Friday, 24 June 2016


कहानी : रॉंग नंबर
लेखक : मानस THE SALVATOR


उसका ह्रदय ना जाने आज आसमान की किन ऊंचाईयों पर था , उसके भावों के समक्ष गगनचुंबी अट्टालिकाएं भी सूक्ष्म प्रतीत हो रही थी | आज सूरज का ताप भी उसे भावों को श्वेत बर्फ के समान पिघलाने की शक्ति खो चुका सा दिख रहा था | उसके हर्ष को परिमिति में बांधना संभव नहीं दिख रहा था | अभिषेक की व्यग्रता एवं उत्कंठा उसे जानने वालों के लिए नयी थी | विद्युत विभाग के इस कार्यालय में अचानक एक नयी ही विद्युत् का प्रवाह होने लगा था | धीर गंभीर से दिखने वाले बड़े साहब आज खुशी से ओतप्रोत थे | उनके मुख पर उपस्थित चमक देख कर उनके सहकर्मियों को यूँ प्रतीत होता था मानों वहां पर एक अन्य सूर्य उदित हो गया है | उनके सचिव महोदय कुछ समय तक विस्मय में रहे तदुपरांत उन्होंने चपरासी रामनाथ को विरक्त भाव से देखा और उसके समीप जाकर बैठ गए , बड़े साहब के सचिव को अपने पास आते देखना रामनाथ के लिए एक दुर्लभ घटना थी वो भय और हास्य के सम्मिलित भाव से उन्हें देखने लगा की वो व्यक्ति जो सदा कर्कश ध्वनि से उसे अपने पास बुलाता रहता था , जिसने हेय दृष्टि से ही उसे सदा देखा ऐसा एक प्रशासनिक अधिकारी उसके समीप आया इससे उसे सर्वथा विस्मित होना ही था | किन्तु उसका विस्मय सचिव साहब के विस्मय से अधिक ना था तो इन अनर्गल विचारो से दूर इस रहस्य का गूढ़ कारण जानना चाहते थे |
मुख में पड़ा प्राणप्रिय पान मसाला भी उन्हें हेय लगा और उसका परित्याग कर ससम्मान रामनाथ से आग्रह करते हुए प्रश्न किया “ क्या जी रामनाथ साहब ! “ रामनाथ को सहसा अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ किन्तु साहब के चेहरे पर क्रोध का लेश नहीं था आज इस कारण साहस करके बोला “ साहब आपने आवाज लगाई थी क्या ? क्षमा करें हम सुन नहीं पाये |” किन्तु सचिव साहब इन बातों से दूर थे आज , अपनी मस्ती में इन बातों को नजरंदाज कर आगे बढ़ गए और बोले “ क्या बात है जी आज बड़े साहब के जीरो वाट के मुखड़े में सोडियम लाइट किसने लगा दी | क्या राज है साहब के इस चहकते चेहरे का ? क्या जादू किया है आपने सुबह सुबह?” “अब हम क्या बताये साहब !” रामनाथ हिम्मत करके बोलने लगा “हम तो खुदही सोच रहे यही सुबह से | बस रोज की तरह जब बड़े साहब आये तो पानी रख दिए थे हम | जब चाय लेकर गए तब तक सब ठीक था , फिर कोई फ़ोन आया और तब से ही ये ख़ुशी है उनके चेहरे पर |”
उसके चेहरे पर आशा का उन्माद दिखने लगा “भगवन करे अच्छी खबर हो ! बड़े साहब की खुशी देखकर लगता है आज जन्मो बाद हसें है|” अब तक कार्यालय के सभी कर्मी रामनाथ के पास एकत्रित हो चुके थे | उसमें से ही कोई बोला “ आज पहली बार साहब के चेहरे पर दूसरा भाव देख रहे है |” “हाँ” एक महिला कर्मी बोली “ पहली बार आज उनके चेहरे को देखकर डर नहीं लग रहा नहीं तो जो कठोरता उनकी आँखों में रहती है , मेरी तो हिम्मत नहीं होती उनके पास भी जाने की |” जहाँ एक और ये चर्चा चल रही थी वही कोई और था जो इस अनवरत चलती चर्चा से दूर अपनी यादों में खोया हुआ था |

...............................................................................................................


