Tuesday, 22 December 2015


बिहार चुनाव की बयार संक्रामक तरीके से बगल वाले जंगल मे पहुँची।
पशुओ ने भी चुनाव आयोग का गठन कर लिया, बोले बाघ और शेर तो मनुष्यो द्वारा घोषित राजा हैं, और मनुष्य तो बात बात पर हमसे ही सीख पाता है, ऐसे मे हमारा कर्तव्य है की लोकतंत्र के पर्व की एक बानगी उन्हें दी जाये।
अब चुनाव और चुनाव आयोग के गठन के बीच का गठबंधन कुछ यूँ है कि इस मौसम मे, बरसाती मेंढको की तरह टर्राते नेता तो "सलमान" की तरह याद रहते हैं पर आयोग वाले "राहुल रॉय" ही रह जाते हैं। जंगल भी तो इसी धरती का हिस्सा है न, तो इस phenomenon से वो अछूता कैसे रहता? तो आयोग वालो की शक्ल तो मुझे भी याद नही अब! पर हां चुनाव को "भयंकर निष्पक्षता" के साथ कराने की उनकी उद्घोषणा बाखूबी याद है।
ओ हां! इस चुनाव को आपतक पहुचाने का ज़िम्मा मुझे मिला, क्यों???
अरे हमे न बचपन से 'मोगली' देखने का शौक रहा है उसके साथ जानवरो के हाव भाव देख उनकी भाषा का अंदाज़ा लगाने का शौक चिपक कर रहा है हमसे।
बाबा रुडयार्ड की जय!

ख़ैर, चुनाव की घोषणा से सबसे ज़्यादा हड़बड़ाहट हुई ख़ुद को अब तक राजा समझते आये बाघों को! घोर मंत्रणा हुई एक बूढ़े बाघ ने कहा- " भाई तत्सम मे तो हम बाघ और शेर राजा हैं, पर individually कौन सा बाघ या शेर राजा है ये तो हमको भी नही मालूम है।"

एक अन्य बुड्ढे ने कहा- "एक नेता चुन लेते हैं जीतने पर उसे राजा बना कर बिठा देंगे, बाकी तो सब "परिवार" से ही हैं मिल बांट कर राज करेंगे।"
बाघ सहमति बन गयी और एक handsome से बाघ बल्लू को नेता चुना गया- पार्टी का चेहरा। पार्टी का नामकरण हुआ बाघ पार्टी यानी "बाप"।
नाम सुन कर उत्सुकता हुई तो पूछ बैठा।

बाघबल्लू ने जवाब दिया- "भई हम तो ठहरे अल्पसंख्यक ऐसे मे जीतने से रहे, नाम का दम दिखा कर नाक मे दम कर के जीतेंगे, बाहुबली हैं हम। टेंटुआ दबाये के वोट निकलवाएंगे।"

गर्जन से भरी थी उसकी आवाज़।

"और हां गुजरात के गिर से एक शेर को बुला लिया है बतौर स्टार प्रचारक सुना है गुजरात मॉडल बड़ा प्रसिद्ध है आजकल"

ये गर्जना सुन "गजराज-ओंदि जय" पार्टी यानी गोजपा वाले भड़क उठे।
गजविलास गजवान ने बयान दिया- "साला बाहुबल तो हमारे यहां है, तो वो काहे के बाहुबली? दलित जान के धमका रहे हैं? भोट होने दीजिये सब बाहुबली को कटप्पा बन के ठिकाने लगा देंगे हां।"

अब तो हर रोज़ एक नई पार्टी जन्म लेने लगी। जिनमे ticket के लिए खींच तान मच गयी।

गीदड़ों की पार्टी, गीदड़ों दा जानवर दल (गदाजद) से प्रतिनिधि गालू यादव ने जाति और मांस पर आरक्षण को मुद्दा बनाया।
बोले- "मरे जानवर के मांस पर गीदड़ जाती को 27% आरक्षण मिलेगा साथ ही बहुतायत मे पाये जाने वाले जंगली बकरों को बकरा नही बनने देंगे, उनकी सुरक्षा व्यवस्था होगी।"
लाभ के पद के लालच मे बकरे स्वयं ही बकरे बन उनकी ओर हो लिये।

कुछ चिंतित हो उठे की यार ये जीते तो चुनाव बाद तो मांस का टोटा हो जायेगा!

