कि तुम अपने शरीर से इस परमाणु नाम के चोले को उतार फेंको।" हवा में ही उड़ता हुआ वो परमाणु के करीब पहुंचा।उसने परमाणु की आँखों में आँखे डाली और पूछा।"तुम ऐसा करोगे न एसीपी विनय?"
इतनी देर में तिरंगा छत पर पहुंच चूका था।तेजी से उसने ढाल लहराई और निशाना था वो चोर।
लेकिन
उस चोर ने बिना देखे ही ढाल को एक हाथ से थाम लिया ।पहले उसका सिर और फिर पूरा शरीर पीछे की तरफ मुड़ गया।
तिरंगा हकबकाया सा देखता रह गया।
"तिरंगा उर्फ़ भारत।"एक चोर के मुँह से अपना नाम सुनकर तिरंगा चौंका।
"तुमसे इस मामूली वार की उम्मीद नही थी मुझे।"उसने वापस ढाल तिरंगा की तरफ फेंक दी,जिसे तिरंगा ने आगे की तरफ गोता लगाते हुए लपक लिया।
तिरंगा के ढाल लपकते ही काली एनर्जी का वार तिरंगा पर हो गया।जिसे तेजी से तिरंगा ने ढाल पर रोका।
बावजूद इसके वार इतना ताकतवर था कि तिरंगा ढाल सहित कई गुना पीछे जा गिरा।ये वार अपनी आंखों से निकलती काली एनर्जी से किया था उस चोर ने।
तिरंगा सम्भल पाता, उसके पहले ही अगला वार कर दिया उसने।तिरंगा एक तरफ को झुका और खुद को बचा गया।
"ये परमाणु कहाँ रह गया?"बड़बड़ाया तिरंगा।
सच ही तो था,कहाँ रह गया था परमाणु?
एक अलग ही दुनिया में।जहाँ सिर्फ मौत का बोलबाला था।जड़ रह गया था आसमान में उड़ता हुआ और अलग दुनिया का विचरण कर रहा था।उसके दिमाग पर इस वक़्त छाई थी।
"शीना..?"विनय बोला।"तुम यहाँ क्या कर रही हो?"
ये एक छत थी,किसी बेहद ऊँचे अपार्टमेंट की।जिसकी मुंडेर पर शीना इस वक़्त खड़ी थी।और सामने था विनय,एसीपी विनय।
"तुमने मुझे धोखा दिया है विनय।"बेहद शुष्क आवाज में बोली वो।"तुमने मुझे बताया क्यों नहीकितुम ही परमाणु हो?"आंसू भर आये उसकी आँखों में।
"शीना मेरी बात सुनो।"विनय बेहद धीरे धीरे कदम बढ़ाता उसकी तरफ लपका।
"आगे मत बढ़ो विनय।"उसके कदम पीछे खिसके।
विनय वही रुक गया।
"अगर तुम्हे क्षिप्रा ही पसन्द थी,तो परमाणु के रूप में मेरे इतना करीब क्यों आये तुम?"सवाल का कोई जवाब नही था विनय के पास।
"मेरी बात सुनो शीना,"विनय ने उसे हाथ से रुकने का इशारा किया।"पहले नीचे उतरो,फिर हम इस बारे में बात करते हैं।"
"क्या बात करोगे तुम?"भड़की शीना।"हां?बोलो क्या बात करोगे?"