बाग़ से घर की और भाग रहा अभिषेक अचानक ठोकर खाकर पहाड़ो से मैदान की और भागती नदी की धारा के समान तेजी से बलखाता, लुढ़कता आगे को चला और मैनेजर बाबू की दीवार से टकरा कर रुक गया ठीक उस लहर की भांति जो पत्थरो से टकरा कर दम तोड़ देती है| पैरो से रुधिर धारा बहने लगी ले, पांवो ने आगे बदने से इंकार कर दिया लेकिन ये बावला मन कहाँ रुकने वाला था इस चंचल को तो तब तक शांति ना मिलनी थी जब तक इसकी अभीप्सा परिपूर्ण ना हो जाये | और उसकी अभीप्सा थी उस नन्ही परी से मिलना जो वास्तव में नन्ही भी ना थी लेकिन गाँव के सबसे धनाढ्य परिवार की सबसे नन्ही सदस्य थी | मैनेजर बाबू यूँ तो गाँव के एकमात्र सरकारी बैंक के प्रबंधक थे लेकिन उन के ठाट किसी राजा महाराजा से कम ना थे , स्वतंत्रता के समय जहाँ सरकार ने सभी जमींदारो से उनकी जमीन लेकर उन्हें भूमिहारों को दे दिया वही इस गाँव में कुछ अलग ही हुआ राजाओ की कृपा और जागीरें सदा से इस परिवार पर रही भले ही मैनेजर बाबू का परिवार जाति व्यवस्था में शूद्र कहलाता था किन्तु उनके किसी पूर्वज के पराक्रम ने उनके परिवार को राजाओ और फिर अंग्रेजो का कृपापात्र बनाये रखा इसका एक कारण इस परिवार की राजनितिक सोच भी थी | राजनीती तो इस परिवार का वंशानुगत गुण था, जैसे मछली के बच्चे को तैरना जन्म से आता है वैसे ही मैनेजर बाबू का परिवार राजनीती में कुशल था | स्वतंत्रता के समय स्वयं को उपेक्षित वर्ग का दर्शा कर मैनेजर बाबू के पिता ने बहुत भूमि प्राप्त की थी, जो उन्हें सबसे संपन्न बनाती थी , स्वयं जागीरदार थे और अधिक भूमि मिली तो सम्पन्नता में उनसे बड़ा तो पूरे गाँव ही नहीं क्षेत्र में कोई ना बचा | बच्चो की शिक्षा दीक्षा अच्छी हुयी तो जैसे ही गाँव में बैंक खुला उसके प्रबंधक पद के लिए अपने पुत्र का चयन सुनिश्चित करने में देर ना लगायी | स्वयं गाँव के प्रधान हुए और वो पद अभी तक घर से बाहर ना जा पाया| मैनेजर बाबू भी पिता के नक्शेकदम पर ही चल रहे थे | अपने बच्चो की शिक्षा दीक्षा अच्छी से अच्छी करवाई और उन्हें सरकारी विभागों में चयनित करवा कर ही चैन की सांस ली अपनी कूटनीति और पहुच के लिए वो वैसे भी गाँव में प्रसिद्ध थे | उनका बेटा रेलवे में कार्यरत था और इस समय छुट्टियों पर घर आया हुआ था , ये नन्ही परी उसकी ही बेटी थी जो आज १५ वर्ष की हो चली थी किन्तु घर परिवार की लाडली और सबसे छोटी होने के कारण उसका घर का दुलारा नाम नन्ही परी पड गया था | परी का आज जन्म दिन था और उसको उसके जन्मदिन का उपहार देने को अभिषेक लालायित था | वर्ष में मात्र कुछ ही दिनों के लिए परी गाँव आती थी और उसमे भी अभिषेक को उससे बात करने का समय तो बहुत ही कम होता था किन्तु इन बीते दिनों की याद और आने वाले दिनों की कल्पना ही उसके आशा के वृक्ष के लिए उर्वरक का कार्य करती थी और उसके इस भाव वृक्ष को हरित रखती थी | अभिषेक किसी धनी परिवार से ना था , उसके पिता जैसे तैसे करके परिवार का गुजारा करते थे | अभिषेक अपने पिता की हालत समझता था इसलिए कभी उसने अपने पिता से किसी भी प्रकार की अनावश्यक वस्तु की मांग नहीं की वरन जैसे भी करके अपनी इच्छाओं को दबाये रखा और आवश्यकताओं को कम करके अपने परिवार के साथ सामंजस्य बना कर चलने का प्रयत्न करता रहा था | कई बार समय और परिश्थितियाँ लोगों को समय से पहले ही परिपक्व बना देती है और अभिषेक तो बचपन में ही बूढा हो चुका था| उसकी बौद्धिक क्षमता पूरे गाँव में प्रसिद्ध थी | शैक्षणिक योग्यता में उसका कोई सानी ना था किन्तु उसका ये व्यव्हार और योग्यता भी खास नहीं मानी जाती थी क्युकी वो एक ब्राम्हण पुत्र था और ब्राम्हण तो वैसे ही बुद्धिशाली माने जाते है इसमें