Friday, 25 March 2016


कुछ व्यंग्य था,बहुत सुरम्य था, खुद कहा मतवाली आँखों ने, प्रेम हममें अदम्य था।
कहना चाहे मगर,बोली होंठो पे ना चढ़ने पाती हवा की भांति फिर,लहरा के तुरंत मुस्काती।।

रमणीयता अंक में भरती,शर्माहट दामन पकड़ती, प्रखर पीत,पुलकित चेहरे को भाव-श्रृंगार हर पल जकड़ती। उठती,फिर झुकती पलकें,आँखों में करूणा की कान्ति भावों में व्याप्त मृदुलता,मृदुलता से जनित शान्ति।।

अंग-अंग से माधुर्य चहकती,सौन्दर्य का तेज छलकती दर-दर पग-पग धरने पर
अंग अंग से संकेत झलकती।
कस कर भर लो अंक में अपने,होंठो से कह दो वो बात सूनेपन की फिर रात खत्म हो ,प्रेम की फिर हो प्रभात।।

अभिव्यक्ति की स्वीकृति पा,उठा कलेजा धक् सा हो, देख ये चिंतित हो उठी वो, जैसे मन में मेरे शक सा हो। हे प्रिये!इस चेहरे पे,जो बसती है सदा मुस्कान देख इर्ष्या करता है जो,ऊपर विस्तृत नील वितान।।

हे प्रिये!उस चेहरे पे,उदास भाव न कभी लाओ, खोलकर पलकों को अपने
मंद मुस्काहट की सुधा बरसाओ। फिर खुद को तुझपर अर्पण करूँ,साक्ष्य बने ये प्रकृति प्रेम की फिर मतवाली सुबह हो,दे दो तुम
''प्रेम स्वीकृति''।।

Post a Comment: