Wednesday, 16 December 2015


  जीवन में ऐसी बहुत कम किताबें होती हैं जिनको आप पेज दर पेज याद रख पाएं. ऐसी किताबें जो आपके सोचने की दिशा बदल दें. ऐसी किताबें जिनको पढ़ कर आपके मन में वैसी ही एक किताब बनाने का कीड़ा कुलबुलाने लगे, जिसको पेनल दर पेनल कॉपी करने के बाद भी आपके हाथ न थकें और सपने में आप खुद को कॉमिकबुक आर्टिस्ट समझ कर मुस्कुराते रहे… इस समय आपके हाथों में मौजूद ये कॉमिक मेरे लिए वो सब कुछ है बल्कि ये कहूं कि इन सबसे कहीं ज्यादा है तो कोई अतिश्योक्ति ना होगी. अगर मैं अपने पंद्रह वर्षीय स्वरुप को बता पाता कि करीब पंद्रह वर्षों के बाद वो प्रतिशोध की ज्वाला के सिल्वर जुबली अंक के लिए यह विशेष लेख लिख रहा होगा तो मुझ पर कभी यकीन न करता और बंटी के साथ बैठ कर स्टार पोस्ट के लिए फॅनलेटर लिखने में मशगूल होता.

भिलाई जैसे औद्योगिक शहर की तपती दुपहरी में नए सेट की कॉमिक्स पर प्लास्टिक जिल्द चढाते हुए मैं और बंटी सुपर कमांडो ध्रुव की नयी कॉमिक्स अपनी लाईब्रेरी के ग्राहकों की नज़र से बचा  कर दो तीन दिन तक बार बार पढ़ते थे, तब जा कर किसी और तक पहुँच पाती थी ये कॉमिक्स. दो तीन दिन बाद जब बाकी लोग इन कहानियों का लुत्फ़ ले रहे होते थे तो हम दोनों इन कॉमिक्स का पेज दर पेज विश्लेषण करके ध्रुव के लेटर कॉलम स्टार पोस्ट के लिए पत्र लिख रहे होते थे. मुझे अब भी याद है कि उन दिनों प्रतिशोध की ज्वाला इतनी आसानी से नहीं मिलती थी. राज कॉमिक्स के दुर्लभ टाईटल्स में से एक ये कॉमिक यदा-कदा ही देखने को मिलती थी. ऐसे में जब हमें खबर लगी पड़ोस के किसी शहर की लाईब्रेरी में ये तीनों किताबें उपलब्ध हैं तो हम करीब बीस किलोमीटर का सफ़र साईकल पर तय करके उस लाईब्रेरी पहुंचे, और लाखों मिन्नतें करके उस लाईब्रेरी वाले से ये किताब ब्लैक में खरीदी थी.

अनुपम सिन्हा जिन्हें भारतीय कॉमिक्स का सबसे बेहतरीन रचनाकार माना जाता है, स्वयं मानते हैं कि सिक्वेंशीयल आर्ट के मामले में ये कॉमिक उनकी सबसे बेहतरीन कॉमिक्स में से एक है. इसमें कोई दो राय नहीं कि इतनी बड़ी कहानी को बत्तीस पन्नों में समेटना कोई बच्चों का खेल नहीं, और गागर में सागर भरने में अनुपम जी की सिद्धहस्तता के विषय में कुछ कहना सूरज को दीपक दिखने जैसा है.

अब सोच कर हंसी आती है मगर जब भी ध्रुव की कॉमिक्स वाला सेट आनेवाला होता था तो हम रोज़ अपने शहर के एएच व्हीलर के दो चक्कर लगाया करते थे. हम अपने इन चक्करों के इतने पाबन्द थे कि तूफ़ान हो या कड़कती धूप, स्टेशन जाने से हमें रोकना नामुमकिन था. हमारी बिला नागा विजिट से परेशान मोहन नाम के उस स्टालवाले ने हम दोस्तों का नाम – ‘भैय्या सेट आ गया क्या’ रख दिया था. हर रोज़ हम उसे उसका स्टाल खोलने में मदद करते. धड़कते दिलों से किताबों के पैकेट खोलने में उसकी मदद करते और कहीं उस पैकेट में ध्रुव की कॉमिक वाला सेट निकल आया हो तो हमारी हालत केबीसी में करोड़ों रुपये जीतनेवाले कंटेस्टेंट जैसी हो जाती थी. कई वर्षों बाद संजय जी का इंटरव्यू करते समय पता चला कि ये हाल सिर्फ हमारा नहीं था, भारत के हर छोटे बड़े शहर के रेलवे स्टेशनों में व्हीलर्स बड़े मज़े से बच्चों से अपनी दूकान खुलवाने और बंद करवाने में मदद लिया करते थे और नया सेट सबसे पहले पाने की लालच में बच्चे ख़ुशी ख़ुशी उनकी मदद किया करते थे.

सुपर कमांडो ध्रुव के लिए ये जूनून, ये पागलपन सिर्फ मुझ अकेले का नहीं है बल्कि करीब करीब मेरी उम्र और मेरे बाद आई कमोबेश हर जेनरेशन का है. तभी तो अगर कोई आर्टिस्ट अगर फॅनआर्ट में भी ध्रुव के कॉस्ट्युम के साथ किसी किस्म का बदलाव करता है तो उसे फॅन्स के गुस्से का शिकार होना पड़ता है और अगर किसी नए राईटर ने अगर ध्रुव को हाथ लगाया तो उसकी तो शामत आई समझो. आखिर ऐसा क्या है जो सुपर कमांडो ध्रुव को हमारे देश के सबसे चहेते सुपरहीरोज में से एक बना देता है? सबसे बड़ी बात जो ध्रुव को सुपर बना देती है वो है ये कि वो सुपरहीरो नहीं है, याने उसमें कोई सुपर पॉवर नहीं है, उसकी सबसे बड़ी पॉवर है उसका तेज़ दिमाग और तुरंत बुद्धि जो अचानक उसे हमारी तरह एक आम इंसान बना देती हैं. ध्रुव के आस पास का वातावरण भी कहीं न कहीं हमें अपने घर के करीब ले आता है. एक ज़िम्मेदार पिता, एक प्यारी माँ और एक नटखट बहन – ध्रुव का परिवार, बिलकुल हमारे परिवारों जैसा है. ज़माने के लिए वो सुपर कमांडो ध्रुव है मगर अपने परिवार के लिए वो ध्रुव है और श्वेता के लिए उसका ध्रुव भैय्या. पाश्चात्य सुपरहीरो सभ्यता से कहीं दूर ध्रुव की इन कहानियों में भारतीय संस्कृति की महक है और उसके कारनामों में इंटरनेशनल स्तर के एडवेंचर. स्टोरी टेलिंग के किसी भी माध्यम में ऐसा सम्मिश्रण मैंने कभी नहीं देखा.


मेरी डोक्युमेंट्री फिल्म चित्रकथा को दिए इंटरव्यू में संजय गुप्ता जी ने बताया था कि किस तरह अनुपम जी के बाकी किरदारों को पढ़ कर उन्हें राज कॉमिक्स के लिए अनुपम जी की तलाश थी. जब उन्हें पता चला कि अनुपम जी एक अन्य प्रकाशक से मिलने दिल्ली आये हुए हैं तो संजय जी उन प्रकाशक के ऑफिस के बाहर अनुपम जी का इंतज़ार करते रहे और जैसे ही अनुपम जी बाहर आये संजय जी उनसे मिले. इससे पहले अनुपम जी राज कॉमिक्स की एक प्रकाशनाधीन कॉमिक मैगजीन के लिए देव-राज नाम की 6 पेजेस की एक कॉमिक कर चुके थे. वह कॉमिक मैगज़ीन प्रकाशित हो न पाई. इस बीच राज कॉमिक्स शुरू हो चुकी थी और नागराज की सफलता के बाद दूसरा सुपरहीरो लॉन्च करने को तैयार थी. अनुपम जी के पास एक सुपर हीरो की कॉमिक करीब तैयार रखी थी बस अनुपम जी को मिल गया राज कॉमिक्स का साथ, राज कॉमिक्स को मिल गए अनुपम जी और हम जैसे फॅन्स को मिल गया सुपर कमांडो ध्रुव. हालांकि ध्रुव का पहला लुक हमारे परिचित सुपर कमांडो ध्रुव वाले लुक से काफी अलग सा था, मगर कॉमिक करते समय अनुपम जी ने ध्रुव के लुक को पूरी तरह अपडेट कर दिया. शूज़ की जगह बूट्स ने ले ली और ट्राउज़र्स की जगह टाईट्स ने.


