Tuesday, 24 November 2015

वो वादा..!(That Promise..)

प्रथम खंड(1st Part)

 मद्धिम चांदनी की छटा से वातावरण जगमग हो रहा था । सुगन्धित फूलों की खुश्बुए हवा के साए में शरण ले रही थी।सर्दी की इस रात में पूरा शहर नींद के आगोश में जा चूका था।शनै:-शनै: चारों ओर शांति का साम्राज्य स्थापित हो रहा था।
      चाँद उसे इतना नयनाभिराम कभी ना लगा था। जहाँ सम्पूर्ण शहर नींद का आश्रय ले रहा था ,वहीं वो अपने छत पे खड़ा एकटक दृष्टि से चन्द्रमा को देख रहा था। चन्द्रमा की उसपर पड़ने वाली रौशनी अपने साथ यादों का एक सागर भी लाती थी जो अचानक ही उसके आँखों को सजल कर देती थी।
        "बिरह की अग्नि में जलकर प्रेम और भी गहरा हो जाता है"- ये बात उसपर पूर्णरूपेण चरितार्थ हो रहा था। जिस स्तम्भ के सहारे उसने प्रेम के बीज बोये थे;क्या पता था एक दिन वो स्तम्भ ही टूटकर बिखर जाएगा और उसका निराधार प्रेमवृक्ष लड़खड़ा कर गिर जायेगा।परन्तु कुछ लोग ऐसे भी होते है जो यादो के सहारे भी जीवन बिताने का सामर्थ्य रखते है। तो क्या वो अपने प्रेमवृक्ष को सूखने देता...?.....।नहीं....कदापि नहीं। उसकी यादों में आज भी उसका प्रेम अमर बना हुआ था। ह्रदय के एक कोने में आज भी वो प्रेम हँस-खेल  रहा था। और आज वो उसी कोने में प्रकाश डाल रहा था।

    .......(︶^︶)........(ˇˍˇ)...

6 years ago

"Happy birthday to you Avni"-उसने उत्सुकतापूर्वक कहा।
"पर मेरा birthday तो 10 दिन पहले था"-मुंह बनाते हुए वो बोली।

स्कूल आज ही दीपावली की छुट्टी के बाद खुला था। अतः उसके बर्थडे भी छुट्टी में मिल गया था। और उन्दोनो के मिलने का एकमात्र स्थान school ही था। अतः दोनों और विद्यार्थियों से जल्दी ही school आ जाया करते थे।

"हाँ ! पर तुम तो जानती हो की उसदिन तो स्कूल बंद ही था।"- अपनी विवशता प्रकट करते हुए वो बोला।

वो हल्का सा मुस्का दी।उसकी नजरो से क्षमा की भावना की स्पष्टता व्यक्त हो रही थी।

"और आज मिले तो आज ही........."
इतना कहकर उसने कुछ chocolates उसके ओर बढ़ा दिए..
"kissme!my favourite चॉकलेट! thankyou"-अपनी ख़ुशी जाहिर करते हुए वो बोली।
  और उसको समझ नही आ रहा था क्या बोले।
इस शांति को उसी ने भंग किया-"एक बात बोलूं..?"
"हाँ बोलो"
"I LOVE YOU"-वो नजरें झुकाती हुई बोली।

हालांकि उन दोनों में से किसी ने  सीधी अभिव्यक्ति आज पहली बार की थी,परन्तु वो ऐसा ही कुछ एक दुसरे के लिए महसूस करते थे। और अपने प्रति एक दुसरे की feelings को भी जानते थे। सच्चा प्रेम सीधी अभिव्यक्ति पे आश्रित नही होता है,इसकी अनुभूति उनदोनों से की जा सकती थी।
वो अभी तक स्तब्ध सा खड़ा था।
"अब तुम्हारी बारी। तुम अपनी बात बोलो।"-वो झुके हुए सर को उठा के बोली।