कुछ भी खास ना था | गाँव के बस अड्डे पर चाय की दुकान लगाने वाला उसका पिता भी पुत्र की योग्यता को भलीभांति जानता था किन्तु अपनी बदहाली के हाथों विवश था | तंगहाली किसी को नहीं भाती , लेकिन इस परिवेश में जीवनयापन करना व्यक्ति की परिश्थितियों को दर्शाता है |ऐसे में अभिषेक के समक्ष बहुत ही कठिनाई थी किन्तु उसे कुछ ऐसा करना था जिससे वो अपनी परिश्थितियों से इतर परी के समक्ष स्वयं के उपहार को मूल्यवान नहीं तो अलग तो लगवाना ही चाहता था ताकि परी उसको नजरंदाज ना करे | वैसे भी वो परी से पूरे २ वर्ष के बाद मिल रहा था पिछले वर्ष मैनेजर बाबू के विशाल बंगले को दिन में अपनी नजरो से छेदते हुए अभिषेक ने पूरी गर्मी वहीँ व्यतीत कर दी, इस दीरघ दाघ निदाघ से उसके शरीर को विछिन्न करने में कोई कमी ना छोड़ी किन्तु परी ना आई, बाद में कही से से येबात उसके कानो तक आई की परी किसी हिल स्टेशन पर गयी थी परिवार के साथ | अभिषेक का उसके साथ होना बहुत दुर्लभ बात ही थी किन्तु अभिषेक उसके प्रति अपने आकर्षण को त्याग नहीं पता था | सदा वह पपीहे की भांति स्वाति नक्षत्र की उस वर्षा बूँद रुपी परी का इंतजार करता रहता था , पता नहीं उसमे ऐसा क्या था जिससे अभिषेक भी खिंचा चला आता था उसकी ओर | इस बात से उसे खिन्नता भी थी और अनुराग भी किन्तु वो अपनी भावनाओ. को किसी से साझा नहीं कर पता था क्योंकी वो जानता था, की उसकी इस भाव गंगा में सिर्फ एक ही व्यक्ति डुबकी लगा सकता है , वो है उसकी “परिया” | परिया उसे इस नाम से पुकार कर उसे ना जाने किस परिहास और तृष्णा की पूर्ति की अनुभूति होती थी | आज उसे परी के उठने से पूर्व ही उसके जन्मदिवस का उपहार उस तक पहुचाना था क्योकि मात्र वही समय होता था उस दिन जब परी बंगले से बाहर आती थी , और वो उस से मिल पाता था| उन्मुक्तता से भरा हुआ अभिषेक आज सवेरे ही उस घनघोर जंगल को चला गया था उस भयानक वन में जहाँ कदम कदम पर मृत्यु का वास था , काल स्वयं लाठी लेकर वहां से गुजरने वालो का मार्ग रोकता है ऐसी किवंदतियो वाले वन में जाने का साहस तो अभिषेक में भी ना था किन्तु परी के उपहार के लिए वो ये सब भूल गया और ४ घंटे की निरंतर यात्रा के बाद उसे वो पुष्प मिला जिसके लिए वो इस खूंखार निविड़ रूपी वन में आया था घटाटोप अंधकार अब छटने लगा था और पुष्प की मनोहारिता उसे मुग्ध कर चुकी थी , किन्तु वो अपने संकल्पित विचारो में विचलित नहीं हुआ | समय कम था किन्तु तीव्र गति से चलता हुआ वो गाँव की और बढ़ा था किन्तु लक्ष्य के इतने निकट पहुच कर इस बाधा ने उसे विवश करने का एक अक्षम प्रयास किया था | किन्तु वो बाधाएं अभिषेक का मार्ग ना अवरुद्ध कर सकी और वो लड़खड़ाते हुए उस महल के समान बंगले के द्वार के समीप पंहुचा जहाँ बनी छोटी सी वाटिका में एक सुन्दर सी नवयुवती जो अपने यौवन के उफान पर थी कड़ी आतुर दृष्टि से द्वार निहार रही थी | उसके जीवन के भवन में सोलहवां बसंत आज द्वार पर दस्तक देने वाला था किन्तु उस का मुख विकल होकर उस बंगले के द्वार का दृश्य ही देखना चाह रहा था| उसकी विकलता से भरे पैरो की उंगलिया मानों धरा को कुरेद कुरेद कर खोखला कर देना चाहती थी | सहसा द्वार पर अभिषेक दिखाई पड़ा और उसका मुख कमल उसके मन की मलिन पड गई आशाओं के सहित पुनः जीवंत हो उठा किन्तु उसकी इस क्षणिक खुशी के लिए दिया गया मूल्य भी उसके आँखों के सामने परिलक्षित हो रहा था , अभिषेक बुरी तरह से घायल और थका हुआ था 7 घंटे की पैदल यात्रा करके उसके शरीर का पोर पोर चीख रहा था और उसके पैरो से बहता हुआ रुधिर भी थक कर थमना सा चाहता था | द्वार पर खड़ा हुआ वो तरुण युवक जो उसका हमउम्र ही था ज्ञान और परिपक्वता में उससे कहीं आगे था | रात का पैबंद लगा हुआ पजामा जो उसने पहन रखा था वो जगह जगह से फट गया था और उस में लगे हुयी पेड़ों की पत्तियां और कांटे इस प्रकार प्रतीत हो रहे थे जैसे घनों से आक्छादित गगन में कही कही तारे झिलमिला रहे हो | उसका ह्रदय यह दृश्य देखकर करुणा से परिपूर्ण हो गया, और आह उठी जो उसकी तृष्णा की पूर्ति का इशारा कर रही थी | तृष्णा से अनुराग निर्मित होता है और अनुराग से मोह , और मोहित मन की तृषा शांत करना सरल कार्य नहीं होता | “प..