विनय सकपकाया।
"क्या मेरे लिये अपने बीवी बच्चे को छोड़ सकते हो तुम?"शीना ने अपने कदम पीछे की तरफ बढ़ा दिए।अब वो सिर्फ पंजो के बल मुंडेर पर खड़ी थी।"बोलो विनय?जवाब दो।"
विनय मजबूर था हालात के हाथों, पर उसने कभी शीना को धोखा दिया ही नही था,तो आज कैसे देता।
"नहीं शीना,मै अपने परिवार को नही छोड़ सकता।"विनय ने बेहद नम्र लहजे में कहा।
शीना मुस्काई।"फिर तो मेरी मौत के जिम्मेदार भी तुम ही हो।"कहते हुए उसने अपना वजन एड़ियों पर डाल दिया,जो पहले ही मुंडेर पर नही थी।
"शीना....."विनय जोर से चिल्लाया।
"कवच पूरी तरह चार्ज हो चूका है।"एक आवाज गूंजी।और परमाणु का ध्यान टुटा।
"तुम कर क्या रहे हो?"तिरंगा की आवाज उसके ट्रांसमीटर में सुनाई दी।
तिरंगा ने अपने न्यायदंड की बिजली का हमला किया था परमाणु के कवच पर।
न्यायदंड अब भी उसके कवच में घुसा हुआ था।परमाणु ने न्यायदण्ड बाहर निकाला।
"माफ़ करना तिरंगा।शायद काली शक्ति ने मेरे दिमाग पर काबू कर लिया था।"परमाणु का कवच वापस रिपेयर होने लगा।
वो उड़कर तिरंगा के करीब पहुंचा।
काली शक्तियों का नुमाईन्दा सामने आया।
"हाहा,परमाणु,तुम्हारी कमजोरी मै जान चूका हूँ।"हंसा बेहद खूंखार हंसी वो।
दूर से ही परमाणु की आंखों में देखा उसने।
तिरंगा भी देखने लगा परमाणु की तरफ।इससे पहले कि वो कुछ समझ पाता, परमाणु का जोरदार मुक्का उसके चेहरे पर पड़ा।
"उफ़्फ़.."कई कदम दूर जा गिरा तिरंगा।
ढाल अब परमाणु के हाथों में थी।
तिरंगा उठ पाता, उसके पहले ही परमाणु ने अपनी हथेली सीधी की और ध्वनि तरंगें तिरंगा की तरफ लपकी।
वक़्त रहते ही तिरंगा ने उसे देखा और उठने की बजाय वो छत पर रोल होता चला गया।आखिर वो किनारे पर पहुंचा।
उठते ही तिरंगा ने बिना देरी किये छत से नीचे छलांग लगा दी।
नीचे एक बालकनी थी।जिसपर तिरंगा जा खड़ा हुआ।
उसने नजरे उठाई ही थी कि परमाणु को सामने पाया।
"बड़ी जल्दी में हो!कहीं जा रहे हो?"परमाणु ने अपनी हथेली सीधी की।
ध्वनि तरंगे छूटी,पर परमाणु के हथेली उठाते ही तिरंगा ने बाए हाथ पर बंधे ब्रेसलेट को दबा दिया था।
ध्वनि तरंगें छूटते ही परमाणु के हाथ से ढाल भी छूटी और तिरंगा के हाथ में जा थमी।
तेजी से तिरंगा ने उस वार को ढाल पर रोका, पर वार ज्यादा घातक था।ढाल वार को रोक पाने में नाकाम रही और तिरंगा ढाल सहित खिड़की तोड़कर अंदर जा गिरा।कांच के कई टुकड़े उसकी पीठ में जा धंसे।
बाहर परमाणु मुस्काया।हवा की तरह वो टूटी हुई खिड़की से अंदरकमरे में दाखिल हुआ ही था,कि न्यायदण्ड के वार ने उसकी दिशा बदल दी।सीधे कमरे की दिवार से जा टकराया परमाणु।अभी वो सम्भल भी नही पाया था कि तिरंगा की ढाल बगल में दिवार पर आ गड़ी।
परमाणु पलटा और एक जोरदार मुक्का उसके कवच पर पड़ा।तीरंगा एक और मुक्का मारने ही वाला था कि परमाणु ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"तुम जीत नही पाओगे तिरंगा.!"परमाणु ने उसकी गर्दन पकड़ कर उसे ऊपर उठा दिया।