इस बात से उसे भी इन्कार नही था की वो भी उससे प्यार करता है। परन्तु उसका बालमन भी भली-भांति समझता था की इश्क इतनी आसानी से मुकम्मल नही होता है।उसके हिस्से आंसू भी आ सकते हैं,इस बात का ज्ञान भी उसे था।परन्तु उसे जब प्यार की कमी महसूस हुई थी,Avni ने उसे हमेशा पूरा किया था।फिर जब आज वो उससे उसका जवाब पूछ रही थी तो वो क्या बोले।उसकी भावनाओं को हमेशा अवनि के प्यार में आश्रय मिला  था।और आज वो अपनी जगह मांग रही थी तो वो क्या  कहे -इसी उलझन में वो था।

"बताओ ना ! तुम मेरा साथ दोगे..?"-वो पुनः बोली।
इस बार वो अपनी शंका,अपनी शर्त एवं अपनी स्वीकृति जाहिर करते हुए अपनी चुप्पी तोड़ा-"तुम अगर यूँ ही मेरा हाथ पकड़ कर चलती रहोगी तो मैं .........."
उसके कथन के औचित्य को समझकर उसके बातों को काटते हुए वो बोली-"हमेशा साथ दूँगी। प्यार तुमसे किया है। और शादी भी तुम्ही  से करुँगी।"
"और जो भूल गयी तो..."
पूरी निष्कपटता से वो बोली-"नहीं भूलूंगी। I Promise.और अपने इस वादे को किसी भी तरह पूरा करुँगी। बस तुम अपने दिल के दरवाजे मेरे लिए खुले रखना"
[ये अंतिम पंक्ति कल ही उसने सुपर कमांडो ध्रुव की comics में पढ़े थे।.....(°-°)....]

वो स्तब्ध एवं निरुत्तर सा खड़ा रह गया।
               ......फ्लैशबैक closed..™

.......(@_@)....…(<●>_<●>)………


इन बातो को स्मरण करते हुए वो उसी में प्रवेश सा कर चूका था। अपनी चेतनाशक्ति खोकर वो अभी तक चाँद की ओर एकटक निगाह से देख रहा था। भावनाओं का तूफ़ान बिना किसी अवरोध के आँखों के रास्ते बहता जा रहा था।गालों पे अब तक आंसुओं का अधिपत्य हो चुका था। आंसू की नमकीन बूंदों का परिचय जब उसके होठो से हुआ तो उसकी चेतना लौटी।और जब स्मरण हुआ की वो अब इस दुनिया में नही है तो फूट फुट कर रोने लगा।
अवनि को मरे हुए 15 साल हो चुके थे। और इन 15 सालों में उसने रोज उसको याद किया था।शुरुआत में जब उसकी याद आती थी तो कहीं एकांत में जा कर थोड़ा सा रो लेता था। मगर धीरे-धीरे आदत सी पड़ गयी थी। अब उसको याद करते वक़्त उसके होठो पे हलकी सी मुस्काहट तैर जाती थी।परन्तु आँखें फिर भी नम हो जाती थी और बूंदों का सृजन होने लगता था। परन्तु तभी याद आता था हमेशा मुस्काने का वो वादा जो उसने अवनि से किया था।और आंसुओ की बूंदें लुप्त होती चली जाती थीं।

और आज 15 सालों बाद वो इतनी बुरी तरह रो रहा था कि एक बार देखने वाले का भी हृदय सिहर उठे। संभवतः यह उसका करुनतम विलाप था। अश्रुओं की जिस समंदर को उसने वर्षों से कैद कर रखा था,आज वो पलायन कर रहा था।उसके करुण क्रंदन का स्वर जहाँ तक पहुँचता था वहां की हवाएं भी कांप उठती थी। उसके आँखों में आज लालसा की चमक थी।निराशा का अन्धकार था। उसके न होने का अफ़सोस था।

जी भर के आंसू बहाने के बाद वो छत पर ही बैठ गया। और पुनः उसके वादे को याद करने लगा।उसने अपने नसीब को कभी बीच में नही लाया था। परन्तु आज उसने ये कसार भी पूरी कर दी। सोचने लगा की कितनी मासूमियत से दोनों ने एक दुसरे को चाहा था।फिर क्यू हनन हुआ उस मासूमियत का। धीरे धीरे आंसुओं ने दुबारा डेरा डालना प्रारंभ कर दिया।