प..प..परिया...” अभिषेक ने कंपकपाते हुए कहा और उसके समक्ष जमीन पर बैठ गया | उसके हाथ अनायास ही ऊपर उठ गए और उसमे वो विलक्षण पुष्प चमकने लगा जिसके लिए उसने इतना श्रम किया था | “ बाबा कहते थे की ये फूल बहुतै खास है , इस को जो सुबह सुबह देखता है अपने पास रखता है वो हमेशा खुस रहता है | हम इसीलिए इसको लाये है और अभी इसको किसी ने सूंघा भी नहीं है|” अभिषेक की बातों की मासूमियत परी के ह्रदय को उद्वेलित कर रही थी | कैसे कोई इन परिश्थितियो में भी इतना धीर और प्रसन्न रह सकता है , ये उसके लिए आचरज का विषय था | किन्तु शब्दों की भी एक निश्चित सीमा होती है , और भावों को व्यक्त करने में ये सदा कम पड जाते है | आज उस पुष्प की सुगंध उसके ह्रदय को स्पर्श कर गयी और लरजते हुए होंठो से उसने अपने जन्मदिवस के इस अमूल्य उपहार का धन्यवाद् प्रेषित करने की एक निष्फल कोशिश की | किन्तु तभी उसकी दृष्टि अभिषेक की आँख की और गयी जिसके ऊपर घाव का एक गहरा निशान था जहाँ रक्त भी थम गया था उसके साहस से भयभीत होकर | ह्रदय से उमड़ कर आये आशुओं को आँख में ही रोक कर उसने अपने उस मूल्यवान परिधान के कोने से उस का जमा हुआ रक्त साफ़ किया जो उसे उसके बाबा ने उसके जन्मदिवस पर भेंट किया था | “आह!” उसकी इस क्रिया से अभिषेक के मुख से एक कराह प्रस्फुटित हो उठी जो उसने बहुत समय से अपने दांतों के मध्य दबा रखी थी | परी उसका यह दर्द देख ना सकी और स्वतः ही उसके होंठ गोल होकर उसके घाव पर वायु प्रवाह कर उठे , अभिषेक के जख्मो पर मरहम की भांति आने वाली इस वायु के प्रवाह से आनंदित ही हुआ था की उन होंठो का स्पर्श उसके माथे पर हुआ जो उससके शरीर के लिए विद्युत के झटके के सम था | परी के होंठो का यह स्पर्श उसके मष्तिष्क को शून्य कर चुका था , समय मानों रुक सा गया था , उसके सारे विषादों से दूर वो इस समय किसी आनंदलोक में रमण कर रहा था | दो क्षणों के बाद ही परी ने अपने मन को संभाला और अपने होठों को अभिषेक के मस्तक से अलग किया | जैसे वर्षो की पिपासा पूर्ण होने के बाद की शांति हो अभिषेक अभी तक विश्रांति की उस अवस्था में अभी तक चेतनाशून्य बैठा हुआ था | ये २ क्षण ही अभिषेक के लिए वर्षो के सम बीते थे , होंठो से संपर्क टूटते ही चेतना का आगमन हुआ और शरीर में हुए विद्युत् प्रवाह के कारण सहसा सिहिर कर वो वो पीछे खिसक गया | इस अप्रतिम अनुभव को दोनों ही शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते थे और अपने उपहार का प्रतिउत्तर प्राप्त कर चुका अभिषेक ये जानता था की उसका परिश्रम व्यर्थ नहीं गया | अभिषेक की ओर मुख करने का साहस ना जुटा पाई परी अपना उपहार लेकर उस स्थान से उठ कर अपने झूले की और बढ़ गयी और इससे पहले की अभिषेक कुछ कह पाता सहसा वहां पर मैनेजर बाबू का माली दृष्टिगत हुआ और आते ही पूछा “ का हो बबुआ ! हियाँ का करत हौ ? बाबू देखिहैं तो गुस्सा करिहैं फूल ना टूरेयों अब |” अभिषेक वहां से चल तो पड़ा किन्तु अपना मानस वो उसी गुलमोहर के पेड़ की छाया में छोड़ आया था |
...............................................................................................................


