Saturday, 19 December 2015


बहुत सोचा कि शुरू कहाँ से करूँ| नौ के दस बजे और दिमाग के बारह| ‘मैं हमेशा से एक कॉमिक आर्टिस्ट बनना चाहता था’; ये कैसा रहेगा? ऐसा था ही नहीं तो लिख कैसे दूं?
बचपन में मुझे कॉमिक्स में पागलपन तक की दिलचस्पी थी| कोई अनोखी बात नहीं है, बहुतों को थी| मुझे याद आता है कि शायद मेरी पहली कॉमिक जैसी किताब एक रामकथा थी, जिसे गोरखपुर प्रेस ने प्रकाशित किया था| ब्लैक और व्हाइट में थी वह किताब, चिकने पन्नों पर, और हर पन्ने पर तीन लंबे पेनल थे, जिनके नीचे चोपाएयाँ लिखी हुई थीं| चौपाइयाँ तो पूरी पढ़ नहीं पाता था पर चार साल का होंते हुए भी मैं आर्टवर्क को बहुत ध्यान से देखता था| आश्चर्य कि बात ये है कि उनमे से कुछ पेनल मुझे आज भी याद हैं| उस वक्त दो ही तरह के आर्टवर्क याद आते हैं मुझे| लाइन-आर्ट ब्लैक और व्हाइट या दो रंगों में आता था, और पेंटिंग वाले आर्टवर्क चार रंगों में! चंदामामा के चित्र डबल कलर में आते थे और यही हाल नंदन का था! फिर उसके बाद एक दिन मेरे हाथ लाइन-आर्ट में एक रंगीन कॉमिक लगी| उसका नाम इंद्रजाल कॉमिक्स था| एक तो मेरी पहली १००% कॉमिक, और ऊपर से एक्शन वाली! ऐसी किताब मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।

इंद्रजाल कॉमिक्स वेताल नाम के एक नकाबपोश की कॉमिक थी, जो न जाने क्यों मुझे पहली नज़र में अजीब लगा| नकाब के नीचे से वह देखता कैसे होगा? मैंने एक झीना कपड़ा ले के, बिल्कुल वैसा ही एक मास्क बनाया और उसे आँखों पर बाँध कर भी देखा| बड़ा मुश्किल था उसके पार देख पाना| और फिर, उसका काली तिरछी स्ट्रिप्स वाला अंडरवियर; जिसे देख कर मुझे ज़ेबरा क्रॉसिंग की याद आती थी| पर उसके करीब छ: महीने बाद मैंने मम्मी से जिद्द की कि मुझे वैसा एक कच्छा सिल दें| वेताल मुझे अपनी गिरफ्त में ले रहा था! अगला नम्बर मैंन्ड्रेक की टोपी का था शायद!
मुझपर क्या प्रभाव हो रहा था, ये समझाने के लिए मुझे पहले ६० के दशक की समय, काल, परिस्थिति एवं अपना सामाजिक परिवेश समझाना पडेगा| वह युग ग्रामोफोन और रेडियो का था| टेलीविजन का नाम चंद पढ़े लिखे लोग जानते थे, और कैसेट या सीडी प्लेयर ख़्वाबों में पाया जाता था| किसी चीज़ का चलता-फिरता विज्ञापन देखने के लिए पिक्चर हॉल तक जाना पड़ता था| ट्रांजिस्टर लेकर घूमना फैशन था| यूं समझें कि उस वक्त मनोरंजन जटिल न होकर बड़ा सरल था| एक चीज़ बस एक ही काम आती थी| ट्रांजिस्टर से आप सिर्फ गाने सुन सकते थे, फोटो खीचने के लिए कैमरा लेना पड़ता था| और पढ़ना हो तो कागज पर छपी किताबें चाहिए होती थी|
मैं पांच संतानों में चौथे नम्बर पर था| पापा सरकारी कर्मचारी थे और मम्मी एक गृहणी| पर उनके विषय में सिर्फ इतना बताना ही नाकाफी होगा! क्योंकि मुझे पूर्ण विशवास है कि मेरे अंदर चित्रकार और लेखक के जो जीन हैं, वे उन दोनों की ही देन हैं|