वो avani को भी दोष नही देना चाहता था परन्तु फिर भी लड़खड़ाते होठो से धीमे स्वरों में वो बोला-
"क्यों चली गयी तुम। तुम्हारे लिए कितनी खुशियाँ मेने संजो के रखी थी।तुम्हारी ही प्रेमाश्रम में मेरा वास था। क्यों मेरा वो आश्रयस्थल छिन गया।तुमने तो आजीवन मेरा साथ निभाने का वादा किया था।क्या होगा उस वादे का....."
इतना बोलते ही उसे जैसे कुछ ध्यान आया कि avni ने तो जीवनपर्यंत उसे साथ देने का वादा किया था। और उसने तो उसे पूरा भी किया। उसका जीवन तो यही तक था।.....

"तुमने अपना वादा पूरा किया...Avni!"-चाँद की तरफ फिरसे नजरें उठा कर वो बोला। उसकी आवाज में संतोष और तृष्णा दोनों का मिश्रण था।

......⊙_⊙......◑__◐...o(︶︿︶)o


जब तक मनुष्य की कोई अत्यधिक प्रबल इच्छा ,जिसे वो अपने जीते जी पूरा होते हुए देखना चाहता हो,तब तक उसे मरने के बाद भी उस इच्छा को पूरा करने की चाह होती है।और जब तक वो इच्छा पूरी न हो तब तक उस्की आत्मा भी भटकती रहती है ऐसा अक्सर कहने एवं सुनने में आते हैं।अवनि भी ऐसी एक इच्छा से बंधी हुई थी। अपनी शादी उसी लड़के से करने की जिसे उसने चाहा था। और उसने तो वादा भी किया था की वो किसी भी तरह उससे शादी जरुर करेगी।तो फिर वो वादा बिना निभाए कैसे मुक्त हो सकती थी।
अब तक न जाने किस परत में उसकी आत्मा शुन्य सी पड़ी थी। परन्तु आज जब उसने अवनि का नाम पुकार कर रोते हुए उस वादे की बात छेड़ी तो उसने उसकी आत्मा की चेतना को झकजोर सा दिया।उसकी पुकार अवनि तक पहुँच चुकी थी।और उसकी आत्मा को सब कुछ स्मरण सा हो आया।और उसे अपने वादे को पूरा करने की सुधि होने लगी।जीवन सीमा के आगे यह उसकी प्रथम और आखीरी इच्छा थी।

वो अभी तक उसी धुन में छत पर बैठा हुआ था। उसकी आँखों में नींद और दिल में चैन नही था आज।11 बज चुके थे। संभवतः आज उसकी रात छत पे ही काटने वाली थी।उसने फिर से धीमे स्वरों में अवनि का नाम लिया और अवनि की तलाश पूरी हो चुकी थी।
वायु की गति हलकी ज्यादा हो चुकी थी जो अवनि के दस्तक देने का परिणाम था।उस विशेष खुसबू की गंध उसने भी महसूस की जो अभी भी अवनि के खयालो पे पहरा दे रहा था। परन्तु हवा का एक झोंका मानकर पुनः अपने धुन में व्यस्त होने लगा। आत्मा रूप में भी आज उसको सामने पाकर अवनि का ह्रदय प्रसन्नता से अधैर्य हुआ जा रहा था।उसका जी उसको उठाकर एक बार जोर से सीने लगाने को,उसके माथे को चूमने को किलोलें मार रहा था।एक प्रसन्नता के महासागर में तैर रही थी तो दूसरा गम के सागर में डूब रहा था। एक तरफ जागने के बाद सबसे प्रिय वस्तु मिलने की ख़ुशी थी और दूसरी और 15 वर्ष बाद तक इच्छित चीज न मिलने का गम।अब तैरने वाले का मन डूबने वाले को बचाने के लिए,अपनी मनपसंद चीज पाने की खुशी उस डूबने वाले कओ समर्पित करने के लिए और इन्तेजार नही करना चाह रहा था।

