Friday, 24 June 2016


मै अपने नगर के एक व्यस्ततम चौराहे से गुजर रहा था तो मैंने देखा की चौराहे पर बहुत भीड़ जमा है, इस भीड़ में शहरी वेशभूषा के अलावा ग्रामीण वेशभूषा वाले लोग भी मौजूद थे तथा ये लोग किसी पुतले को घेरे हुए खड़े थे, मैंने अंदाजा लगा लिया की ये लोग आज इस पुतले का रामनाम सत्य करने वाले है या राजनीतक भाषा में कहे की पुतला दहन करने वाले है। रामनाम सत्य से मुझे मेरे बचपन के दिन याद आ जाते है। जब मै छोटा था तो मेरे दादा जी मुझे हर दशहरे पर "पुतला दहन" दिखाने के लिए ले जाते थे, एक दिन मैंने दादाजी से उत्सुकतावश भोलेपन में पूछ ही लिया की दादा जी ये हर दशहरे पर "पुतला दहन" क्यों किया जाता है..? तो दादा जी ने कहा की - बेटा ये पुतला दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, भगवान राम ने रावण को मार कर बुराई का अंत किया था उसी के उपलक्ष में यह सब किया जाता है परंतु यह बड़े दुःख का विषय है की आज पुतला दहन के बाद भी बुराई का अंत नहीं होता है।
मै उस भीड़ के कुछ नजदीक गया और एक ग्रामीण वेशभूषा वाले वृद्ध से पूछा - क्यों दादा ये क्या कार्यक्रम हो रहा है..? तो वह वृद्ध मेरी और प्रश्नवाचक निगाहो से देखकर बोला - अरे भईया ने तो करो..! 2 घंटा की कहकर लाये थे 4 घंटा हो गए और 100 को नोट भी नई दव..! मैंने दादा से पूछा - 100 को नोट मतलब..? तो दादा बोला - अरे भैया का बताएं, हम तो हार (खेत) से आकर खिरहन (गेहू रखने की जगह) में बैठे थे तभई रज्जू को मोड़ा (बेटा) आकर बोला दद्दू चलो हमारे साथ 100 को नोट देहे साथ में चाय और नाश्ता भी देहे, करने जो है की हम जो नारे लगाये वो तुम भी बोलत जइयो, 2 घंटे को तो कुल काम आय.. बस फिर का हम चले आय। मैंने सोचा किसी शहरी व्यक्ति से बात की जाय तो ज्यादा बेहतर होगा। भीड़ के समीप जाकर मैंने एक पेंट शर्ट धारण किये हुवे व्यक्ति से प्रश्न किया की ये किसका "पुतला दहन" हो रहा है..? तो वह व्यक्ति बोला - भाई साहब पिछले दिनों संसद में सांसदों की खरीद फरोख्त के लिए जिस नेता ने सांसदों को रुपये दिए थे उसी नेता का "पुतला दहन" हो रहा है।
मेरी नजर भीड़ को चीरती हुई सीधे उस नेता के पुतले के पास पहुँची.... अरे ये क्या...? ये पुतला तो हूँ - ब - हूँ उसी नेता के जैसा लग रहा था, इसका कारण यह था की उस पुतले को उसी नेता जी के जैसे ही कुर्ता, पजामा, बंडी, चश्मा व चप्पल पहनाई गई थी, उस पुतले में कमी थी तो बस उस नेता की आत्मा की। यदि उस नेता जी की उस पुतले में आत्मा आ जाती तो वहां "पुतला दहन" के स्थान पर आम सभा शुरू हो जाती, वैसे यदि इस बात पर विचार किया जाएं की "पुतला दहन" को अगर विधि विधान के साथ करवाया जाय तो शायद यह सार्थक भी हो जाये। विधि विधान से मेरा तात्पर्य यह है की "पुतला दहन" के पूर्व नगर के 4- 5 अति प्रकांड विद्वान् पंडितो को बुलवाया जाय और वे पंडित जी पूजा - अर्चना व मन्त्र उच्चारण करके उस नेता की आत्मा के कुछ अंशो को बुलाकर उस पुतले में डाल दे और फिर बाद में उसका दहन करे तो फिर कही जाकर उस नेता की आत्मा कचोटेगी और फिर शायद कही जाकर बुराई का अंत होगा या ये कहे की तब जाकर "पुतला दहन" सफल होगा।
जब तक मै अपनी सोच से बाहर आता तब तक वह पुतला जल चूका था और उस पुतले की राख चौराहे के बीचोबीच पड़ी थी, सारी की सारी भीड़ भी अपने - अपने रास्ते चल दी थी, तब मै सोच रहा था की यदि ऐसे "पुतला दहन" से अगर भारत का कल्याण हो तो हे प्रभु मै इस तरह के आयोजन रोज करवाऊँ और इन पुतलो को राख को इज्जत व विधि विधान के साथ विसर्जित करू...पर अफ़सोस की बात..की ऐसा होता नहीं है।
तो "पुतला दहन" करने वालो से मेरी हाथ जोड़कर प्रार्थना है की..... महोदय जी कृप्या "पुतला दहन" के पूर्व पुतले में उस व्यक्ति की आत्मा के कुछ अंशो को आव्हान कर बुलाये और फिर उसके बाद पुतला दहन करें।



** वंदे मातरम्**

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