Friday, 24 June 2016



शीर्षक - अन्तर्पीड़ा का दिव्य रूप
लेखक - अभिमन्यु शर्मा
शैली - कल्पन्यास

सुनसान गहरा जंगल जहाँ सूरज की रौशनी की किरणे भी शायद ही पहुच पा रही थी, तरह तरह के जानवरो और अन्य वन्य जीवो की बेहद भयानक किस्म की आवाजें आ रही थी और कुछ कुछ पक्षी और जीव तो ऐसे जो पहले कभी देखे भी ना थे, में एक लड़की तेज़ी से दौड़ती सी जा रही थी और ना जाने किसका नाम पुकारती जा रही थी,

लड़की : विशाखा…. विशाखा…. तुम कहाँ हो? अगर मुझे सुन सकती हो तो मुझे आवाज़ दो.. विशाखा………

बदहवास सी दौड़ती हुई किसी हिरनी की तरह वो टूटे हुए पेड़ो और रास्ते में आने वाली हर रुकावट को बड़ी ही कुशलता से कुचालें भर पार करती हुई जा रही थी।

पता नहीं कितने घंटो या दिनों का सफ़र तय करती हुई उस भयानक जंगल में वो अकेली लड़की ना जाने कैसे जी रही थी, अचानक उसे एक पुराना मंदिर दिखाई दिया और उसमे एक उम्मीद की किरण जगमगा उठी। उसने उस पुराने खण्डरी मंदिर में प्रवेश किया।


*उसी बीहड़ जंगल के किसी दूसरे कोने पर*

कुंदन : देख बे पीटर तुझे पहले भी कई बार समझाया है अगर माल ले जाते वक्त कुछ भी गड़बड़ हुई तो पता है ना…

_कुंदन के बात खत्म करने से पहले ही_

पीटर : हाँ हाँ पता है कुंदन, हर बार वही बात दोहराना जरूरी है क्या? तुम्हे पता है ना ये काम मैं कोई पहली बार तो कर नहीं रहा हूँ।

_पीटर ने बात को साफ़ करते हुए कहा_

कुंदन : हाँ पता है यार लेकिन तुझे पता हैं ना पिछली बार जो पुलिस का लफड़ा हुआ था..

पीटर : तो उसमे मेरा क्या दोष? मैंने अपना काम पूरी सावधानी से किया था, अब आगे माल को क्लाइंट तक ले जाने की जिम्मेदारी मोहन की थी।

कुंदन : और फिर बॉस ने मोहन के साथ क्या किया ये भी पता है ना तुझे!!

पीटर : हाँ पता है

कुंदन : बस इसीलिए सावधान कर रहा था।

उनकी बात अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि भागता भागता एक मुश्टंडा उन दोनों के पास आया।

रघु : जल्दी चलो दोनों, बॉस ने याद फ़रमाया है।

फिर तीनो भागते हुए एक झोपडी में घुसते ही गायब हो जाते है।

…………………………………………….

*जंगल के पुराने मंदिर में*

बड़े ही तेज़ कदमो से वो लड़की मंदिर के अंदर घुसती है जहाँ सारी दीवारो और खम्बों पर अजंता एल्लोरा की गुफाओं जैसे नक्काशी की हुई थी, जो कि बेहद खूबसूरती से भयानक दिख रही थी। लड़की ने चारो तरफ नज़र घुमाई तो देखा किसी देवी की बड़ी सी मूर्ती के नीचे एक बूढी माई बैठी उस लड़की को घूर रही थी।

लड़की ने स्किन टाइट जीन्स और पिंक टॉप पहना हुआ थी, शरीर एकदम सुडौल और पतला मगर मजबूत।

बुढ़िया : अरे बेटी तुम आ गयी, मैं तुम्हारा कब से इंतज़ार कर रही थी।
लड़की : नहीं नहीं दादी माँ आप मुझे शायद कोई और समझ रही हो।

बुढ़िया ने एक चतुर मुस्कान के साथ कहा,
बुढ़िया: अच्छा बेटी, बूढी हो गयी ना इसलिए शायद अब ठीक से दिखना भी बंद हो गया है,
यहाँ आओ मेरे पास।

लड़की: जी दादी माँ,

*और लड़की बूढी के पास जाती है*

बुढ़िया : तो बताओ बेटी इस सुनसान और खतरनाक जंगल में अकेली क्यों घूम रही हो? क्या तुम्हें डर नहीं लगता?

लड़की : दादी जी जिसका सब कुछ यही इसी जंगल में हो और वो भी इस जंगल से भी बड़े खतरे में तो इस जंगल से भला क्या डरना।

दादी : अच्छा बेटी तुम्हारा नाम क्या है? और ऐसा क्या हुआ तूम्हारे साथ जो तुम्हे इस जंगल में भटकना पड़ रहा है?

इधर लड़की अपनी कहानी सुननी शुरू करती है,
और उधर कोई किसी और ही तरह की तैयारियों में लगा था।

बॉस - पीटर तुम्हे जो काम दे रहा हूँ वो बहुत बड़ा है लेकिन इनाम भी बड़ा है, अगर गलती हुई तो अंजाम भी बहुत बुरा है।

पीटर - ब..ब.. बॉस आप उसकी फ़िक्र न करें मैं ये काम कर लूंगा।

बॉस - करना ही पड़ेगा पीटर। ( बॉस ने पीटर को घूरते हुए कहा)
“ कुंदन सारा माल लोड कर दिया ना?”

कुंदन - यस बॉस।

बॉस - ठीक है अब तुम दोनों जा सकते है, काम पूरा करते ही तुम्हारा इनाम तुम दोनो को मिल जायेगा, “अब जाओ”।

~पुराने मंदिर में~

लड़की - दादी मेरा नाम चंदा है और मैं अपनी 14 साल की बहन विशाखा को ढूंढ रही हूँ।
बुढ़िया - लेकिन इतने खतरनाक जंगल में इतनी छोटी बच्ची?? (दादी ने आश्चर्य जताया)

चंदा ने अपनी कहानी शुरू की।

चंदा - मेरी माँ का नाम मालती है जो हरियाणा के एक गाँव चांदपुर में रहती थी एक असलम नाम के आदमी ने उन्हें बहला फुसलाकर शादी कर ली। शुरू में तो सब सही था लेकिन शादी के कुछ दिन बाद ही वो बात बात पर मेरी माँ से झगड़ा करने लगा मारने पीटने लगा, एक साल बाद मेरा जन्म हुआ लेकिन मेरे बाप के व्यवहार में कोई अंतर ना आया। पहले तो मेरी माँ ही सहती थी लेकिन जब मैं पांच साल की हुई तब धीरे-धीरे सब समझ में आने लगा, वो रोज़ शराब पी कर आता और हम दोनों को मारता, मेरी बेचारी माँ के हाथ में जलता कोयला दे देता। लेकिन मैं नन्ही सी जान कर भी क्या सकती थी उसने मेरी माँ का भी नाम बदलकर सलमा करवा दिया था और मेरा नाम चाँदनी से चंदा हो गया था।
फिर हम दोनों का साथ देने हमारे घर में एक और नन्हे मेहमान ने जन्म लिया जिसका नाम मैंन विशाखा रक्खा।

मेरी माँ को मेरे बाप की सारी काली करतूतो का पता था इसलिए हम दोनों को हमारे बाप के जुल्मो से बचाने के लिए खुद सारे जुल्म सहती रही। 2 साल पहले मेरी छोटी बहन विशाखा जिसे मैं प्यार से वैशु कहती हूँ उसका अपहरण हो गया था, हमने पुलिस में शिकायत भी लिखवाई लेकिन उन्होंने हमारा साथ देने से साफ इनकार कर दिया। एक रात जब मेरा बापू रात को शराब पी कर आया तो नशे में उसने सब बक दिया। गुस्से में मेरे माँ और उस दरिंदे के बीच हुई हाथापाई में मेरी माँ का सर दीवार से टकराकर मौत हो गयी।

मेरा जालिम बाप तुरंत घर से बाहर भागा मैंने उसका पीछा किया और उसके अड्डे तक पहुँच गयी वहां जाकर पता चला कि किसी गोविन्द नाम के आदमी के साथ मिलकर उन्होंने लड़कियो के जिस्म को बेचने का व्यापार किया हुआ है और उस जालिम दरिंदे में इतनी शर्म और लाज भी न थी दया और धर्म सब बेच खाया था उसने अपनी ही 12 साल की लड़की को बेच डाला।
मुझे उनकी बातें सुन कर बहुत गुस्सा आ रहा था, पास ही पड़ी लोहे की रॉड उठा कर मैंने अपने बाप के सिर पर वार कर दिया और उसे नरक के रास्ते रवाना कर दिया। लेकिन गोविंद तब तक संभल चूका था और मुझे धक्का देकर भागने लगा मुझे चोट लगी, लेकिन बचपन से जिमनास्टिक और शारीरिक मजबूती की वजह से मैंने फिर भी उसका पीछा करने की कोशिश की। वो एक सफ़ेद कार ने बैठ कर भागने लगा मैंने चलती गाडी की साइड से खिड़की पकड़ ली लेकिन एक झटके से मुझे गिराकर वो भाग गया।
तब से अपनी बहन को ढून्ढ रही हूँ और अपने आपको और मजबूत बनाकर सभी जगह से उसकी पूरी गैंग को ढून्ढ कर खत्म करना चाहती हूँ। जब भी मेरी माँ को या मुझे जरूरत थी तब एक भी मर्द ने हमारा साथ नहीं दिया इसलिए मुझे मर्द जात से नफरत हो गयी है।

दादी - बेटी तेरी कहानी सुन कर मेरी दिल रो रहा है मैं बुढ़िया तेरी कोई मदद तो नहीं कर सकती लेकिन अपनी दुआ और आशीर्वाद के साथ तूझे ये ताबीज देती हूँ जा माँ भवानी तेरी सहायता करे।
(बूढी माँ से आशीर्वाद ले कर चंदा अपने सफ़र पर आगे बढ गयी)..