"Hello World"-हवा की गहराइयों से मधुरता की सीमा को पार करती हुई उसक आवाज मानस के कानों में पड़ी जिसे सुनकर उसके शरीर में बिजली का संचार सा हो गया। ये आवाज.....जिसे सुनकर कभी उसके कर्णों की कमी पूरी होती थी।,और आज वही आवाज फिर उसके कानों में पढ़ी थी।
उसका ह्रदय सिहर सा उठा। सत्य या भ्रम-वो निश्चित नही कर पा रहा था। सत्य इसलिए क्यूंकि उसे पूर्ण विश्वास था की उसने वो शब्द सुने हैं;भ्रम इसलिए की उस आवाज की स्वामिनी का जीवन ख़तम हो चुका था और वो अभी उसके बारे में सोच रहा था।तो संभवतः ये आवाज उसके अंतर्मन से आई हो। हैरानी के सागर में वो उतर चुका था।

" किस सोच में हो...? पहचान भी रहे हो या नही...?"-भाव भंगिमा से परिपूर्ण उसकी आवाज ने फिर से अपने अस्तित्व का परिचय दिया।
यह सम्पूर्ण सत्य है,यह निश्चय उसके मन में होते ही सहसा उसके स्वर निकले-"Avni..!मेरी jaaaaan....!!ये तुम हो ना"।।
"Woow! you got me...याद हूँ मैं अबतक तुम्हें..?? 15 साल बाद भी...."- उसके स्वरों से मुदित होने की अनुभूति स्पष्टतया व्यक्त हो रही थी।
"तुम्हें भूलने का प्रश्न उठता ही कहाँ है..!"-सहर्ष वो बोला
"मेरे मन में"-मजाक के लहजे में उसने प्रतिउत्तर दिया।
"अच्छा जी..."-अपने होठों पे मुस्कुराहटों को जगह देते हुए वो बोला।

अवनि अदृश्य थी। उसी अवस्था में वो मानस के पास जाकर बैठ गयी। और मानस के कन्धों पे अपना सर रख दी। इस स्पर्श को उसने भी महसूस किया। इस प्रकार की अनुभूति से उसका साक्षात्कार पहली बार हो रहा था।

"कैसे हो तुम.?"-जानने की प्रबल इच्छा लिए हुए वो बोली।
"जैसा तेल के ख़तम होने पर दीपक का होता है। बाटी तो होती है,परन्तु रौशनी उत्पन्न नही कर सकता।"
"रोज इतनी रात तक जागते हो?"
"कभी कभी। परन्तु इस तरह पहली बार जागा हूँ।"
"पढाई ठीक से कर रहे हो या नहीं.?"
"वो तो दो वर्ष पहले ही ख़तम कर चुका। अब एक अच्छी जॉब मे hu.
उम्र बढ़ने से मनुष्य का ज्ञान,अनुभव.विचार,आदि,सब का विस्तार होता है। परन्तु अवनि...?उसका जो आज १५ वर्षों पश्चात अपनी निद्रा से वापस आई थी,वो भी मृत्यु को प्राप्त होकर आत्मारूप में।उसका दिमाग और ज्ञान..सब उसी स्टार का था जब वो मृत्यु को प्राप्त हुई थी।
फिर उन्दोनो में बहुत सी बातें हुई।

"तुम्हें डर नहीं लग रहा मुझसे..?भूतों से तो लोग डरते हैं।"
"यदि पता हो की भूत तुम्हारे जितनी प्यारी है तो फिर भला कौन डरेगा.।तुमसे तो दर केवल तब लगता था जब मेरे homework न बनाने पे teacher से शिकायत कर देती थी।"-मुस्कुराते हुए बोला।
"अच्छा..।"- वो हंस पड़ी।
मानस उसके दोनों हाथों को महसूस कर उसे पकड़ कर उसके साथ खड़ा हुआ।