वर्षों बाद अनुपम जी का इंटरव्यू करते समय एक और मजेदार बात सामने आई कि उन्होंने प्रतिशोध की ज्वाला को ध्रुव की दूसरी कॉमिक के रूप में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया था, और वो रोमन हत्यारा पर काम शुरू कर चुके थे, मगर बाद में उन्हें लगा कि अपने हीरो का एडवेंचर शुरू करने के पहले उन्हें पाठकों को उसकी ओरिजिन की कहानी सुनानी चाहिए और उन्होंने रोमन हत्यारा रोक कर प्रतिशोध की ज्वाला पर काम शुरू कर दिया. हालांकि ध्रुव के ओरिजिन की कहानी एक एडवेंचर के बाद सुनाने का आईडिया अब भी अनुपम जी ने पूरी तरह त्यागा नहीं. फर्क सिर्फ इतना था कि अब एक पूरी कॉमिक के एडवेंचर की बजाय प्रतिशोध की ज्वाला की कहानी पहले दो पन्नों की शोर्ट स्टोरी के बाद फ्लैशबैक में सुनाई जाती है. ना सिर्फ कहानी को ले कर अनुपम जी कुछ अलग करने की सोच रहे थे बल्कि उन्होंने ध्रुव के साथ सारे स्टीरियोटाइप तोड़ने का मन बना लिया था… बाकी सुपरहीरोज़ की तरह ध्रुव की कोई गुप्त पहचान नहीं थी… अनुपम जी का मानना था कि उनके हीरो को किसी ऑल्टर इगो की ज़रूरत नहीं है क्योंकि अगर वो कुछ गलत नहीं कर रहा तो वो अपनी पहचान क्यों छिपाएगा. अपने परिवार को बचाने के लिए अपनी पहचान छिपानेवाली बात भी उन्हें नागवार गुजरी क्योंकि अगर ऐसा होता तो फिर सारे पुलिस ऑफिसर्स नकाब पहन कर घूम रहे होते.  इस तरह ध्रुव ने नकली पहचान का सहारा ना ले कर खुद को बतौर असली सुपरहीरो स्थापित किया. ध्रुव के चरित्र की ये इमानदारी, और भारतीय मूल्यों और परिवार के लिए सम्मान कि भावना ने उसे ना सिर्फ फैन्स का चहेता हीरो बना दिया बल्कि एक कॉमिक बुक कैरेक्टर होने के बावजूद ध्रुव ने अपने फैन्स को उनका चरित्र मज़बूत रखने में मदद की… ध्रुव की यही खूबियाँ उसकी प्रसिद्धि को भारतीय कॉमिक जगत में चमकते ध्रुव तारे की तरह अटल रहने में मदद करती हैं.


ना सिर्फ ध्रुव के चरित्र पर बल्कि उसकी कॉस्ट्यूम पर भी विशेष ध्यान दिया गया. हालांकि अनुपम जी खुद बैटमेन के बड़े फेन हैं, और ध्रुव की कॉमिक में उन्होंने इसके हिंट भी दिए हैं,

मगर उनका मानना था कि बैटमेन काफी डार्क कैरेक्टर है और ध्रुव उसके बिलकुल विपरीत एक सुलझा हुआ किरदार होना चाहिए. ध्रुव को जन्म देते समय अनुपम जी का मानना था कि उनके हीरो के ओर से किसी भी तरह का नकारात्मक सन्देश पाठकों तक ना जाए, इसलिए उन्होंने ध्रुव के चरित्र को डार्क होने से बचाए रखा और उसके कॉस्ट्यूम तक में लाल या काले जैसे स्ट्रोंग कलर्स की जगह खुशनुमा पीले और नीले को प्राथमिकता दी.