*जंगल के दूसरे कोने पर*

पीटर - चलो बे ये वाला कैंटर भी चढ़ा दो, बस ये आखिरी वाला बचा है, संभाल के रक्खो रे भिडू लोग माल को कोई नुकसान नहीं होना चाहिए।

क्रेन आखिरी कैंटर को कैंटर ट्रक में चढ़ा ही रहा होता है कि अचानक एक कैंटर का दरवाजा खुल जाता है और उसमे से लड़कियों के चीखने की आवाज़ आती है।

अचानक मौसम अपना रूप बदलने लगता है, आसमान में काले बादल छाने लगते है और बिजलियों की कड़कड़ाहट से आसमान चमकने लगता है।

पीटर - अबे पागल हो क्या सब के सब अगर एक भी माल को कुछ हुआ तो बॉस हम सबको भूखे शेरों के आगे फिकवा देंगे।
अगर अब कोई भी गड़बड़ हुई तो…

शायद पीटर को अभी बहुत कुछ कहना था लेकिन किसी ने उससे उसके होश छीन लिए थे और पलक झपकते ही वो लड़कियों से भरा कैंटर जमीन पर आ चूका था।

सभी आश्चर्य से फटी आँखों से उसे देख रहे थे जिसने ये कारनामा किया था। उसने पुरातन काल के श्वेत वस्त्र पहने हुए थे बिलकुल एक वीरांगना की तरह और एक उड़ने वाले श्वेत बाघ पर सवार थी, हाथ में एक लंबी दोधारी तलवार और कमर पर मयान लटकी हुई थी।

अभी वे सभी गुर्गे उस सौंदर्य की देवी को निहार ही रहे थे कि उसने अपने बाघ को आदेश दिया वहाँ फैली आपराधिक गंदगी को साफ़ करने का और खुद गयी बाकी कैद लड़कियों को आज़ाद करने के लिए।

आज़ाद कराने के बाद उस वीरांगना ने उन सभी लड़कियों को वहाँ से पुराने मंदिर जाने का रास्ता बताया क्योकि उस घने जंगल से निकलना उनके बस की बात नहीं थी।

फिर वहाँ से निकल पड़ी इस गंदगी के साम्राज्य के अधिपति का अंत करने के लिए।
उसने वहीँ पड़े एक गुंडे से पुछा के उनका सरदार कहाँ है? उस गुंडे ने उसे रास्ता बता दिया।

रास्ता एक झोपड़ी के नीचे भूमिगत तहखाने में बसी गुप्त सुरंगे थी। बॉस को भी पता चल गया था ऊपर हो रहे हालातों का, लेकिन वो देखना चाहता था उस शख्सियत को जिसने उसके इस गुप्त साम्राज्य को तहस नहस कर दिया। वो अपने सुरक्षित कक्ष में बैठा देख रहा था उस शख्सियत को अपने गुप्त सुरंग में दाखिल होते हुए।

जैसे ही उसने देखा एक जवान लड़की जो कपड़ो से तो किसी नौटंकी से भागी हुई लग रही थी लेकिन हाथ में खून सनी तलवार और चेहरे पर ऐसा आक्रोश और तेज़ लिए उसकी और बढ़ रही है। उसने अपने माइक पर गर्जना की।

बॉस : ऐ लड़की कौन हो तुम और क्या चाहती हो? यहाँ इस तरह घुस आने का क्या मतलब है?

भवानी : भवानी… भवानी नाम है मेरा और मैं तुम जैसे दरिंदो का दुनिया से अस्तित्व मिटा देना चाहती हूँ जो नारी को केवल मनुष्य नहीं अपितु भोग की एक वस्तु समझते है।

बॉस : हाहाहा (व्यंगात्मक ठहाका लगाते हुए), हुँह लड़की तुम जानती नहीं किससे उलझ रही हो। मेरा अस्तित्व मिटाओगी। अरे पहले मुझ तक पहुच कर तो दिखाओ।

भवानी जैसे ही तहखाने में पहुचती है उसे वहां सुरंगों का जाल फैला दिखता है, वह जैसे ही आगे बढ़ती है एक बार फिर एक आवाज़ गूंजती है।