....⊙﹏⊙...◑﹏◐...︽⊙_⊙︽...
"बहुत प्यारी लगती थी तुम जब कुछ भी किया करती थी। हँसना रोना,सब। फिर उस अद्भुत नज़ारे के दर्शन आज तक न हुए हैं। Please..मानवरूप में आओ न..if you can..."
"okey..."
फिर वहां साक्षात् सुन्दरता का अवतार हुआ। वो सुन्दरता जो छन्दों में समां सके ऐसी कोई कविता नहीं। बंधे हुए माध्यम लम्बाई के बाल,जिसकी चमकीली कालिमा ऐसा प्रतीत होती थी जैसे की अमावस्या के अँधेरे एवं पूर्णिमा के चमक के मिश्रण से उसके बालों को रंग गया हो। स्वाभाविक आकर की हलकी हरी-काली आँखें,मानों ज़माने भर का प्यार उन्ही में समाहित हो। सौम्यता से परिपूर्ण गोरा चेहरा,जो मनष्य की नजरो में चाँद की सुन्दरता को को चुनौती देने का सामर्थ्य धारण करती थी।और गुलाब की पंखुरियों को नाराज करने वाली गुलाबी होंठ,जो चाँद की रौशनी में कहीं ज्यादा सुन्दर लग रहे थे। नागिन की काया को परास्त करने वाली काया।गोरी बाहें और दाहिने हाथ पे लाल पीले रंग का रक्षासूत्र राम सीता का प्रतीक समझकर हमेशा धारण करती थी। उजले shirt,skirt और white shoes जो की स्कूल ड्रेस थे,जो उसने तब पहने हुए थे जब स्कूल से जाते वक़्त उसकी मौत हुई थी। किसी भी मनुष्य के दुर्वासाक्रोध को क्षण भर में समाप्त करने वाली मासूमियत अब भी बरक़रार थी।

अपने एवं पुराने गीतों के तारीफों वाले मिलेेजुले वाक्यों में वो बोला-"तस्वीर तुम्हारी कोई क्या बनाये,केसे तुझ पर कवी कविता कर पायेगा। रंगों-छंदों में किस तरह से इतनी सुन्दरता समां पायेगा।'सुन्दरता' शब्द तुम्हारे लिए ही निर्मित हुआ हो ऐसा लगता है। तुमसे सुन्दर कोई नही....!!"
"तुम्हारी Girlfriend मुझसे ज्यादा खूबसूरत होगी,है ना..?"
"नहीं है मेरी कोई girlfriend। बस एक प्यार है,जोकि तुम हो।"
"अच्छा.!.पत्नी होगी फिर......"
"शादी नहीं की है। शायद करूंगा भी नहीं"
"मैं इसका कारन समझ सकती हू।परन्तु जीवन जीने के लिए साथी की तो जरुरत होती है।"
"तुम हो ना..!"
"मैं थी..परन्तु अब नहीं हूँ मानस ! ये मेरा बहुत बड़ा भाग्य था जो मेरे पास तुम थे।वो लड़की बहुत भाग्यवती होगी जिससे तुम प्यार करोगे। किसी से उसका सौभाग्य मत छीनो। बहुत बड़ा पाप होगा।"
"ये पाप करने को भी तैयार हूँ।"
अवनि समझ नही पा रही थी की वो अब क्या बोले। वो चुप हो गयी।
"I Love You Avni" उसका हाथ थामकर मानस बोला।
जो शब्द अवनि जीते जी नही सुन पाई थी,आज वो मरने के बाद सुन रही थी। आज सुनकर भी उसका ह्रदय गौरवान्वित हुआ जा रहा था। भावनाएं उछल मार रही थीं। परन्तु फिर जब एहसास हुआ कि अब वो जीवित नही है और उन दोनों के साथ का कोई प्रश्न ही नही है तो वो बोली-
"कब तक जियोगे इस प्यार के सहारे। क्यों अब तक मुझे अपने दिल में बिठाकर पूजा करते हो मेरी। क्यों नही जल देते मेरे उस छवि को जिसे तुमने अपने मन में रखा है। क्यों नही बुझा देते उस प्रेम्दीपक को जो तुम्हारे दिल में अब तक जल रहा है। मैं अब नही हूँ इस बात क्या ज्ञान तुम्हे भी है।"
ये शब्द अवनि सच्चे ह्रदय से नही कही थी। वो स्वयं भी चाहती थी की मानस उसे हमेशा याद रखे,परन्तु उसके यादों में रोये कभी ना। उसकी छवि को वो हमेशा दिल में रखे ,परन्तु ये उसके लिए स्वीकार्य न था उस छवि के कारण किसी दुसरे को स्थान न दे..।