अब जब कैरेक्टर के एक एक पहलु पर ऐसी बारीकी से काम हो रहा हो तो उसकी कहानियों पर की गयी मेहनत और लगन साफ़ नज़र आनी ही थी. वैसे तो ध्रुव की कहानी शुरु हुयी प्रतिशोध की ज्वाला से मगर मेरा ध्रुव से परिचय ज़रा देर से हुआ, मेरी पहली ध्रुव की कॉमिक थी लहू के प्यासे जो तब तक की मेरी पढ़ी सारी कॉमिक्स से कहीं अलग और एक सधी हुयी कहानी थी, जिसमें एक पेनल भी जाया नहीं किया गया था. यह कॉमिक मुझे इतनी पसंद आई कि मैं इसे एक ही दिन में तीन चार बार पढ़ गया. मेरे लिए ये कॉमिक धनञ्जय के बहुआयामी द्वार से कम नहीं थी, जिससे हो कर मैं एक नयी दुनिया में पहुँच गया था. इसके पहले मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि किसी कॉमिक की कहानी इतनी पॉवरफुल हो सकती है और इतनी दमदार कि पढ़ कर अचानक लगे कि आप एक मेच्योर रीडर हो गए हैं क्योंकि आप ऐसी कहानियाँ समझते और पसंद करते हैं. मगर ये तो महज़ शुरुआत थी अगले दिन जब मैं लाईब्रेरी पहुंचा तो तब तक मेरा नया फेवरेट हीरो सुपर कमांडो ध्रुव हो चूका था, अब मैं उसकी सारी किताबें पढ़ लेना चाहता था. इसके बाद कॉमिक्स का जो अगला बंच मैंने उठाया उसमें सिर्फ और सिर्फ ध्रुव की कॉमिक्स थी… शुरुआत मैंने प्रतिशोध की ज्वाला से की और तब से अब तक मैं इसे इतनी बार पढ़ चुका हूँ कि मैं पेनल दर पेनल आपको कैप्शन बिना पढ़े सुना सकता हूँ. हालांकि ये पूरी की पूरी कॉमिक मेरी फेवरेट है मगर इसमें पेज 3 मेरा सबसे फेवरेट पेज है और पेज 21 का आधे पेज का पेनल मेरा सबसे फेवरेट पेनल. ना सिर्फ मैं बल्कि मेरे सभी आर्टिस्ट दोस्तों ने इन पन्नों को ना जाने कितनी बार नक़ल करने की कोशिश की है और अपने आड़े तिरछे मास्टरपीस एक दुसरे को दिखा  दिखा कर झूठी वाह वाहियाँ लूटी हैं.अनुपम जी के इनोवेटिव पेनल ब्रेक डाउन और टाईट स्क्रिप्ट्स ने वैसे तो ध्रुव की हर कॉमिक को बार बार पढ़ने लायक बना दिया, मगर कुछ ख़ास कॉमिक हैं जो भुलाये नहीं भूलती. आदमखोरों का स्वर्ग और स्वर्ग की तबाही इन सबसे यादगार कॉमिक्स में से एक है, ना सिर्फ अपने कथानक की वजह से बल्कि इस वजह से भी कि इस मिनी सिरीज़ से चंडिका ने ध्रुव की कॉमिक्स में पदार्पण किया. उस दौर की ध्रुव की कॉमिक्स की विशेषता ये रही कि कहानियों में फैंटेसी का पुट होते हुए भी कहानी हकीक़त के करीब हुआ करती थी – फिर चाहे वो समुद्र से निकले शैतान की कहानी हो या येतियों की, बर्फ की गर्भ से निकले महामानव और डायनोसोर की कहानी या फिर नकली तांत्रिक की रूहों के शिकंजे, वॉन्डरिंग ज्यू के लेजेंड पर आधारित मुझे मौत चाहिए हो या फिर वू-डू में कैलेंडर की तारीखों के ऊपर चल रहे ध्रुव के एक्शन सीन्स, ध्रुव की हर कॉमिक थी इतनी लाजवाब कि हम सभी फॅन्स के लिए ध्रुव बन चुका था हमारा सबसे फेवरेट सुपरहीरो.