मेरे दादाजी दो भाई थे और दोनों ही वकालत करते थे|
मेरे बड़े दादाजी, बाबू गोरखनाथ, स्वतन्त्रता संग्राम से भी जुड़े हुए थे| गाँधी जी जब नील-आन्दोलन के लिए चम्पारण गए थे तो उनके पास ही ठहरे थे| इसका जिक्र गाँधी जी ने अपनी आत्मकथा ‘माई एक्सपेरिमेंट विथ ट्रुथ’ में भी किया है|
पापा, बनारस हिंदू युनिवर्सिटी के छात्र थे| शौक़ीन मिजाज़ और हर कला में रूचि रखने वाले! घूमना उनका शौक था और इसके लिए उन्होंने एक ‘फिटन’ रखी हुई थी| के एल सहगल के पक्के भक्त और सितार एवं बांसुरी बजने में दक्ष! हांलाकि इस हुनर को उन्होंने व्यवसायिक स्तर पर ले जाने की कभी नहीं सोची! न जाने क्यों, वाद्य कला की अनुवांशिकी मेरे अंदर स्थानांतरित नहीं हो सकी, और इसके लिए मैं हमेशा अपने आप को अभागा महसूस करता रहूँगा| परन्तु पापा ने अपनी साहित्यिक रूचि की विरासत मुझे देने में कोई कसर नहीं की| हिंदी हो या इंग्लिश, रसखान हों या मोंपासा, इयान फ्लेमिंग, एडगर वालेस, कोनन डोयल का फुल क्लेक्शन हो या लियो टोल्स्तोय , मेंक्सिम गोर्की और दस्तोवस्की का रूसी साहित्य ! बंकिमचन्द्र, टैगोर, प्रेमचंद्र, महादेवी वर्मा की किताबें हों या रामायण, महाभारत और पुराण के ढेर, हर प्रकार की पुस्तक थी उनके संग्रह में! कई पुस्तकों के न तो लेखको के नाम मुझे समझ में आते थे और न ही उनका कथ्य, तो उनका ज़िक्र मैं यहाँ पर नहीं कर सकता!
चित्रकारी का भी गुण था पापा में! हांलाकि मैंने उनके ज्यादा चित्र नहीं देखे, पर जितने देखे, वे मुझे ये बताने को काफी हैं कि चित्रकार बनने का हौसला मुझमें कहाँ से आया|
मेरी मम्मी एक गृहणी थी, लेकिन पूर्ण साक्षर और पढ़ने की बेहद शौकीन! उनके अंदर ये गुण मेरे नाना जी से आया था ! मेरे नाना यदुनंदन पाण्डेय (वर्मा) प्रिंसिपल थे और पूरे बिहार में प्रसिद्ध पुस्तक ‘पौपुलर ट्रांस्लेशन’ के लेखक ! मेरे बड़े मामा एक इतिहासकार थे और उनहोंने ‘भारतवर्ष का नवीन इतिहास’ पुस्तक लिखी थी| शायद लेखक बनाने के जीन मुझमें मेरी माँ कि तरफ से मिले हैं!
तो भगवान ने अपना काम कर दिया था, पर मुझे पापड़ बेलने अभी बाक़ी थे!