वो फिर बोली-"अभी तुम्हारे सामने बहुत
बड़ी जिन्दगी पड़ी है,जिसे तुम्हे किसी और का हाथ पकड़ कर चलना है। mai तुम्हारे अतीत में थी,मुझे अपना भविष्य मत बनाओ। ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोडना ही अच्छा होता है"
"बोझ तब ही बन पता है जब हममें उठा पाने का सामर्थ्य न हो।मेरी मुस्कुराहटों में तुम आज भी जिन्दा हो,मेरी यादो में आज भी जीवित हो जो तुम ने मुझे दिए है। कोई मेरी तस्वीर भी फाड़कर देखे तो वहाँ मेरे ह्रदय के फटे टुकडो में तुम्हारा हँसता हुआ चेहरा सहज दिखाई देगा। दिल में तुम हो तो धड़कन में कोई और कैसे हो सकती है;जुबां पे तुम हो तो लफ्जो में कोई और कैसे हो सकती है।कल्पनाओं में आज भी तुम हो तो कोई और वास्तविकता में नही हो सकती।तुम्हारी अनमोल छवि जो मेरे ह्रदय में है,उसे बहा ले सके वो सामर्थ्य तूफानों में नहीं है;उसे जला सके,वो ज्वाला सूर्य में भी नही,उसे उड़ा सके वो वेग वायु में नही है।उसे अंधकार की गर्त में ले जा सके,वो तमस अन्तरिक्ष की कालिमा में भी नही;उसकी चमक को फीकी कर सके,वो तेज प्रकाश में भी नही।"उसे परास्त करते हुए वो बोला। उसके प्यार की अनंतता प्रकट हो रही थी।
अवनि समझ चुकी थी कि अब उसके पास केवल एक ब्रह्मास्त्र शेष है जो कभी खली नही जायेगा।

"मुझे तुम्हे आज देखकर इतनी ख़ुशी हो रही है जितना पिछले 15 वर्षो में कभी न हुआ था। अब तुम मुझे कभी भी....."अचानक उसे कुछ याद की वो कुछ पूछना भूल रहा है।
"इतने वर्षों तक कहाँ थी"-जिज्ञासापूर्वक वो बोला।
"पता नहीं। आज तुमने पुकारा तो वो पुकार मुझे अपना वादा याद दिला
गयी और म..."
"किस बात का वादा?"
"वही जो जीवन सीमा के पहले पहली और जीवन सीमा के बाद मेरी आखिरी इच्छा है।"

इतना कहकर उसने आगे बढ़कर मानस का हाथ पकड़ लीं। फिर थोडा शरमाकर,पलकें झुक कर और झुकती हुई पलकों को फिर से उठाकर बोली-मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ। अपना वादा पूरा करना चाहती हूँ। मुझसे शादी करोगे"
"हाँ जरुर!"-पुलकित और अधैर्य होकर वो बोला।फिर कुछ सोचता हुआ वो बोला-"पर.."
"तुमने देखा नहीं है एक फिल्म में jitendra रेखा जी के मृत शरीर से करती है। क्या तुम मेरी जीवित आत्मा के साथ.."-वो मुस्कुराकर उसकी चिंता को ख़त्म कर अपने वाक्य को अधूरा छोड़ दी।