आम की बाग से अंतिम बचे आमो को लेकर अभिषेक मैनेजर बाबू के बगीचे की दीवार फांद अमलतास की छाँव में बैठी परी के पीछे पंहुचा और बोला “परिया ......” “श्श श ....” परी चिहुंक उठी “बाबा ने सुन लिया तो अभी बाहर ही नज़र आओगे” विनोद की रेखाएं उसके कमल मुख पर किसी उर्वर समतल में बहती नदी की धाराओं के सम सुशोभित हो रही थी “क्यों पण्डित के छोकरे कौन सा फूल तोड़ने आता है रोज़ यहाँ” परिहास की ये बातें मुख से निकलते निकलते उसके सुर्ख कपोलों के मध्य मोती जैसे दांत चमकने लगे जैसे रक्तिम मेघो के मध्य विद्युत चमकती है | “फूल के लिए तो आता हूँ यहाँ तू ही तो है वो फूल “ अभिषेक का यह वाक्य उसको लजाने के लिए बहुत था , उस क्षण उसे लगा की काश ये वक़्त यही थम जाये लेकिन अभिषेक उसकी भावनाओ से दूर अपनी बात पूर्ण करने में प्रयासरत था “हाँ वो बात अलग है की तुम हिंदी वाला फूल नहीं अंग्रेजी वाला फूल हो” “रुक जा जरा !” अपनी गोद में पड़ी पुस्तक उठा कर उसके पीछे भागती परी बोली “टांगे तोड़ दूंगी तुम्हारी , अंग्रेजी वाला फूल !” कृत्रिम क्रोध से भरी वाणी से बोलती परी उसके पीछे भागी और एक पेड़ की निकली हुयी जड़ से टकरा कर अपना संतुलन खो चुकी थी , विनोद की इस घडी को परिवर्तित होने में समय नहीं लगना था किन्तु अभिषेक जैसे समय की इस धारा से जुडा हुआ था क्योकी अपने मध्य के अन्तराल को क्षणों में दूर करके हवा में लगभग उडती हुयी परी को एक तितली की भांति कोमलता से सँभालते हुए पकड़ लिया | परी हतप्रभ और प्रसन्न तो थी , किन्तु इस घटना से एक शंका उसके मन में घर कर गयी थी | कल ये सारी खुशी जो उसे निरंतर निर्झर से गिरते जल की भांति प्राप्त हो रही थी, उसका समापन हो जाना था | अनंत गहरे में डूबा हुआ मन अचानक ही विकल हो उठा जिससे मुख पर उभरे भावों को पढ़ते हुए अभिषेक को लगा की उसके पैर चोटिल हो उठे है अतः वो उसे पेड़ के निचे बिठा कर उसके पैर का वो पंजा सहलाने लगा जो पेड़ की उस उठी हुयी जड़ से टकरा गया था | ये अनुभूति भी दोनों के लिए ही विलक्षण थी और इसका प्रसार मन से मन में हो रहा था , दोनों आँखों से बाते करते करते उनमे ही डूब गए थे | सहसा एक काक ध्वनि उनकी तन्द्रा को भंग कर गयी “कल मै वापस जा रही हूँ” वाणी में दुःख का पुट था जब अपना पैर अभिषेक के हाथों से खींचती हुयी परी बोली | अचानक मन अनमयस्क हो उठा उसका परी की ये बात सुनते ही , किन्तु अब कुछ आशा भी थी | “मै ही कहाँ बैठा रहने वाला हूँ यहाँ , स्कूल ख़तम हो गए है अब शहर में बड़े कालेज में दाखिला ले लिया है हमने” अभिषेक अपने दुःख को छुपाते हुए बोला | “कौन से शहर में ?” विस्मय और प्रसन्नता की मिली जुली भावना से परी ने पूछा | “प्रयाग के कॉलेज में प्रवेश मिला है , प्रवेश परीक्षा में सर्वाधिक अंक मिले थे |” अभिषेक के इस उत्तर से हर्ष की एक लहर जो उसके ह्रदय को छू गयी थी हवा में विलीन हो गयी | “अच्छा ! “ अन्तराल के बाद फिर उसने बोलना शुरू किया “ तुम्हारे बिना कुछ अच्छा नहीं लगता यार मन नहीं लगता मेरा किसी काम में” विकलता उसके मुख पर परिलक्षित हो रही थी | “हम्म ! लेकिन व्यस्त रहेंगे हम वहां , हो सकता है अब छुट्टियों में मिलना न हो पाए “ अभिषेक भी विकल था , उसका ह्रदय वेदना से पूर्ण था | “लेकिन वादा करो मुझे नहीं भूलोगे , कभी नहीं ,कभी भी नहीं |” करुणा और व्यथा का मिला जुला सा सार आज निशब्द गीत गा रहा था और संयोग की अवस्था में वियोग की ये मधुयामिनी बेला अत्यंत गंभीर हो चली थी , निशा का ये पहर स्वयं में सिसक सा रहा था | “ओ बालिके ! हम नहीं भूलेंगे कभी , बस तुम याद रखना हमें| ” परी का चिंतातुर मन विकल था “अभिषेक तुम जानते हो हमारा मिलना हमारे परिवार वालो को बिलकुल रास नहीं आएगा | हमारे बीच समाज ने जो पैसे और जाति की दीवार खड़ी कर दी है उसे तुम्हे ही मिटाना है |” “तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो परिया ...” अभिषेक की व्यथित आवाज आई “ये साडी खाइयाँ जो समाज ने हमारे बीच बनाई है उसे मै पाट दूँगा” उसका गला रूंध चुका था “मै बहुत मेहनत करूँगा , इस काम के लिए | हम फिर मिलेंगे कही न कही जब ये खाइयाँ मिट जाएँगी बस मेरा इंतजार करना |”

.............................................................................................