"गलतफहमी है तुम्हे..।"तिरंगा खरखराती आवाज में बोला।साथ ही अपनी गर्दन छुड़ाने के बहाने उसने अपने बायें हाथ पर बन्धे ब्रेसलेट को दबाया और ढाल दिवार से निकलकर परमाणु के सिर के पिछले भाग पर जा टकराई।परमाणु लड़खड़ाया।
तिरंगा ने ढाल थामी और चेहरे के आगे रखते हुए परमाणु से जा टकराया।
पहले ही लड़खड़ाया परमाणु इसबार भी सम्भल नही पाया।दोनों दिवार से जा टकराये।परमाणु के भारी कवच के कारण दीवार टूट गई और दोनोंनीचे गिरने लगे।
तिरंगा ने न्यायदण्ड को पूरी ताकत से कवच के अंदर घुसा दिया।
न्यायदण्ड कवच को चीरता हुआ अंदर परमाणु सूट पर जा टकराया।
"आआअ..."परमाणु की चीख गूंज उठी।
काली एनर्जी विनय को छोड़कर कवच के अंदर समाती चली गई।
"ठीक हो?"तिरंगा ने परमाणु की तरफ हाथ बढ़ाया।परमाणु ने हाथ थामा और खड़ा हो गया।
उसने कवच रिलीज किया और पुराने परमाणु सूट में नजर आने लगा।
पीछे कवच किसी रोबोट की तरह नजर आने लगा।एकाएक वो कवच उड़कर लैब की तरफ चल दिया।
"ये मर चूका है।"उस चोर के पास बेठाथा तिरंगा।परमाणु करीब पहुंचा।
"काली शक्तियों का हमला हम पर पहली बार हुआ है।"तिरंगा बोला।"और शक्ति भी यहाँ नही है।"
"अब तक नागराज और ध्रुव ही इन शक्तियों से निपटते आये हैं।"परमाणु बोला।
"तो हम किसके पास जायेगे?"तिरंगा खड़ा हुआ।
"ध्रुव जैसा तो तुम भी सोच सकते हो,लेकिन नागराज जैसा हममे से कोई नही है।"परमाणु बोला।"हम उसके पास ही जायेंगे।"

भारत घर पहुंचा।
"आ गए,दिल्ली के सबसे काबिल वकील।"शिखा की आवाज आई।
भारत पलटा।"सॉरी?"उसकेदोनों हाथ कान पर पहुंच गए।
"कान पकड़ने से क्या होगा?"शिखा बोली।
"हां,"मानसी सामने आई।
भारत और मानसी की नजरे मिली।दोनों ही एक दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिये।
"लड़के वाले आये और तुम्हारी डॉक्टर बहन को पसन्द करके चले भी गए।"मानसी के होंठो पर मुस्कान थी।
भारत ने जोर से सिर पर हाथ मारा।
"ओह्ह,क्रेप.मै भूल गया था।"भारत ने मासूम चेहरा बनाया।
दोनों उसे देखकर हंसने लगी।
"कोई बात नही भैया।"शिखा बोली।"पर आज डिनर तो बाहर करवाओगे न।"
"अरे हां,बील्कुल।"भारत बोला।
शिखा भारत से लिपट गई।
मानसी उन्हें देखती रही,फिर वहाँ से चल दी।वो उनके पास से निकली ही थी कि भारत ने मानसी की कलाई पकड़ ली।
मानसी रुकी।भारत अब भी शिखा के सर पर हाथ रखे था।
"तुम भी हमारे साथ चलो न मानसी।"भारत अलग होता बोला।अब तक उसने मानसी की कलाई छोड़ दी थी।
जवाब में मानसी मुस्कुरा दी।

आधी रात हो चुकी थी,पर विनय की आँखों से नींद गायब थी।वो हॉल में बैठा इसी विचार में खोया था कि जब काली शक्तियों ने उसपर काबू किया,तो उसे शीना ही क्यों नजर आई और इन सारी चीज़ों का मतलब क्या हो सकता है?