इतना कहकर उसने अपनी दोनों मुट्ठी बंद कर मानस के हाथों के सामने बढाकर खोल दिए। एक हाथ में सिन्दूर और दुसरे में मंगलसूत्र की उपस्तिथि थी।उसने सहर्ष सिन्दूर एवं मंगलसूत्र को अपने हाथों में ले लिया।
फिर अवनि के कस कर बंधे हुए बालों को ढीला कर मांग में सिन्दूर भरने का स्थान बना कर उसमें सिन्दूर का सृंगार करते हुए बोला-बचपन से ख्वाहिश थी की तुमसे शादी करूँगा,तुम्हारी मांग में पवित्रता एवं सुहाग का प्रतीक और सुहागन का अभिमान ये लाल रंगों वाला सिन्दूर तुम्हारी मांग में सजाऊंगा। और आज जब वो क्षण सामने है तो पूर्ण विश्वास नही हो रहा है। ऐसा लग रहा है जेसे ये एक स्वप्न है जो कि टूटने के लिए बने हों।"
अवनि इस प्रेमपूर्ण बातों को सर झुक कर ध्यानपूर्वक सुन रही थी। सहसा ही उसके भी नेत्र सजल हो चले थे। भले ही अब वो एक इंसान नही थी परन्तु भावनाओं का समँदर उसके भी दिल में था। आशाओं का पानी उसके भी आँखों में था। किसी तरह उसने अपने आँखों को काबू में किया।
फिर मानस ने उसके बालों को उसके कंधों से परे करके वहां पर मंगलसूत्र का प्रभुत्व कायम कर दिया।
फिर अवनि बोली-"सात वचन तो वो देते हैं जब एक दुसरे से अंजान हों या फिर लड़के पर विस्वास न हो। मैं तुमसे कोई वचन नही लूंगी क्युकी बिना दिए ही तुम मेरे हर वचन को पूरा करते आये हो। मैं तुम्हें अब किसी वचनों के बंधन में बांधना नही चाहती। ईश्वर करे मुझे जब भी मानवजन्म मिले तुम सर्वदा ही मेरे पति रहो।"-इतना कह कर वो मानस के सीने से लिपट गयी।and she kissed him on his cheeks..और मानस शर्म की गहराइयों में उतरता चला गया।
फिर कुछ पलों बाद वो बोली-"मानस..!हर विवाह का एक महत्वपूर्ण रस्म होता है विदाई,जो सब को निभाना पड़ता है।आज फर्क बस इतना है की दुल्हन अपने पति के साथ नही वरन उसको छोड़कर जा रही है।"
इतना कहकर वो मानस के प्रतिक्रिया का इन्तेजार करने लगी,परन्तु ये इन्तेजार बस क्षण भर का था। ये शब्द सुनते ही मानस की आँखों में वो आंसू फिर उभर आये जो अवनि के आने से मानस खो चूका था।
"तो क्या तुम अभी मुझे छोड़कर....."-लडखडाती जुबां से वो बोला।
"हा मानस..!अब मुझे जाना होगा। शीघ्र ही मुझे मुक्ति मिल जायेगी। और तुम शादी जरुर करना किसी और से..तुम्हें मेरी कसम।और मेरे ख्यालों में रोना मत।मैं खुद चाहती हूँ की तुम मुझे याद रखो। परन्तु मुझे याद करते वक़्त तुम्हारे होठों पे मुस्कराहट होने चाहिए। तुमने मेरे हर कसमों वादों को पूरा किया है। बस ये अंतिम मेहेरबानी भी कर देना"
इतना कहकर उसके कदम छत का फर्श छोड़ चुके थे और वो आकाश मार्ग की और बढ़ने वाली थी।तभी मानस बोला-
"ये तो बताती जाओ जाओ कि जिस दिल में तुम रहती हो,वहां किसी और को कैसे रख सकता हूँ?"
"तुम्हारा दिल इतना बड़ा है हमदोनों उसमें एक साथ रह सकते हैं। अब अलविदा" इतना कहते हुए उसकी भी अश्रु उसके पलकों से बहार आने को जिद कर रहे थे। वो आकाशमार्ग में अदृश्य हो चुकी थी। और मानस लालसा भरी दृष्टी से आकाश की तरफ देख रहा था। उसके हाथ अवनि को अलविदा कह रहे थे।सहसा उन हाथो पे अश्रुओं के कुछ बूंदों का अवतरण हुआ जो अवनि के थे। उसके भी आंसू एक सूत्र में बह चले। कुछ मिनटों तक वो आकाश की और ही दृष्टि किया हुआ खड़ा रहा।

अपने आँखों को पोंछकर जब उसने चाँद की रौशनी में देखा तो 1 बज चुके थे।सामने देखा तो शिव मंदिर में अभी तक दीया जल रहा था। फिर भारी क़दमों से वो अपने बिस्तर की ओर चल पड़ा।

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2 comments

Amazing description of the scene, choice of words, dialogues and queue of events... all seems to be perfectly plotted like a pro... mind blowing. - Antriksh

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