ध्रुव के लिए लिखे अनुपम जी के संवाद हमें मुँह ज़बानी याद रहने लगे, फिर चाहे वो – ‘लडाई शुरू होने के पहले ही ख़त्म हो गयी’ जैसा स्टेटमेंट हो या ‘ध्रुव की कई आँखें हैं…’ जैसी रोमांच पैदा करने वाली लाइनें… अब कुछ भी प्लान करने के पहले ‘एक मिनट’ कहना हम फॅन्स की आदत बन चुका था… जहां ध्रुव की तेज़ बुद्धि का लोहा मान कर हम खुद को उतना ही बुद्धिमान मानने की कोशिश करते वहीँ कभी कभी उस बेचारे की बुद्धि पर तरस भी आता कि अपने ही घर में मौजूद चंडिका का भेद खोल पाने में वो नाकामयाब है. अब इसे चिराग तले अँधेरा कह लीजिये या श्वेता की चतुराई, मगर बेचारे सुपर कमांडो ध्रुव को इस मामले में कोई सुराग कभी हाथ ही नहीं लग पाया.

वैसे भी ध्रुव के पास अब इसके लिए वक़्त ही कहाँ था क्योंकि अब दौर शुरू हो चुका था ध्रुव की कॉमिक्स में एपिक स्केल कहानियों याने विशेषांकों का – ग्रैंडमास्टर रोबो में अनुपम जी ने ध्रुव के साथ साथ उसके फॅन्स को भी स्वर्ण नगरी की सैर कराई. ध्रुव की कहानियों में माईथो साईंस फिक्शन की पहली झलक यहीं देखने को मिली. स्वर्ण नगरी के इतिहास में द्वारिका और अटलांटिस की जलमग्न सभ्यता के साथ साथ महाभारत का उल्लेख अचानक उस सीक्वेंस को एक लार्जर देन लाइफ कैनवास दे देता है, सुपर विलेन ग्रैंड मास्टर रोबो अपने नाम की तरह ही इस बिसात का ग्रैंड मास्टर साबित होता है मगर शह और मात के इस खेल में ध्रुव किस तरह अपनी बुद्धि से स्वर्ण नगरी को ही नहीं पूरी दुनिया को रोबो के हाथों से कुछ इस तरह बचाता है कि ग्रैंड मास्टर रोबो नाम का ये विशेषांक ध्रुव के अविस्मर्णीय कारनामों में से एक बन जाता है.

हालांकि इसके बाद आये विशेषांकों में एक बार फिर साईंस फिक्शन की चमक थी. लाखों पाठकों आज भी इलेक्ट्रोनिक्स में पोजिटिव – नेगेटिव के ज्ञान का श्रेय ध्रुव की आवाज़ की तबाही को देते हैं. खतरनाक विलेन बौना वामन को ले कर आई खूनी खिलौने में रहस्य रोमांच के साथ हल्का सा शर्लक होम्स का पुट भी देखने को मिला. बीच में नागराज के साथ दो विशेषांकों में नज़र आ चूका ध्रुव अब पूरी तरह फेंटेसी की दुनिया में उतरने को तैयार था, और ऐसा करने वाली कॉमिक थी किरिगी का कहर, एक कॉमिक जो आज भी ध्रुव के इतिहास में मील का पत्थर मानी जाती है. 64 पेजेस की ये कहानी, किसी भी माध्यम में मेरी पढ़ी अब तक की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में एक है. ज़बरदस्त किरदारों के साथ एक बेहद कसी हुयी इस गज़ब की कहानी को 64 पेजों में समेट पाना सिर्फ अनुपम जी के ही बस की बात है. किरिगी का कहर मेरे लिए उन चंद कॉमिक्स में से एक है जो मैं बिना सोचे समझे किसी भी आयुवर्ग के पाठक को रेकमेंड कर सकता हूँ. ये एक कॉमिक किसी को भी ध्रुव फेन बनाने के लिए काफी है.