ओह, बातों में हम रास्ता भटक गए !
ज़रा याद कर लें कि हम किस मोड से बाएं मुड गए थे |
हाँ, याद आया, हम इंद्रजाल कॉमिक के किस्से पर थे | कुछ मेगेजींस मेरे घर में हमेशा आती थीं | धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, Illustrated Weekly , सरिता, पराग और कभी-कभी चंदामामा और नंदन भी ! और इनमें से कुछ तो तब से आती थीं, जब मैं पैदा भी नहीं हुआ था ! पर कोई बात नहीं, मेगज़ीन संभाल कर रखना मेरे परिवार की आदत थी | हमारी दुछत्ती (mezzanine) में 4x3x3 फीट का लकड़ी का एक बॉक्स था, जिसमे, 1947 की Illustrated Weekly तक थी | पुरानी मैगजींस से ठसाठस भरा हुआ था वह बक्सा | बल्कि मैंगजींस के कुछ थाक तो बॉक्स की ऊँचाई से डेढ़ गुना ज्यादा थे | कभी-कभी तो मैं बॉक्स में घुसकर, मैगजींस के गद्दे पर बैठ कर, मैगजींस में अपने मतलब के आर्टीकल ढूंढ ढूंढ कर पढता रहता था | तो संक्षेप में दोस्तों, मेरी दुछत्ती में एक छोटा सा स्वर्ग था जहाँ मैं जब चाहे तब जा सकता था | और मुझे धूल और मकड़ियों जैसी चीज़ों से कोई परेशानी भी नहीं थी |
मैं एक सीधा-सादा दीवाना सा पाठक हुआ करता था, जिसकी चित्रकारी या लेखन के क्षेत्र में जाने की कोई ख्वाहिश नहीं थी, हांलाकि लोगों को मेरी चित्रकारी मेरी उम्र के हिसाब से बेहतर लगती थी | ‘अरे, तुम्हारी ड्राइंग तो बहुत सुन्दर है!’ जैसी लगातार मिलने वाली प्रशंसा भी मेरे दिमाग में ये विचार नहीं डाल पाई थीं | उस ज़माने में अगर कोई ये भविष्यवाणी करता कि आपका बेटा तो बड़ा होकर आर्टिस्ट बनेगा, तो मेरे मम्मी-पापा का बुरा मानना तो तय था | सुनने में ये बात बद्दुआ नहीं तो उससे कम भी नहीं थी | अरे डॉक्टर बोलो, इन्जीनियर बोलो, और नहीं तो चुप रहो ! दरअसल इस करियर से किसी को कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन यह विचार अकाट्य सत्य माना जाता था कि ये करियर मेरे बच्चे को खाना नहीं देगा बल्कि खुद उसी को खा जाएगा |
खैर, उससे हमें क्या? हमको तो इंजीनियर या डॉक्टर ही बनना था |
तो, दोस्तों, हम पढाई करते जा रहे थे और खाली समय में मैगजींस और कॉमिक्स पर हाथ भी साफ करते जाते थे ! मैं मेधावी छात्र था और अंक भी अच्छे लाता था | मैं तीसरी या चौथी कक्षा में रहा होउंगा जब मैंने कॉमिक्स और मैगजींस को सही तौर पर पढ़ना शुरू किया | उम्र यही कोई 7 से 8 साल की रही होगी ! उस वक्त का दौर अद्भुत था | चंदामामा में राजा-रानी की पुराने दौर की कहानियों के साथ साथ, वेताल, फ्लैश गॉर्डन और मैन्ड्रेक की आधुनिक फैंटेसी कहानियाँ साथ-साथ पढ़ने को मिलती थीं, नंदन में विश्व-प्रसिद्ध आधुनिक कथाओं के साथ पौराणिक कहानियाँ होती थीं, और पराग में सामयिक कहानियाँ ! कुछ भी बेमेल नहीं लगता था और हर कहानी अच्छी लगती थी | उन दिनों रूस, भारत का बहुत तगड़ा मित्र हुआ करता था | रूसी पुस्तकें मोटी होने के बावजूद काफी सस्ती मिलती थीं | मेरे पास हिन्दी में अनुवादित रूसी कहानियों का संग्रह था, जिनमे रूसी लोक कथाएँ मेरी प्रिय थीं | उन रूसी किताबों से एक मोटी सी किताब थी, ‘स्कूली बच्चे’ ! हम बच्चों के लिए तो 150 पृष्ठ मोटी वह किताब एक नॉवेल थी | कहानी एक 8वी से 9वी में जा रहे लड़के के बारे में थी जो गणित में बहुत कमज़ोर था | फिर कैसे वह कोशिश करके अपने आप में बदलाव लाता है और गणित का पंडित बन जाता है, इसका दिलचस्प विवरण था | किताब में कोई फैंटेसी नहीं थी, सब कुछ एकदम वैसा ही था जैसा वास्तविक जीवन में होता है | आठ साल की उम्र में ही मैं उस किताब से प्रभावित हो गया था | उस वक्त भी सोचता बहुत था मैं, जिनमे ९० प्रतिशत उल-जलूल बातें होती थीं | मैंने सोचा कि रूसी में इतनी अच्छी बच्चों की नॉवेल है तो हिन्दी में कितनी अच्छी होगी ! अपने साथ-साथ मैंने पापा को भी खूब भगाया,... पर हिन्दी में एक भी बच्चों की नॉवल तो छोडो, किताब तक न मिल न सकी ! ‘एक लोटा पानी’ जैसा रोचक कहानियों का संग्रह ज़रूर मिला, पर वह शिक्षाप्रद ज्यादा था, सामयिक और रोचक कम ! राजा-रानी तथा परियों तक की कहानियों पर विश्वास कर लेता था मैं, पर इस स्थिति पर विश्वास करना मेरे लिए ज़रा कठिन था |
हिंद पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित पंचतंत्र और हितोपदेश के अलावा, बच्चों की किताबों के नाम पर सिर्फ बाहर का अनुवादित साहित्य था | वैसे यह मुझे बाद में पता चला कि अलीबाबा, अलादीन, सिंदबाद जैसी जिन कहानियों को मैं अपना समझता था, वे भी इम्पोर्टेड थीं | बाद में तो वेताल, फ्लैश गॉर्डन और मैन्ड्रेक भी ऐसा ही कुछ झटका दे गए ! खैर, कहीं की भी हों, कहानियाँ तो थीं और मजेदार भी थीं | पर अब वे दिन याद करता हूँ तो लगता है कि उसी वक्त दिल में कुछ ऐसी अनजानी सी गाँठ जरूर पड गई थी जो मुझे खुद लेखन करने के रास्ते पर खींच लाई !