यादे किसी की सगी नहीं होती और रह रह कर टीस उठती रहती है ह्रदय में | मोतीलाल नेहरु तकनीकी विश्वविद्यालय प्रयाग की उन परागित कक्षाओं से परागण एकत्रित कर अभिषेक एक कुशल अभियंता के रूप में निकला और प्रयाग की उन गलियों से प्रदेश की राजधानी तक पहुचने में बहुत मेहनत की , उसका श्रम व्यर्थ नहीं गया एक वर्ष के अन्दर ही देश की सर्वश्रेस्ठ अभियन्त्रिक परीक्षा IES को उत्तीर्ण कर विद्युत विभाग में अभियंता का पद प्राप्त किया और उसके विगत ५ वर्षों के कार्यकाल में उसकी योग्यता , क्षमता और कौशल का परिणाम भी अत्यंत ही सुखद हुआ | अपने ज्ञान एवं कुशलता के कारण दो बार पदोन्नति पा कर वो एक मुख्य अभियंता बन चुका था | इन पांच वर्षो में वो एक बार भी अपनी परिया को नहीं भूला | वो उसकी पूजा थी उसकी आस्था थी, उसका विश्वास थी, उसकी प्रेरणा थी | उसकी यादें ही अभिषेक को उसका लक्ष्य प्राप्त करने को प्रेरित करती थी वरना जिन विषम परिश्थितियों से वो निकल कर आया था, उनमे अच्छे अच्छे लोग हार मान लेते है | सामान्य वर्ग का होने के कारण उसकी निर्वहन की परिश्थितियाँ बहुत ही जटिल थी , ज्ञान आधारित वृत्ति तो उसे मिल जाती थी किन्तु आरक्षण के कारण जातिगत आधार पर मिलने वाली वृत्ति से वो वंचित रह जाता | इधर उधर काम करके , बच्चो को पढ़ा कर और ऐसे ही न जाने कितने यत्न करके उसने अपनी इस इच्छा को जीवित रखा वह बहुत ही सराहनीय और ह्रदय विदारक प्रयास थे | पिता की असामायिक मृत्यु के बाद तो परिवार के पोषण का दायित्व भी उसके कन्धो पर आ पड़ा और उसकी आशाओं की मेरुरज्जु को तोड़ने का भीषण प्रयत्न किया किन्तु ये कठिनाइयाँ भी उसकी जिजीविषा के समक्ष पराजित हो गयी और अपने श्रम से उसने इस लक्ष्य को प्राप्त किया जो प्रथमदृष्टया तो कठिन नहीं प्रतीत होता था किन्तु उसको प्राप्त करने का जो दुष्कर मार्ग अभिषेक को मिला वो उसे सराहनीय बनता था | गाँव की जमीन उसकी शिक्षा के लिए उसके पिता ने पहले ही मैनेजर बाबू के पास गिरवी रखा हुआ था , जो उनकी मृत्यु के साथ ही नीलाम कर उन्होंने वो सहृदयता ही दिखाई थी जिसका अभिषेक को पूर्ण आशा थी | गाँव में उसका कुछ न बचा था बस उसकी माँ ही शेष थी जिन्हें वो अपने साथ प्रयाग ले आया | अब गाँव से जुडी उसकी एक ही याद थी उसकी आशा उसका प्रेरणाश्रोत उसकी परिया | उसके पास अपने लक्ष्य तक पहुचने से पूर्व समय का अत्यंत अभाव था और लक्ष्य तक पहुच कर वो अत्यंत ही थक गया था | किन्तु उसने लक्ष्य पर पहुच कर तुरंत ही गाँव का एक दौरा किया अब उसके पास गाड़ियां थी बंगला था उसका भी रसूख था , वो उच्च कुल का था | गाँव को वास्तविकता में घूमे हुए अरसा हो गया था , उसे अच्छे से याद था छः वर्ष पूर्व का वो समय जब उसने यही किसी के कोई वादा किया था और उसी वादे की कसक उसे यहाँ खींच लायी थी | मैनेजर बाबू से पिता की अर्थी पर हुयी कडवाहट के कारण अब वह उस दरवाजे की और कदम भी न बढ़ाना चाहता था जो दशकों से गाँव के सरपंच का घर था , किन्तु वही तो वो स्थान था जहाँ उसकी परिया रहती थी | गाँव में आकर उसने परी के विषय में पता करने का प्रयत्न किया तो उसे यह पता चला की वो अपने माता पिता के साथ विदेश में रहने लगी है उसके पिता ने वही व्यापर प्रारंभ कर दिया और अब वो वापस गाँव नहीं आने वाले | गाँव वालों के लिए विदेश विदेश ही था अब वो थाईलैंड है या रूस उन्हें क्या पता | अभिषेक निराश हो गया , परी से न मिल पाने के कारण नहीं वरन अपनी सफलता का उद्देश्य न पूर्ण कर पाने के कारण | वो सफलता भी निरर्थक ही कहलाती