किरिगी का कहर के बाद फेंटेसी से फिर ध्रुव लौट आया साईंस फिक्शन की और जब वो जा टकराया चुम्बा से… चुम्बा का चक्रव्यूह ने हम फॅन्स को मेग्नेट के विषय में इतना कुछ सिखा दिया जो शायद हमारी साईंस टीचर सालों में नहीं समझा पाती…ना सिर्फ ध्रुव की ये कॉमिक्स सीखने का एक मजेदार माध्यम बन चुकी थी बल्कि इनसे प्रभावित हो कर हम इन विषयों के बारे में और अधिक सीखना और जानना चाहते थे… विज्ञान के साथ साथ ध्रुव की इन कॉमिक्स में इस्तेमाल होने वाली शुद्ध भाषा ने हमारा भाषा ज्ञान भी बढाया… शिक्षा का इससे बेहतर माध्यम कोई हो ही नहीं सकता… अपना भाषा ज्ञान बढ़ाते हुए हम ध्रुव की कॉमिक्स पढ़ते रहे और चुम्बा का चक्रव्यूह जैसी कॉमिक्स से साईंस के पहलुओं के विषय में भी जानते रहे.

चुम्बा का चक्रव्यूह वैसे तो खुद में बड़ी यादगार कहानी है मगर इसका एक छोटा सा सिक्वेंस लाखों पाठकों को अब तक याद है, जिसमें ध्रुव एक बच्ची को डूबने से बचाता है और वह बच्ची उसे धन्यवाद देते हुए कहती है – “अच्छा हुआ आपने बचा लिया ध्रुव भैय्या वरना माँ मुझे बहुत डांटती.”

मैंने अब तक ना जाने कितने ध्रुव फेंस को ये सीन याद करके मुस्कुराते हुए देखा है. कुछ एक साल पहले मेरे दोस्त मनमीत ने मेरी मुलाक़ात अधीश से करवाई, ये कह कर कि वो कॉमिक फेन है. सबसे पहले अधीश ने जिस सीन की बात की, वो चुम्बा का चक्रव्यूह का यही सीन था. अधीश जिससे उस दिन के पहले मेरी ज़रा भी जान पहचान नहीं थी, ध्रुव की कॉमिक्स पर उस शाम हुयी लम्बी चर्चा के बाद मेरे करीबी दोस्तों में से एक बन गया. एक कॉमिक्स पात्र से आप इससे ज्यादा क्या उम्मीद कर सकते हैं कि वो दो अलग अलग शहरों में रहनेवाले, अलग अलग परिवेशों में पलेबढे लोगों के बीच की सारी दूरियां पाट कर उनमें दोस्ती करा दे.

चुम्बा का चक्रव्यूह के बाद भी ध्रुव की बेहतरीन कॉमिक्स आती रही. अब तक ध्रुव की कॉमिक्स का स्केल इतना विशाल हो चुका था कि करीब करीब सारी कहानियाँ विशेषांकों में नज़र आने लगी थी. इक्का दुक्का कॉमिक्स जैसे विडियो विलेन और पागल कातिलों की टोली छोड़ दें तो ध्रुव की कहानियों को 64 पेज से कम में समेटना नामुमकिन था. डॉ.वायरस, सामरी की ज्वाला, आत्मा के चोर, वेम्पायर, सुप्रीमा आदि ऐसे ही विशेषांक थे. मगर हम सभी के दिल दहल गए जब राज कॉमिक्स ने प्रकाशित किये मैंने मारा ध्रुव को के टीज़र्स…

“मुझे अब भी याद है कि मैंने मारा ध्रुव को पढ़ने के बाद मेरा मन कुछ इस तरह से विक्षुब्ध था कि मेरे लिए अचानक कॉमिक की दुनिया उजड़ चुकी थी. मेरे बालमन में कई तरह के सवाल थे – क्या ध्रुव को इसलिए मारा गया कि अनुपम जी अब नागराज के साथ व्यस्त होने वाले हैं? या फिर इसलिए कि राज कॉमिक्स में अब काफी नए हीरोज आ चुके हैं? और सबसे भयावह थे ध्रुव की मृत्यु के वो दृश्य जो इस कॉमिक की छोटी कहानियों में एक के बाद एक नज़र आ रहे थे, क्या ध्रुव सच में मर चुका था? मुझे याद है किस तरह हमारी लायिब्रेरी में मैंने मारा ध्रुव को किसी अभिशिप्त किताब की तरह तब तक एक कोने में रखी रही जब तक इसके दुसरे भाग हत्यारा कौन में हमारा ध्रुव वापस लौट आया, और उसके आते ही लौट आई सबके मुँह में ज़बान. कल तक जिनकी आवाजें नहीं निकल रही थी अब उछल उछल कर कह रहे थे – मैं ना कहता था ध्रुव को कुछ नहीं होगा.”