“लड़की इन सुरंगों में मौत का जाल बिछा है, अब भी वक्त है वापस लौट जा वरना भरी जवानी में जान से हाथ धो बैठेगी”, बॉस ने कहा।

भवानी : समय तो तेरे पास नहीं बचा है नीच, अभी से अपनी अन्तिम घड़ियाँ गिननी शुरू कर दे।

भवानी एक सुरंग में प्रवेश करती है तभी चारों ओर से तीरनुमा लोहे की छड़ आगे बढ़ती है लेकिन भावनी उन सभी छड़ो को अपनी तलवार तीव्र गति से काटती हुई आगे बढ़ती है।

आगे बढ़ते ही भावनी ने स्वयं को एक बड़े से पिंजरेनुमा कक्ष में पाया और चारो ओर से जंगली शेर, चीते और बाघ अंदर घुसे। देखने में कई दिनों से भूखे और आक्रामक लग रहे थे लेकिन भावनी के माथे पर शिकन तक नहीं आई।
शेरों ने अपनी क्षुधा शांत करने के लिए जैसे ही हमला किया अचानक ही भवानी की आँखों में देखते ही उसके सामने भीगी बिल्ली की तरह उसके तलवे चाटने लगे।

पिंजरे की लोहे की छड़ो को अपनी तलवार से काट कर आगे बढ़ती है और सामने खड़ा दिखता है मांसल शरीर और हाथ में बड़ा सा हथौड़ा।

रघु: रघु नाम है मेरा और खोपड़े को तरबूज़ की तरह फोड़ना काम है मेरा।

ऐसा बोलते ही अपना हथौड़ा हवा में घुमा कर भवानी पर वार कर दिया उस जालिम ने।

भवानी झुक कर अपना बचाव करते हुए कहती है।
भवानी : दुष्ट तुझे अभी पता चल जायेगा कि नाश किसका होगा।

 भवानी ने बड़ी ही कुशलता से उछल कर रघु के सीने पर वार कर दिया परंतु रघु को तो जैसे फर्क ही नहीं पड़ा। रघु ने एक सटीक वार भवानी के सिर पर किया लेकिन भवानी ने उसे अपनी तलवार पर रोका और रघु को झटके से पीछे धकेला। फिर घूम कर नीचे बैठते हुए लहराती हुई तलवार का एक वार उसके पैरों पर कर दिया।

अचानक हुए इस हमले से वो लड़खड़ाकर पीछे गिर गया। एक क्षण भी ना गंवाते हुए भवानी उसकी छाती पर सवार हुई और अपनी तेज़ दोधारी तलवार रघु के सीने में घोप दी। तड़पते रघु ने प्राण त्याग दिए।

अपने सबसे ताकतवर सिपाही का हाल बॉस अपने सुरक्षित कक्ष में लगे उपकरणो की सहायता से देख रहा था और उसने तुरंत वहां से फरार होने का मन बना लिया था।

आखिरी दीवार को पार कर भावनी सुरक्षित कक्ष के द्वार तक पहुँच गयी थी और जैसे ही उसने द्वार खोलने के लिए उसे छुआ उसे तीव्र विद्युत का आभास हुआ। तभी उसने देर ना करते हुए अपनी दिव्य तलवार को निकाला और दरवाजे पर एकसाथ कई वार कर दिए। किन्तु वह दीवार 5 फुट मोती स्टील की चादर से बनी थी। और दीवार के बाहर फिंगरप्रिंट स्कैन लगा हुआ था जिसपर हाथ का निशाँन चमक रहा था।

तभी भवानी को एक उपाय सूझा और वो मृत पड़े रघु को घसीड़ लाई। उसका हाथ पाकडी कर उसने निशांन के साथ मिलाया और वो दरवाजा खुल गया।

भवानी ने दरवाजे में प्रवेश किया लेकिन तब तक वो दुष्ट बॉस वहां से किसी गुप्त द्वार से भाग चुका था और उसने कोई निशान तक नहीं छोड़े।

इतने में ऊपर पुलिस और कमांडोज़ की गाड़ियों के साईरन और हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट की आवाज़ें आने लगी थी। शायद वहां से आज़ाद की गयी लड़कियों ने ही किसी प्रकार पुलिस से संपर्क बना कर उन्हें वहाँ बुलाया था।

लेकिन जैसे ही पुलिस वहाँ पहुँची ना तो उन्हें वहां कोई उड़ने वाला बड़ा सा सफ़ेद बाघ नजर आया और ना ही सफ़ेद कपडे पहने कोई देवी।

मिली तो बस वहाँ मौजूद अनगिनत गुंडों की फड़ी हुई लाशें और एक बेहोश जवान लड़की जिसके गले में एक तावीज जो किसी तारे की तरह टिमटिमा रहा था।



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