जवाब उसे जल्द ही मिल गया,जब आकृति की चीख उसके कमरे से सुनाई दी।
विनय तेजी से दौड़ कर दरवाजे पर पहुंचा।
दरवाजा अंदर से लॉक था।उसने दरवाजे पर कान लगाया।
"आकृति, तुम ठीक हो?"
बदले में एक धमाके की आवाज सुनाई दी।
विनय ने बिना देर किये एक जोरदार लात मारकर दरवाजा तोडा और अंदर दाखिल हुआ।
अंदर घुसते ही एक लेजर उसे अपनी तरफ आता नजर आया।विनय तेजी से नीचे झुका और लेजर ने दरवाजा उड़ा दिया।ब्लास्ट के कारण विनय पीछे से आगे की तरफ गिरा तो देखा कि हमला आकृति ने किया था और वो इस वक़्त उसके कवच में से एक का आर्म मेटल पहनी हुई थी।
इसके पहले कि वह कुछ और समझ पाता, आकृति ने हाथ उसकी तरफ घुमाया और लेजर विनय की ओर लपके।विनय ने तेजी से जगह छोड़ी।
"पापा, ये चीज़ मेरे हाथ से चिपक गई है।"आकृति चिल्लाई।"इसे निकालो पापा"
विनय ने सहमति में सिर हिलाया और कान में लगे ब्लूटूथ डिवाइस के जरिए प्रोबोट को पुकारा।
"प्रोबोट, कहाँ हो?"विनय झल्लाया।"मुझे सुन रहे हो?"
"प्रोबोट अब तुम्हे नही सुनेगा विनय।"आवाज पीछे से आई थी।विनय पलटा तो उसकी आँखे फ़टी रह गई।
पीछे उसके सारे कवच एक साथ खड़े थे और उन्हें चला रही थी"ब्लैक एनर्जी"

भारत और शिखा घर लौट आये थे।मानसी को उन्होंने घर छोड़ दिया था।
रात को हुई आवाज से भारत की नींद खुल गई।वो उठकर हॉल में आया।उसने फ्रिज से पानी निकालाऔर पीने ही वाला था कि उसके नेत्र फैले।
सामने शिखा खड़ी थी।और उसकी आंखों में चमक रही थी"ब्लैक एनर्जी"
"शिखा,क्या हुआ है तूम्हे?"भारत सावधान था।
"शिखा नही,"अज्ञात"हूँ मै।"उसकी आवाज में खरखराहट थी।"भारत,या मै तुम्हे कहूँ तिरंगा।"
भारत चौंका।उसके हाथों में आती काली एनर्जी उसने देख ली।
शिखा ने अचानक हाथ उठाये और एनर्जी का वार भारत पर किया,पर भारत ने ये पहले ही देख लिया था।इसलिए वो तुरंत नीचे झुक गया।

"चिंता मत करो विनय।"कवच एक साथ बोले।"मेरा निशाना न तुम हो,न तुम्हारा परिवार।"
"तो तुम क्या चाहते हो?"विनय जबड़े भींचकर बोला।
"सिर्फ ये कहना चाहता हूँ कि वक़्त है अपने परिवार को बचाने का,न कि दुनिया को।"
अब तक क्षिप्रा वहाँ आ चुकी थी।
"और अगर मै न कहूँ तो?"विनय शंकित था।
एक कवच ने तेजी से वार किया आकृति पर।विनय चीख़ पड़ा।
पर आकृति को कोई चोट नही आई थी।
"हो सकता है ये निशाना अगली बार न चुके।"काली एनर्जी इकट्ठी होने लगी।"तुम्हारे पास 10 मिनट हैं, वरना मेरे पास तो वक़्त ही वक़्त है।"काली एनर्जी पुरे कमरे में फैलती चली गई।
"पापा.."आकृति चिल्लाई।
विनय ने दौड़कर आकृति को गले लगा लिया।
क्षिप्रा भी आकर दोनों से लिपट गई।
थोड़ी देर बाद प्रोबोट का मैसेज आया।