है , जो अपने उद्देश्य को सिद्ध न कर पाए | बहुत ही हताशा के साथ वो वापस तो आया किन्तु उसकी निराशा कभी इस कारण से न हुयी की वो परी से न मिल पायेगा | वो तो उसकी आशा का श्रोत थी , उसे वो कैसे बुझा सकता था | उसने जगह जगह प्रयत्न किये ताकि उसे पारी के विषय में कोई सूचना मिल जाये लेकिन अभी तक उसे कोई सूचना प्राप्त न हुयी थी | मैनेजर बाबू की पत्नी की मृत्यु की सूचना मिली तो वो अपनी नाराजगी भुला कर गया , देर से आने का क्षोभ जताया तो मैनेजर बाबू लिपट कर बिलख पड़े एकमात्र बेटा था उनका जिसने अपना कोई भी संपर्क सूत्र न दिया विदेश में बसकर इतनी मुश्किल से माँ की मृत्यु की सूचना दी किन्तु वो प्रस्तर ह्रदय माँ के अंतिम दर्शनों को भी न आया | “ये मेरे ही कुकर्मो का फल है “ मैनेजर बाबु के चेहरे पर आंशुओ की धर बह रही थी “ तुम्हारे पिता की चिता को आग लगने से पहले ही मेरा पैसा चाहिए था न मुझे “ वातावरण में गंभीरता प्रगाढ़ हो गयी थी “अब रह गया केवल पैसा एकमात्र बेटा था वो भी गया अपनी माँ को आग देने भी न आया | अब मुझे भी क्या कन्धा देगा ?” अभिषेक जानता था की वो शर्मिंदा है अतः अपनी कुंठा और क्रोध को उनके आंसुओ के साथ बहा दिया उसने | परी के आने की आशा क्षीण तो हुयी किन्तु समाप्त नहीं और उसने प्रयास जारी रखे, क्योकि उसे मिलना था उससे आखिर उसने वादा जो किया था |

................................................................................................................



अभिषेक एक गुमसुम और कर्त्तव्य परायण अधिकारी माना जाता था | शांत और शालीन जैसा की उच्च अधिकारी कहते थे, गंभीर और दूरदर्शी जैसा सहकर्मी कहते थे , अनुशासनप्रिय और निर्भीक जैसा अधीनस्थ जानते थे | उसके इन सभी गुणों के साथ उसे एक कठोर अधिकारी के रूप में भी जाना जाता था , कोई भी उसे एक व्यक्ति के तौर पर नहीं जानता था | वो तो बस एक अधिकारी था सभी की नजरो में , वो एक सामान्य इन्सान भी होगा ऐसी तो किसी ने कल्पना भी न की थी अब तक , सिवाय एक के | मोहन तिवारी उस कार्यालय के प्रमुख लिपिक थे, सीधे एवं सादे व्यक्तित्व के धनी | जब इस पद पर उनका आगमन हुआ तो पता चला की अत्यंत क्रोधी अधिकारी के अधीन कार्य करने आये है किन्तु बड़े साहब के व्यव्हार में उन्हें एक सप्ताह ऐसा कुछ न मिला | अत्यंत ही विस्मित हुए कार्यालय के लोगो की सोच पर ‘ और एक दिन भोजनावकाश के समय साहब से आग्रह कर ही बैठे “ साहब भोजन करे समय हो गया है “ साहब के चपरासी रामनाथ से पहले ही पता लगा लिया था की साहब मात्र अपने माँ के हाथो का बना हुआ भोजन ही करते है | साहब थोडा विस्मित हुए और प्रत्युत्तर में बोले “ जी आप करे मै शाम को घर जाकर ही करूंगा |” मोहन जी कुछ आगे बढे और बोले “ आप न लाये हो तो हमारे साथ कर ले |” अभिषेक अचरज में पड़ गया , आज से पूर्व किसी ने उससे ऐसा न पूछा था | “हाँ वो माँ का स्वास्थ्य नहीं सही था इसलिए........” “कोई बात नहीं साहब आज मेरी माँ ने भोजन प्रचुर मात्र में दिया है , यदि आपको अनुचित न लगे तो........” मोहन ने अपनी बात जानबूझ कर अधूरी छोड़ दी |
अभिषेक के लिए ये बाते नयी थी , वो सकपका गया “नहीं मोहन बाबू कोई आपत्ति नहीं है , जैसे मेरी माँ वैसे माँ |” वो दिन और आज का दिन दोनों के मध्य में मित्रता का एक अमूल्य सम्बन्ध बन गया | मोहन बाबू ने जो पहल की वो उसे एक उस चिन्तक, विद्वान और भावनात्मक मनुष्य तक ले गयी जो अब तक दुनिया से छुपा हुआ था | अभिषेक के दुःख और चिंता से युक्त भाव उस तक पहुचे तो उसने भी उसकी सहायता का आश्वासन दिया | मोहन के कुछ प्रयासों से उसे पता चला की परी के माता पिता की मृत्यु हो गयी , और भाई जैसे इस मित्र के प्रयास इस सूचना को उस तक लाये की बाबा की लाडली परी अब गाँव वापस आ गयी है और अपने बाबा के स्थान पर गाँव की प्रधान बन गयी है |