मै नहीं समझता कि छुटपन में मुझमें कोई ऐसा संकेत था जो ये इंगित कर सकता कि मै कभी चित्रकारी या लेखन करूँगा | चित्रकारी में मेरा स्तर लाखों या हजारों में एक तो नहीं पर दर्जनों में एक ज़रूर था| लेखन की कहें तो मै अपना होमवर्क बिना किताब से टीपे कर लेता था| वेताल देखकर चित्र बनाने की उत्कट इच्छा अवश्य होती थी| पर कहाँ से शुरू करू, ये तय करने में दिन बीत जाता था!
लेखन में भी पेन तो उठाता था, पर लिखने से पहले ही आत्मबोध, थप्पड़ मर कर कोमल भावनाओं का मुह सुजा देता था| मेरी चौथी या शायद पांचवीं कक्षा के सबसे पिछले पन्ने पर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की प्रसिद्ध कविता एक चित्र के साथ छपी हुई थी, ‘उठो लाल अब आँखें खोलो, पानी लाई हूँ मुह धो लो’| कविता की सरल लय और ये शब्द मुझे बहुत पसंद आते थे| इनसे प्रेरणा पाकर मैंने महिर्षि वाल्मीकि की तरह अपना पहला काव्य लिखा| मुझे याद है कि प्लास्टिक के गहरे नीले कवर वाली डायरी में मैंने वह कविता लिखी थी, नीली स्याही वाले पेन से! कविता का रूप उपर्लिखित कविता जैसा था, और वह कविता पांच पदों में प्रकृति की सुंदरता का वर्णन थी| कविता लय और तुकबंदी से पूर्ण थी| पहला स्वतंत्र लेखन था वह मेरा! कविता तो भूल गया हूँ पर उसका हश्र मुझे अभी तक कल की बात जैसा याद है ! मैंने वह कविता बड़े गर्व के साथ अपनी बड़ी बहन को पढ़ाई| पूछा कैसी है , तो सवाल का जवाब सवाल मिला कि किसकी है? मैंने कहा मैंने लिखी है! उन्होंने मानने से इनकार कर दिया| मैंने अपने खंडित होते आत्मविश्वास को बटोर कर पूरे जोर से यह दावा किवा कि मै ही इस कविता का मूल कवि हूँ| पर शायद मैंने कविता अपनी उम्र के अनुसार कुछ ज्यादा ही अच्छे स्तर की लिख दी थी| कोई भी, यानि कोई भी मानने को तैयार नहीं हुआ| मम्मी और पापा ने ज़रूर माना लेकिन साफ झलक रहा था कि वे मेरा दिल रख रहे थे| अब सोचता हूँ तो लगता है कि अरे, ये अविश्वास ही तो मेरी कविता के स्तर का अकाट्य प्रमाण था, पर क्या करू, सात वर्ष की उम्र में मै पचीस वर्ष का नहीं था जो इस गूढता को समझ पाता | पूरे छह महीनों तक मैंने सबको यह विश्वास दिलाने या प्रयास किया कि अरे दीवानों, मुझे पहचानो! पर सभी ने यही कहा कि ‘कहाँ से आया, तू है कौन’? फिर एक दिन जब आस के सारे ठौर चुक गए तो मैंने वह कविता का पन्ना फाड कर फ़ेंक दिया| शायद आपको भी पृष्ठभूमि में सैड वायलिन बजता सुनाई पड रहा होगा| मेरे लेखन का उबाल उफन कर गिर चुका था| अब दूसरे उबाल का इन्तज़ार था|
अब बात करते हैं चित्रकारी की!
चित्रकारी का वाकया इतना दर्दीला नहीं था| शायद इसलिए क्योंकि उसमे लोग आपको स्वयं चित्र बनाते हुए देख सकते हैं| चित्रकारी का श्रेय स्वयम्भू है |
एक दिन चित्रकारी का मौका मिला! वह भी सीधे इंकिंग का!!

मेरी बड़ी चचेरी बहन, कानपुर के मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरी पढ़ रही थीं। उनको बड़ी-बड़ी शीट पर मेडिकल चार्ट बनाने होते थे। महीन लाइनों से बने मानव शरीर के अंदरूनी अंगों के वे चित्र काफी जटिल थे। उनको दूसरे चार्ट से देख कर बनाना बहुत कठिन और समय लगने वाला कार्य था। पापा ने इस काम को जल्दी निपटाने का एक नायाब तरीका सोचा और मुझे पहली बार 'लाईट-बॉक्स' के दर्शन हुए। बस, उसमे बॉक्स नहीं था। दो तीन मोटी किताबों के दो पायों पर एक मोटे कांच को रखा गया, और उसे दो और मोटी किताबों से दो तरफ से दबा कर नीचे बल्ब जला दिया गया। एक जुगाड़ी लाईट-बॉक्स तैयार था। उसपर शीट बिछाकर 'क्रौक्ल पेन से पतली-पतली लाइनों से ट्रेस किया गया और चार्ट तैयार होते गए। मुझे भी हाथ साफ़ करने का मौका मिला क्योंकि काम ज्यादा था और करने वाले कम! लाइनों पर मेरा साधा हाथ देख कर अपने पापा से ज्यादा मैं चकित हुआ था। बाकी लोगों के लिए तो ये बात आई-गई हो गई, पर मेरे लिए कभी गई नहीं हुई।
असली आश्चर्य तो मुझे इस बात का था की मैं लाइनों को ज्यादा देख रहा था और पूरे चित्र को कम। मैं चित्र का विश्लेषण कर रहा था। और तब मेरे दिमाग में वेताल की एक कॉमिक घूम गयी। अब मैं उसके चित्रों को भी लाइनों में बांटकर देख रहा था और मुझे ये आभास हो रहा था कि इस प्रकार की चित्रकारी के लिए क्रोकल एकदम फिट पेन है। एक बार मेरे छोटे दिमाग में जुगाड़ी लाइट-बॉक्स की मदद लेने का ख्याल भी आया, पर ये ख्याल आते ही एक वितृष्णा सी भी पैदा हुई कि इसमें क्या मज़ा है।
और तब मैंने वेताल की कॉमिक का एक ब्लॉक कॉपी किया और पहली बार अपने आपको आर्टिस्ट महसूस किया। नक़ल ही सही, पर ...स्केच अच्छा बना था।
एक रास्ता दिखना शुरू हुआ था, पर भ्रम की धुंध भी थी उस रास्ते पर!
और तब वो रास्ता पकड़ना पड़ा जो थोडा ज्यादा साफ़ था।.....
पर वह मुझे कला की दुनिया से दूर ले जाने वाला था।....

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3 comments

Bahut hi behrateen likha hai..mjaa aa gya padkar...good job comicsourpassion team 👌👍

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अनुपम जी मैंने पहली कॉमिक्स वूडू पढ़ी थी मैं तब से आपका और ध्रुव का फैन हूँ।

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