हवाई पक्षियों ने पार्टी बनानी चाही तो उन्हें दुत्कार कर भगा दिया गया, सब एक हो गए इस मुद्दे पर!
बाघ बल्लू ने कहा- "तुम तो ठहरे परदेसी बन गए राजा तो सारा माल ले कर परदेस हो लोगे, काला धन बनाने की जुगत लगा रहे हो क्या?"

सभी पार्टियों ने इस बात पर एक स्वर मे गुर्राहट और चिंपों मचायी तो पक्षी चुनाव से 'मेरा यहां कोई नही' गाते हुए बहिष्कृत हो गए।

सारी पार्टियां दुम लगा के हैशा करते हुए प्रचार मे जुट गयीं।
कुछ दिन बाद आचार संहिता भी लागू हो गयी।
गधे और उल्लू को आयोग ने अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया।

अरे हां याद आया आयोग मे तो गधे और उल्लू ही बैठे थे, एक को दिन मे दिनौन्धि की बीमारी थी तो दूसरा आरोप प्रत्यारोप के बोझ तले बस कार्रवाई करने के आश्वासन का ढेचूं-ढेचूं करता रहता। और रात को पसर जाता।

रात मे उल्लू की नज़र भी बस, चुनावी पार्टियों के द्वारा छोड़े गए मामूली rats रूपी cases पर ही पड़ती और उनके पीछे वो फुर्र!


सब Politics मय हो गए थे, अब पक्के politician होने के लिए अपराधी बनने की देर थी, माफ़ करें दागी होने की।

स्थिति और विकट होने को थी।

भेडियो के दल "भेड़िया भेकाबू का हो?" मे ticket पाने की आस मे बैठे नेता 'भेतीश कुमार' के बेटे 'भेड़ागर्क भांजी' को किसी ने सलाह दी की "ticket के लिए तो बाप के पीठ मे चुरा भोंकना ही होगा", जाने वो क्या समझे न समझे पर आँखे एक बार फैलीं फिर सिकुड़ कर चमकने सी लग गयीं उनकी। एक मवाली सी मुस्कान भी तैरी थी!
अगले दिन खबर मिली की बाप भेतिश कुमार का शव नाले मे पड़ा है और पीठ पर चाकू भोंके जाने के घाव हैं!
सनसनी फैल गयी सबके "ज़हन" मे।

बाघ बल्लू ने फिर अपनी गर्जना की
" हम जीते तो सब जानवर एक ही घाट पे एक साथ पानी पीने के काबिल होंगे"

बड़ी गहन राजनीति थी ये असल मे वो सबको एक साथ बुला कर मांस का टोटा खतमाना चाहते थे बस।

इससे जातिगत मुद्दे उठाने वाले बिफर पड़े।
गालु यादव ने हुंकारा- "मर जाएंगे लेकिन किसी और जाति का जूठा ना पिएंगे ना पीने देंगे"

दंगे सा माहौल हो गया ऐसा जैसा पिछले दिनों ओवैसी के कारण दादरी मे था या दीपक उपाध्याय के खिलाफ मेरा😁!

लग रहा था जैसे सब बस अपने लिए चुनाव लद रहे हों!
खरगोश, कछुओं से बचपन की हार का बदला चाहते थे तो चूहे, उल्लूओं को सीधा करना।
जंगल की फ़िक्र तो नेपथ्य मे चली गयी।

ऐसे मे मानव पूर्वज बंदरों ने कहा
"जंगल चुनाव अपना sole purpose (मानवो को सीख) भुला चुका है, और मानव तो वैसे ही हमसे बिना सिखाये सीखते रहते हैं। हम मानव न बने पशु ही बने रहें। पशुता ज़िंदाबाद।

कुल मिलाकर चुनाव स्थगित जंगलराज आज भी क़ायम, बाकी सब जानवर राज़ी खुशी हैं। ज़रा सी मानवता दिखा कर उन सब ने जंगल बचा लिया।

नेताओं तक ये कहानी पहुंची तो उन्होंने एक मर्म निकाला और ज़ोर से चिल्लाये- पशुता ज़िंदाबाद।

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