आज मोहन की इस सूचना से वर्षो से सूखा अभिषेक के ह्रदय का भावना वृक्ष पुनः लहलहा उठा था | उसका चेहरा आज उस आभा से चमक रहा था जो की सालो से उसके अन्दर बाहर आने को तड़प रही थी | उसकी इस हर्षित अवस्था का रहस्य जानने वाला आज कार्यालय में नहीं था और अभिषेक बस उसकी एक कॉल का इंतजार कर रहा था | सभी को रहस्यभिभूत कर देने वाली ये घटना बहुत बड़ी नहीं थी , किन्तु इसका मूल्य कोई उनके बड़े साहब अभिषेक से पूछता | यहाँ तक की उनके सचिव महोदय भी रहस्य के कारण की जानकारी को सब कुछ अर्पण करने को आतुर थे | किन्तु इन सबसे विलग अभिषेक एक अलग ही आनन्द लोक में था | तभी उसका फ़ोन बजा, बिना समय गवाए उसने फ़ोन उठाया “मोहन! “ अनायास ही उसके मुख से निकले ये शब्द उसकी आशा को प्रदर्शित करते थे | उधर से मोहन की आवाज ही सुनकर उसकी उत्तेजना बढ़ गयी | मोहन भी उसपर ध्यान न देकर अनवरत कुछ बोलता जा रहा था , उसकी वाणी में उत्साह प्रत्यक्ष था |
अब अभिषेक के पाँव जमीन पर न थे “भाई तू जल्दी से आ जा , शीघ्रातिशीघ्र”| मोहन ज्योंही कार्यालय पंहुचा उसका चेहरा देख कर सभी को पता चल चुका था की वो भी उस रहस्य गाथा में सम्मिलित है जिसे जानने को सभी व्याकुल है | आज किसी का मन कार्य में नहीं लग रहा था | मोहन के बड़े साहब के कक्ष में जाते ही सभी उसके द्वार पर एकत्रित हो गए | मोहन के जाते ही आतुर अभिषेक ने पूछा “मिला ?” मोहन की शांति उसे अशांत कर रही थी “बता न भाई , क्यों परेशां कर रहा है?” मोहन के मुख पर विजयी मुस्कान थी | उसने सहमति में सर हिलाया और अभिषेक हर्ष से उछल पड़ा उसने मोहन के हाथों से वो चिट खींची जो उसे उत्साह से भर चुकी थी | वो तुरंत ही फ़ोन की और भागा , मोहन उसकी परी का फ़ोन नंबर लाया था , उसकी परी का | जिससे बात करने को वो पिछले दस वर्षों से आतुर था , व्यथित था | कैसी होगी वो , क्या बाते करेगी ? कैसी आवाज हो गयी होगी उसकी | कैसी दिखती होगी ? इन्ही भावनाओ में डूबा हुआ अभिषेक लगातार अलग अलग प्रश्नों से घिर रहा था | आखिर उसने कर दिखाया , वो अपना वादा नहीं भूला वो उसे नहीं भूला अपनी परी को नहीं भूला |
इन्ही विचारो की नदी में गोते लगाते हुए उत्साह से परिपूर्ण अभिषेक ने उस नंबर पर फ़ोन लगा दिया था | फ़ोन की घंटी के साथ साथ उसका दिल भी धड़क रहा था , उसकी धड़कने उसे फ़ोन से भी तेज सुने दे रही थी मनो कोई रेलगाड़ी का इंजन पूरी गति से दौड़ा जा रहा हो | “हेल्लो” अचानक फ़ोन उठा और उधर से एक चिरपरिचित आवाज सुनाई दी , अभिषेक को लगा मानों उसका ह्रदय आज उसका साथ छोड़ देगा इस आवाज को सुनने को उसने क्या न किया , पूरे दस वर्षो के बाद भी ये आवाज उसके कानो को आज भी प्रिय थी आज भी इस आवाज को वो पहचान पा रहा था | “हेल्लो “ उधर से पुनः आवाज आई | अभिषेक का गला रूंध चुका था , उसके होंठ लरजने लगे थे , कंपकपाते होठों से बमुश्किल ध्वनि निकली “प.. प्.. परिया......” दूसरी ओर दो क्षणों को सन्नाटा छा गया था और फिर उसी चिरपरिचित आवाज ने कहा “रोंग नंबर”
अभिषेक का रूदन उस कक्ष को थर्रा रहा था , मोहन का कन्धा उसके आंशुओ से भीग चुका था, अभिषेक का फ़ोन भूमि पर बिखरा हुआ था और चेतना कही दूर विक्षत पड़ी थी|


समाप्त

Post a Comment: