Wednesday, 20 April 2016

अपनों से दूर, अकेलेपन के गम में चूर,
घर शहर से दूर, तन्हाँ रहने को मजबूर हूँ।
खुद को तसल्ली देता हुआ, इस बेगाने शहर में,
अपनों को ढूंढता हुआ भटकने को मजबूर हूँ।।

सोचा न था कभी, की एक दिन लिखूंगा ये फलसफा,
न चाहते हुए भी लिखता हूँ, क्योंकि लिखने को मजबूर हूँ।
अपनों की यादों में घिरा हुआ, पुराणी यादों में मशगूल हूँ,
सोचा था लिखूंगा ख़ुशी के तराने, पर गम बाँटने को मजबूर हूँ।


समझता नहीं ये मन बाबरा, इसको समझा-समझाकर हारा,
वादा किया था किसी से कभी,इसलिए हंसने को मजबूर हूँ।
खुद को तसल्ली देता हुआ, इस बेगाने शहर में,
अपनों को ढूंढता हुआ, भटकने को मजबूर हूँ।




ये कविता तब लिखी थी जब मैं अपनी study के लिए दूसरे शहर में गया था, ये घर से बहार अकेला रहने का मेरा पहला अनुभव था।

कोई गलती हो तो क्षमा करें।


और अगर किसी कमी की और धयान इंगित करवाना चाहें, तो आपके विचार इनबॉक्स में देने का कष्ट करें।

शायद आपके दिए गए सुझावों से मैं लिखना सीख जाऊं।

धन्यबाद

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