यदि आप उस दौर में पले बढे नहीं हैं तो शायद आपको इन सही ब्यौरा देना या समझा पाना नामुमकिन होगा. बस यूँ समझ लीजिये बीबीसी की टीवी सिरीज़ शर्लक के द्वितीय सीजन में उसके गिर कर मरने के बाद से अब तक जिस तरह नए सीजन का इंतज़ार किया जा रहा है ये उससे भी बड़ा इंतज़ार था क्योंकि हमारे पास मनोरंजन के उतने
ये दोनों कॉमिक्स एक बार फिर ले कर आई ध्रुव की दुनिया में नया बदलाव… अनुपम जी अब ध्रुव के साथ नागराज पर भी काम कर रहे थे तो ध्रुव की कॉमिक्स की इंकिंग में उनका हाथ बंटाने लगे विनोद जी और विट्ठल जी. नागराज और ध्रुव पर एक साथ काम करते हुए भी अनुपम जी ने इन कॉमिक्स का स्तर कभी नीचे नहीं जाने दिया…

साथ ही साथ ध्रुव की कहानियों में भी ज़रा सा मच्योर टच आने लगा – एक ओर ध्रुव का क्राईम फाईटिंग करियर था दूसरी ओर ब्लैक कैट ऋचा और नताशा के बीच ध्रुव को ले कर खींचतान. ये खींचतान ख़त्म हो पाती उसके पहले ही नताशा ने रोबो गैंग ज्वाइन कर लिया, और ऐसा होते ही ध्रुव की कहानियों में और भी ज़बरदस्त ट्विस्ट्स देखने को मिले. साथ ही साथ ध्रुव को मिल गए थे स्पेशल गेजेट्स. ध्रुव के साथ बड़े हो रहे पाठक अब ऐसे मच्योर ट्विस्ट्स के लिए तैयार थे, वहीँ नयी जेनेरेशन के पाठकों के लिए ये दुनिया उतनी ही लुभावनी थी जितनी मेरे लिए प्रतिशोध की ज्वाला हुआ करती थी… और अब भी है…


अप्रेल 1987 में आई प्रतिशोध की ज्वाला इस वर्ष अपनी सिल्वर जुबली मना रही है, और उसी सेलिब्रेशन का हिस्सा है ये स्पेशल एडिशन कॉमिक्स. मुझे विश्वास है कि इस कॉमिक के साथ एक बार फिर से ज्यूपिटर सर्कस और ध्रुव आपकी ज़िन्दगी का एक अभिन्न हिस्सा बन जायेंगे.

मैंने प्रतिशोध की ज्वाला का प्रथम एडिशन (जिसका मूल्य 4 रुपये था) करीब दो दशकों से अपनी लाईब्रेरी में संभाल कर रखा हुआ है और अब स्व.विजय कदम जी द्वारा पेंटेड और अनुपम जी द्वारा रचित ये सिल्वर जुबिली एडिशन आपकी लाईब्रेरी में जगह पाने जा रहा है. इसे अलमारी में बंद कर के रखने की बजाए अपने आस पास मौजूद बच्चों के साथ शेयर करें और उन्हें भी भेज दें ध्रुव के साथ कॉमिक्स की रोमांचक दुनिया के उस सफ़र में, जहां से मैं अब भी वापस लौटने को तैयार नहीं.

कमांडो फ़ोर्स ओवर एंड आउट!

अलोक शर्मा

Courtesy : www.saveindiancomics.org

1 comments :

Alok sharma Ji I am also from bhilai nagar and my super commando dhruva is amazing and unique hero. Nssprasad

Reply