विनय ने कलाई पर बंधे गैजेट से उसे रिसीव किया।
"परमाणु,किसी परवैज्ञानिक ताकत का वार हुआ था ,इसलिए मै तुम्हारे मेसेज का जवाब नही दे सका।"
"कोई बात नही प्रोबोट।"विनय ने शरीर को ढीला छोड़ा।"अब एक काम करो,सारे कवच खत्म कर दो।"
"लेकिन.."प्रोबोट ने कहना चाहा, पर विनय ने गैजेट उतारके फेंक दिया।
फिर वो उठा औरपरमाणु सूट पहन आया। सारे कवच अब तोड़ने शुरू कर दिए उसने।
एकाएक क्षिप्रा ने उसे रोका।"ये क्या कर रहे हो विनय।"उसकी आंखों में आंसू थे।"तुम्हारी सालों की मेहनत हैं ये सब।"
"जानता हूँ क्षिप्रा,पर तुम दोनों से ज्यादा बढ़कर मेरे लिये कोई नही है।"विनय की आँखे भी भीग गईं।
विनय वापस उन्हें तोड़ने में लग गया।क्षिप्रा सिर पकड़कर बैठ गई।
सारे कवच तोड़ने के बाद विनय बोला।"अज्ञात ये रहा परमाणु सूट।"
परमाणु सूट धीरे धीरे हवा में गायब हो गया।क्षिप्रा और आकृति विनय के गले जा लगे।

भारत बड़ी मुश्किल से बचता हुआ बाहर निकल पाया था।बाहर निकलते ही शिखा आसमान में उड़ने लगी।जगह जगह काली एनर्जी फैलने लगी और कार हवा में उड़कर भारत को निशाना बनाने लगी।
"शिखा,मेरी बात सुनो।"भारत चीखा।क्योंकि शिखा काफी ऊंचाई पर थी।"कोई तुम्हे कंट्रोल कर रहा है, क्योंकि तुम किसी की जान नही ले सकती।"
शिखा नीचे आई।
"हां,बिल्कुल सही कहा तुमने?"कुछ सोचने की एक्टिंग की उसने।"पर मै कर सकता हूँ।"ब्लैक एनर्जी का वार किया उसने।अचानक हुए वार से इसबार भारत नही बच पाया।
"आह्ह्ह.."भारत के शरीर में ब्लैक एनर्जी दौड़ पड़ी।
"मुझे कोई परेशानी नही तुम और तुम्हारे परिवार से।"शिखा के रूप में अज्ञात बोला।"ये भी जानता हूँकि काली शक्तियां ज्यादा देर तुम्हें काबू नही कर पायेगी।पर तुम्हारे परिवार का क्या?"
"तुम चाहते क्या हो आखिर?"बड़ी मुश्किल से बोल पाया भारत।
"तुम्हारी तिरंगा पोशाक।"अज्ञात की आँखे चमकी।"या तो अपने परिवार को बचा लो,या दिल्ली को।"
भारत के सामने ऐसी स्थिति थी,जहाँ हथियार डालने ही थे।किसी की जान नही ले सकता था वो।
आखिर उसने अपनी तिरंगा ड्रेस उसे दे दी,जिसे लेकर हवा में घुल गया अज्ञात।

अनजान जगह
"ये लो डार्ककोड।दिल्ली के रखवाले भी रास्ते से हट गए।"दोनों की ड्रेस सामने रख दी अज्ञात ने।
"हम्म,क्या इस दुनिया में कोई ऐसा भी है, जिसके मामले में आपको लगे कि वो आपको टक्कर दे सकता है।"डार्ककोड की आवाज में प्रतीक्षा थी।
"हां,डार्ककोड।और अब मै उसी से निपटने जा रहा हूँ।"दृढ़ निश्चय था उस आवाज में।
"है कौन वो?"
"वो है"नागसम्राट"नागराज।"अज्ञात बोला।

अगला भाग "नागसम्राट"

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